किडनी की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्लड फिल्टर के रूप में काम करने वाले इस ऑर्गन के बिना व्यक्ति का जीवित रहना मुश्किल है। अगर किसी वजह से यह काम करना बंद कर दे तो ट्रांस्प्लांट ही इसका एकमात्र विकल्प रह जाता है। इसलिए इसका खयाल रखना बेहद जरूरी है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि व्यक्ति की किडनी सही ढंग से काम करती रहे। हमारे शरीर में किडनियों का जोडा पीठ के मध्य भाग में पसलियों के ठीक नीचे स्थित होता है। इनका आकार हमारी मुट्ठी के बराबर होता है और ये देखने में राजमा जैसी लगती हैं। मानव शरीर का यह प्रमुख अंग लाखों सूक्ष्म तंतुओं से मिलकर बना होता है, जिन्हें नेफ्रॉन्स कहा जाता है। इन्हीं की मदद से किडनी ब्लड में मौजूद नुकसानदेह तत्वों को शरीर से बाहर निकालने का काम करती है। किडनी से संबंधित ज्य़ादातर बीमारियां नेफ्रॉन्स की गडबडी से ही होती हैं।

कैसे काम करती है किडनी खून को साफ करने की प्रक्रिया के दौरान किडनी नुकसानदेह तत्वों और अतिरिक्त पानी को छानकर यूरिन के रूप में शरीर से बाहर निकालने का काम करती है। यह हमारे शरीर में पानी के अलावा सोडियम, कैल्शियम, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे मिनरल्स का संतुलन बनाए रखती है। किडनी ब्लडप्रेशर और शुगर लेवल को भी संतुलित बनाए रखने का काम करती है। विटमिन डी के एक खास सहायक तत्व कैल्सिट्रियॉल के अलावा एरिथ्रोपोइटिन नामक हॉर्मोन बनाने की जिम्मेदारी भी किडनी पर ही होती है। यह हॉर्मोन खून बनाने में मददगार होता है।

क्यों होती है परेशानी आनुवंशिकता, डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर और दर्द निवारक दवाओं के अधिक सेवन से किडनी को नुकसान का खतरा रहता है। अति व्यस्त जीवनशैली और खानपान की गलत आदतों की वजह से आजकल भारत में हृदय रोग के बाद किडनी संबंधी बीमारियां लोगों को सबसे ज्य़ादा परेशान कर रही हैं। अत: समझदारी इसी में है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए। साथ ही हमारे लिए यह जानना भी बेहद जरूरी है कि किडनी से जुडी कौन सी समस्याएं इसकी सेहत को प्रभावित करती हैं, उनके लक्षण क्या हैं और उनसे बचाव कैसे किया जाए।

किडनी में स्टोन : किडनी जब खून को फिल्टर करती है तो उसमें से सोडियम और कैल्शियम के अलावा अन्य मिनरल्स के अवशेष बारीक कणों के रूप में निकल कर यूरेटर के माध्यम से ब्लैडर तक पहुंचते हैं, जो यूरिन के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं पर कभी-कभी खून में इन तत्वों की मात्रा बढ जाती है तो ये किडनी में जमा होकर रेत के कणों या पत्थर के टुकडों जैसा आकार ग्रहण कर लेते है और इनसे ब्लैडर तक यूरिन पहुंचने के रास्ते में रुकावट आती है।

कारण : आमतौर पर यूरिन में कुछ खास तरह के केमिकल्स होते हैं, जो उसमें मौजूद मिनरल्स को क्रिस्टल बनने से रोकते हैं पर किसी वजह से यूरिन में इन केमिकल्स का न बनना, पानी और तरल पदर्थों का सेवन न करना और यूरिनरी ट्रैक में इन्फेक्शन की वजह से भी यह समस्या हो सकती है।

लक्षण : पेट में तेज दर्द, बार-बार टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस होना, रुक-रुक कर दर्द के साथ यूरिन डिस्चार्ज, साथ में ब्लड आना, कंपकंपी के साथ बुखार, भूख न लगना और जी मिचलाना।

