अश्विनी अय्यर तिवारी एड वल्र्ड का नामचीन नाम हैं। जब उन्होंने फिल्मों में आने का फैसला किया, तब उनके पति नितेश तिवारी ने, जो इन दिनों आमिर खान की 'दंगल के निर्देशन में जुटे हैं, अश्विनी के इरादों को देखते हुए इस फिल्म का मूल विचार दिया। अश्विनी ने फिल्म की प्लैनिंग के समय ही तय कर लिया था कि इस फिल्म में प्रयोगशील अभिनेत्री स्वरा भास्कर को लेना है। स्वरा भास्कर फिल्म के साथ आरंभ से ही जुड गई थीं। वह बताती हैं, 'इस फिल्म का ऑफर मिला तो मुझे बताया कि गया कि लीड रोल है। मेरे लिए यह खुशी की बात थी। सपोर्टिंग रोल में मेरी कुछ फिल्में पॉपुलर रहीं और एक पहचान भी मिली। मैं बेहद उत्साहित होकर स्क्रिप्ट सुनने गई थी। जब पता चला कि 15 साल की लडकी की मां का रोल है तो मीठी अनुभूति थोडी खट्टी हो गई। पहला खयाल तो यही आया कि इस उम्र में 15 साल की बच्ची की मां बनना होगा। लीड रोल मिला भी तो मां का रोल मिल रहा है। बहरहाल, स्क्रिप्ट सुनने और पढऩे के बाद मैंने मन बना लिया कि इस रोल के लिए मना नहीं किया जा सकता। एक बार मैंने हां कह दी तो फिर कोई संदेह नहीं रहा।' यूपी की पृष्ठभूमि अश्विनी ने फिल्म की कथाभूमि उत्तर प्रदेश की रखी। खासकर आगरा शहर। आगरा में स्थित ताजमहल और ताजमहल के आसपास की साधारण जिंदगी के कुछ किरदार, एक कंट्रास्ट तो बन ही गया है। अश्विनी बताती हैं, 'मेरे पति नॉर्थ के हैं। फिल्म की कहानी के लिहाज से परिवेश और माहौल के लिए उन्हें आगरा शहर उपयुक्त लगा। हमने ताजमहल के पीछे की मलिन बस्ती चुनी। इसी बस्ती में चंदा सहाय अपनी बेटी अपेक्षा के साथ रहती है। दूसरों के घर में बर्तन मांजने के काम से आजीविका चला रही चंदा सहाय की ख्वाहिश है कि उसकी बेटी पढ-लिख जाए। बेटी का पढाई-लिखाई में ज्य़ादा मन नहीं लगता। मन नहीं लगने की बडी वजह उसका गणित में कमजोर होना है। चंदा बेटी पर दबाव डालती है। उसके लिए ट्यूशन की व्यवस्था करती है। पढाई का खर्च पूरा करने के लिए उसे ज्य़ादा काम भी करना पडता है, फिर भी बेटी के अच्छे परिणाम नहीं आते तो उसका दिल टूट जाता है। समझाने पर भी बेटी पर असर नहीं पडता। आखरिकार चंदा सहाय अपने सपनों की बात दीदी से करती है। दीदी यानी जिनके यहां चंदा सहाय काम करती है। दीदी उससे सहानुभूति रखती हैं और चाहती हैं कि उसकी जिंदगी में तब्दीली आए। तय होता है कि वह खुद गणित पढेगी और फिर अपनी बेटी को प्रेरित करेगी'। अश्विनी ने फिल्म को शिक्षाप्रद या उपदेशात्मक नहीं रखा है। उन्होंने सहज उल्लास और निराशा के बीच मां-बेटी के रिश्तों की ऐसी कहानी कही है, जिसमें पढाई एक मुद्दा है। सोच में बदलाव की कहानी फिल्म की पटकथा में ध्यान रखा गया है कि यह फिल्म वंचितों की कहानी न बन जाए। पैरलल फिल्मों के दौर में ऐसी फिल्मों में अभाव पर ज्य़ादा फोकस रहता था। गरीबी और लाचारी के बीच उनके शोषण की भी बातें की जाती थीं। 