वर्ष 2015 में आई फिल्मों में 'पीकू' एक उल्लेखनीय फिल्म है। बूढों की अटेंशन-सीकिंग की आदत को लेकर बुनी गई है यह कहानी। हर घर में कोई न कोई भास्कोर बनर्जी होते हैं। इसलिए यह फिल्म सबको अपने घर जैसी लगती है। कब्ज्ा के बहाने यह फिल्म जीवन का फलसफा पेश करती है। फिल्म से जुडी रोचक घटनाओं के बारे में बता रहे हैं अजय ब्रह्म्ाात्मज।

ऋषिकेष मुखर्जी, बासु चटर्जी और गुलज्ाार की कई फिल्में कमर्शियल सिनेमा के ढांचे में होते हुए बडे स्टार्स के साथ चुटीली और हास्यपूर्ण कहानियां दिखाती रही हैं। उनकी ख्ाूबी यही है कि मेकिंग और प्रस्तुति में उन्हें सरल रखा गया। कोशिश यही रही कि ज्िांदगी की भावपूर्ण सहज कहानियों में स्टार रहेंगे तो दर्शक आकृष्ट होंगे। दर्शकों में भी ऐसी फिल्मों की ललक रहती है। मुश्किल तब होती है, जब सिर्फ लाभ के लिए किसी छोटी फिल्म की नकल होती है। दर्शक नया देखना चाहते हैं, नकल नहीं। नया और मौलिक विषय मिले तो वे टूट पडते हैं।

वर्जनाएं तोडती कहानी

शूजीत सरकार की 'पीकू ऐसी ही फिल्म है, जो नएपन का एहसास कराती है। इसका लेखन जूही चतुर्वेदी ने किया है। शूजीत सरकार और जूही की पिछली फिल्म 'विकी डोनर में भी अलग विषय उठाया गया। स्पर्म डोनेशन जैसे वर्जित विषय पर बनी इस फिल्म ने वर्जनाओं को तोडा। फिल्म ने निस्संतान दंपतियों के लिए एक विकल्प पेश किया था। जूही चतुर्वेदी और शूजीत सरकार की दूसरी फिल्म 'पीकू भी अलग िकस्म की वर्जना तोडती है। आमतौर पर हम अपनी बैठकों में शौच और कब्ज्ा जैसे विषय पर बात करना अशोभनीय मानते हैं। जबकि हर परिवार में ऐसी अनेक वर्जित बातें आम होती हैं। शूजीत सरकार ने अपना कैमरा एक मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में टिका दिया है। पिता-पुत्री के बीच चल रही चिल्लपों आरंभ में व्यक्तिगत और एक परिवार की लगती है, लेकिन कुछ दृश्यों के बाद यह हर घर की कहानी लगने लगती है।

आम घरों के दृश्य

भास्कोर बनर्जी अपनी बेटी पीकू के साथ दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहते हैं। पीकू की मां नहीं है। पीकू ही रिटायर हो चुके पिता की देखभाल करती है। पिता कब्ज्ा से ग्रस्त हैं और इसे लेकर जब-तब पीकू को परेशान भी करते हैं। पीकू कामकाजी लडकी है। स्वतंत्र विचारों और व्यवहार वाली पीकू घर-परिवार और नौकरी के बीच संतुलन बना कर चल रही है। फिर भी चिडचिडी हो गई है। पिता व सहकर्मियों केबीच वह संयत रहती है, लेकिन ऑफिस लाने-ले जाने वाली टैक्सीके ड्राइवरों से उसका झगडा होता है। नतीजतन कोलकाता जाते समय कोई ड्राइवर उसके साथ जाने को तैयार नहीं होता। एक ड्राइवर मालिक के कहने पर तैयार होता है, लेकिन सुबह फोन स्विच ऑफ करके बैठ जाता है। मजबूरन टैक्सी सर्विस के मालिक राणा चौधरी को ड्राइविंग सीट पर बैठना पडता है।

कम शब्दों में गहरी बातें

भास्कोर का किरदार निभाने वाले अमिताभ बच्चन के शब्दों में, 'एक बार गेटअप में आने पर हमारे लिए किरदार को जीना आसान हो जाता है। जूही चतुर्वेदी एवं शूजीत सरकार ने भास्कोर की एक छवि बना रखी थी। उसकी हलकी सी तोंद है। मोटा चश्मा लगाया और ख्ाास तरह से बाल रखे। उसे कैप पहनाया। उसे बंगाली मिश्रित हिंदी बोलनी थी। पीकू की भाषा अलग थी। ऐसा लगता है कि भास्कोर का संबंध कोलकाता से है, जबकि पीकू दिल्ली में पली-बढी है। उसे अंग्रेजी भी बोलनी पडती है।

दीपिका पादुकोण केे लिए पिता-पुत्री के ये किरदार नए थे। उन्होंने अपने पिता को याद किया। वह कहती हैं, 'मेरे पिता और भास्कोर बनर्जी में कोई समानता नहीं है। मगर इमोशन की फीलिंग्स एक जैसी हो सकती हैं।