बचाव : रोजाना कम से कम आठ-दस ग्लास पानी पिएं। किडनी की नियमित जांच जरूर कराएं। अगर पहले से हाई ब्लडप्रेशर या डायबिटीज की समस्या हो तो अपने भोजन में प्रोटीन, सोडियम, कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा सीमित रखें। अपने खानपान में चीनी-नमक का इस्तेमाल सीमित मात्रा में करें। दर्द निवारक दवाओं के सेवन से बचें और दिन में दो कप से ज्य़ादा कॉफी न पिएं।

उपचार : अगर स्टोन की समस्या गंभीर न हो तो यह दवाओं से ही ठीक हो जाती है पर कुछ स्टोन ऐसे होते हैं, जिनमें कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। इससे वे सख्त हो जाते हैं और उन्हें निकालने के लिए सर्जरी की जरूरत होती है। हालांकि, आजकल सर्जरी के अलावा लैप्रोस्कोपी, यूरेट्रोस्कोपी जैसी कई तरह की नई तकनीकें विकसित की जा चुकी हैं, जिनकी मदद से स्टोन को आसानी से बाहर निकाला जा सकता है और मरीज को कोई तकलीफ भी नहीं होती।

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन : शरीर का यूरिनरी सिस्टम किडनी, यूरेटर ब्लैडर और यूरेथ्रा से मिलकर बना होता है। कभी-कभी इसमें संक्रमण हो जाता है, जिसे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन या यूटीआई कहा जाता है।

लक्षण : यूरिन डिस्चार्ज के दौरान दर्द, बार-बार टॉयलेट जाना, सुस्ती, शरीर में कंपन, बुखार, पेट के निचले हिस्से में दर्द, यूरिन में बदबू और रंगत में बदलाव।

बचाव : व्यक्तिगत सफाई का विशेष ध्यान रखें, सार्वजनिक टॉयलेट के इस्तेमाल से पहले फ्लश जरूर चलाएं। इन्फेक्शन के दौरान सेक्स से दूर रहें।

पॉलिसिस्टिक किडनी डिजीज : बोलचाल की भाषा में जिसे हम किडनी फेल्योर कहते हैं, वास्तव में वह पॉलिसिस्टिक डिजीज ही है। ऐसा होने पर किडनी में गांठ सी बन जाती है और धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मात्रा में एल्कोहॉल और सिगरेट के सेवन से भी किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। अगर इनका सेवन बंद नहीं किया गया तो एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब दोनों किडनियां काम करना बंद कर देती हैं। हाई ब्लडप्रेशर और डायबिटीज के मरीजों में किडनी फेल होने की आशंका बढ जाती है। इसके अलावा दिल के मरीजों को भी ऐसी समस्या हो सकती है।

लक्षण : पीठ और पेट के निचले हिस्से में दर्द, सिरदर्द, यूटीआई इन्फेक्शन, हाथ-पैरों और आंखों में सूजन, सांस फूलना, भोजन में अरुचि, पाचन संबंधी गडबडी, खून की कमी, त्वचा की रंगत में कालापन, अनावश्यक कमजोरी, थकान, बार-बार टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस होना, पैरों में दर्द और खिंचाव आदि ऐसे लक्षण हैं, जो यह बताते हैं कि व्यक्ति की किडनियां ठीक से काम नहीं कर रही हैं।

उपचार : सबसे पहले यह देखा जाता है कि किडनी ब्लड के फिल्टरेशन का काम सही ढंग से कर पा रही है या नहीं? शुरुआती दौर में दवाओं की मदद से समस्या को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। विशेषज्ञ किडनी फेल्योर को पांच अवस्थाओं में विभाजित करते हैं, जिनमें से शुरुआती तीन में बीमारी को दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है, चौथी और पांचवीं स्टेज में मरीज के लिए डायलिसिस और ट्रांस्प्लांट अनिवार्य हो जाता है। अगर किसी मरीज के शरीर में किडनी प्रत्यारोपण सफल हो जाए तो भी उसे ताउम्र डॉक्टर के सभी निर्देशों का पालन करते हुए दवाओं के नियमित सेवन, संयमित दिनचर्या और खानपान अपनाने की जरूरत होती है।