'निल बटे सन्नाटा मुद्दों की समझ और सोच में आए बदलावों का संकेत है। नई पीढी के फिल्मकार अपने पूर्वजों से अलग दृष्टिकोण और शैली अपना रहे हैं। अश्विनी अय्यर की फिल्म चंदा सहाय, उसकी बेटी अपेक्षा, अपेक्षा के सहपाठी और स्कूल के खुशदिल प्रिंसिपल को लेकर बुनी गई सकारात्मक फिल्म है। इस फिल्म में किरदारों की परिस्थितियां धूमिल और कडवी हैं लेकिन उनमें उत्साह और उम्मीद की कमी नहीं है। इस फिल्म के प्रिंसिपल श्रीवास्तव हिंदी फिल्मों में आए अनोखे किरदार के रूप में याद रह जाते हैं।' अश्विनी बताती हैं, 'हमने श्रीवास्तव का एक खाका तैयार किया था, लेकिन पंकज त्रिपाठी ने उसे अलग व रोचक तेवर दे दिया। फिल्म में वह साधारण किरदार नहीं रह जाते। पंकज त्रिपाठी नैसर्गिक प्रतिभा के कलाकार हैं। छोटी-छोटी भूमिकाओं में भी अपने अंदाज से वह याद रह जाते हैं। तैयारी थी मुकम्मल पंकज अपने किरदार की तैयारी के बारे में बताते हैं, 'हिंदी फिल्मों में शिक्षकों को नेगटिव और कडक मिजाज के रूप में पेश करने की परंपरा सी रही है। कहीं न कहीं स्कूल को अनुशासन के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में हम पोषित करते रहे हैं। 'निल बटे सन्नाटा' में प्रिंसिपल और गणित के शिक्षक की भूमिका में मैंने अपने शिक्षकों की अच्छी बातें डाली हैं। प्रिंसिपल श्रीवास्तव में मेरे अनेक अध्यापकों का मिश्रण है।' पंकज त्रिपाठी एनएसडी के प्रशिक्षित अभिनेता हैं। वह स्वीकार करते हैं, किसी भी किरदार की तैयारी में मैं उसके बैकग्राउंड और बैकस्टोरी पर काफी काम करता हूं। मसलन, वह कहां से आया होगा, अतीत में उसके साथ क्या हुआ होगा, फिल्म जहां खत्म होती है, उससे आगे वह कहां गया होगा। इन सारी बातों पर सोचने से किरदार का वर्तमान मिल जाता है। उसका वह हिस्सा हाइलाइट हो जाता है, जो फिल्म में आना है। इसके साथ ही हमें सिनेमा के शिल्प का भी ध्यान रखना होता है। आनंद एल. राय की भूमिका 'निल बटे सन्नाटा' के साथ 'तनु वेड्स मनु' और 'रांझणा' के निर्देशक आनंद एल. राय भी जुडे हैं। फिल्म से अपने संबंध और भूमिका के बारे में वह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, 'मेरी अपनी एक कसौटी है, मैं किसी को भी उसकी नीयत से परखता हूं। काम में ऊंचा-नीचा हो सकता है लेकिन नीयत अच्छी हो तो सोहबत में मजा आता है। स्वरा का उत्साह था। वह इस फिल्म को लेकर बहुत पॉजिटिव थी। अश्विनी ने भी पूरे जोश में फिल्म पूरी की थी। मुझे अलग से कुछ भी नहीं करना पडा। हां, एक अच्छी फिल्म से जुडऩे का सुकून और गर्व मुझे मिल गया।' स्वरा की सोलो हिट स्वरा फिल्म की कामयाबी का श्रेय आनंद एल. राय को देना चाहती हैं। वह कहती हैं, 'आनंद सर के साथ आने से फिल्म पर लोगों का विश्वास बढा। हमें इरॉस का प्लेटफॉर्म मिल गया। इससे फिल्म की अच्छी मार्केटिंग हुई और बेहतरीन रिलीज मिल गई। फिल्म पूरे 50 दिन सिनेमाहॉल्स में टिकी रही।' अश्विनी भी मानती हैं कि फिल्म को मिली तारीफ से उन्हें भी सम्मान मिला है।