राणा चौधरी पढा-लिखा व्यक्ति है। मिडिल ईस्ट से लौटने केे बाद उसने पिता का पुश्तैनी धंधा संभाला है। मां से उसके संबंध खिंचे-खिंचे से हैं। फिल्म में उन्हें कम संवाद मिले हैं, लेकिन वे आंखों और मुस्कान से बहुत कुछ कह जाते हैं। उनकी तारीफ में अमिताभ बच्चन कहते हैं, 'हम ऐक्टर्स को संवादों का सहारा होता है, लेकिन इरफान साहब तो बगैर संवादों के भी प्रभावित करते हैं।

रिहर्सल पर ज्ाोर

'पीकू के कलाकारों केे चुनाव में अमिताभ बच्चन सबसे बाद में आए। उनके पहले दीपिका पादुकोण और इरफान चुने गए थे। शूजीत बताते हैं, 'जूही किसी अन्य के बारे में सोच रही थीं, लेकिन पीकू के लिए मुझे दीपिका ही ठीक लगीं। उन्हें फिल्म का पहला सीन सुनाया और वह राजी हो गईं। पीकू में उन्हें लगभग न के बराबर मेकअप करना था। अमित जी ने मुझसे पूछा था कि राणा का किरदार कौन निभा रहा है। इरफान का नाम सुनते ही वे चहक उठे थे। कोई कल्पना नहीं कर सकता कि तीनों दिग्गजों को लेकर फिल्म बनाना इतना आसान हो सकता है। शूजीत विस्तार से बताते हैं, 'मैं थिएटर से आया हूं। यहां हम रिहर्सल पर बहुत ज्ाोर देते हैं। पीकू के लिए मैंने तीनों स्टारों से स्क्रिप्ट की रीडिंग करवाई और दृश्य के हिसाब से रिहर्सल करवाए। इरफान उनकी शैली के कायल हैं। उनके अनुसार हर फिल्म की ऐसी ही शूटिंग होनी चाहिए। यह फिल्म कलाकारों और निर्देशक के परस्पर विश्वास से बनी है, जिसे लेखक का मज्ाबूत सहारा मिला है।

कलाकारों का सटीक चयन

फिल्म का बडा हिस्सा सडक पर है। गाडी चली जा रही है और उसमें चार लोग बैठे हैं। उनके बीच थोडा तनाव भी है। भास्कोर को राणा पर भरोसा नहीं है। राणा भी आश्वस्त नहीं है कि वह बाप-बेटीके साथ सफर पूरा कर सकेगा। पीकू दोनों के बीच सेतु की तरह बैठी है। शूजीत सरकार ने बिना भारी संवादों और नाटकीय दृश्यों के पीकू को मज्ाबूत और स्वतंत्र किरदार के रूप में पेश किया है। और भी किरदार हैं, जो महत्वपूर्ण न होते हुए भी ज्ारूरी हैं। पीकू की मौसी, चाचा-चाची, परिवार का नौकर बुधन, फेमिली डॉक्टर श्रीवास्तव और पीकू का दोस्त... इन सभी सहयोगी भूमिकाओं केे लिए सही कलाकारों का चुनाव भी फिल्म की विशेषता है। शूजीत ने यह भी ध्यान रखा कि फिल्म का सेट कार्डबोर्ड का न लगे, उसे देख कर चितरंजन पार्क के बंगले का एहसास हो। दीपिका बताती हैं, 'शूजीत दा ने फंक्शनल सेट तैयार किया था। एक बार तो मैंने वहीं नाश्ता भी बनाया। शूजीत हंसते हुए कहते हैं कि सेट रीअल हो तो फील भी रीअल मिलता है।

जडों से जुडऩे का संदेश

फिल्म देखते हुए सभी को हंसी आती है। कब्ज्ा के बहाने इतनी हलकी-फुलकी और रोचक कहानी बुनी जा सकती है, यह इस फिल्म को देखने से पता चलता है। यकीनन जूही चतुर्वेदी ने साधारण से विषय पर रोचक फिल्म लिखी। कलाकारों ने दर्शनीय और आनंददायक बना दिया। शूजीत फिल्म की विश्वसनीयता और आत्मीयता का श्रेय कलाकारों को देते हैं। वे कहते हैं, 'हम तो शब्दों में किरदारों को रचते हैं और उनके विज्ाुअल्स की कल्पना करते हैं। कलाकार ही उन्हें ऐसे साकार करते हें कि दर्शक उन्हें स्वीकार करें। पीकू के किरदार आसपास के लगते हैं। फिल्म में एक संदेश भी छिपा है। विकास के नाम पर अपने धरोहरों को तोडते हुए हम अपनी जडों से कटते जा रहे हैं। पीकू का यह फैसला कि पुश्तैनी मकान नहीं बेचा जाएगा, वास्तव में बडा संदेश है।

अजय ब्रह्म्ाात्मज