सन् 2015 का 'दादा साहेब फाल्के सम्मान मनोज कुमार को दिया गया है। यह सम्मान सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए फिल्मों से जुडी किसी भी हस्ती को दिया जाता है। मनोज कुमार ने 1957 में 'फैशन से फिल्मी करियर की शुरुआत की। दिलीप कुमार से प्रभावित मनोज कुमार ने 1957 से 1963 के बीच अपनी छवि पाने की तलाश में हर तरह की फिल्में कीं। 1964 में उनके दोस्त केवल कश्यप ने 'शहीद का निर्माण किया। इसका निर्देशन एन राम शर्मा ने किया था। इस फिल्म से उन्हें एक अलग पहचान मिली। राष्ट्रीय और देशभक्त चरित्र की छवि को उन्होंने आगामी फिल्मों में मज्ाबूत किया। वह इन फिल्मों में भारत के नाम से आते रहे। भारत कुमार उनके नाम का पर्याय बन गया। आज के दर्शक उन्हें राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत फिल्मों के लिए ज्य़ादा जानते हैं।

शास्त्री जी का सुझाव

1964 में आई 'शहीद देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देखी थी। वह इस फिल्मसे बेहद प्रेरित और प्रभावित हुए थे। देश के हालात को देखते हुए उन्होंने 'जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। शास्त्री जी फिल्मों का महत्व और प्रभाव समझते थे। उन्होंने 'शहीद देखने के बाद मनोज कुमार से कहा था कि 'क्यों न आप मेरे नारे 'जय जवान, जय किसान पर एक फिल्म बनाते हैं। मनोज कुमार ने उनकी सलाह पर अमल किया। वह एक ऐसा समय था, जब मनोज कुमार स्वयं निर्माण और निर्देशन में उतरने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने हामी भरी और दिल्ली और मुंबई लौटते हुए ट्रेन की 24 घंटे की यात्रा में 'उपकार की स्क्रिप्ट लिख ली।

मनोज कुमार कॉलेज के दिनों से ही शौकिया लेखन करते थे। उन्होंने 'शहीद के निर्माण के दौरान तकनीक और निर्माण कौशल पर भी ध्यान दिया था। सबसे बडी प्रेरणा यह थी कि देश के प्रधानमंत्री उन्हें विषय सुझा रहे थे। मनोज कुमार ने देश के किसान और जवान दोनों की भूमिका को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय भावना की फिल्म 'उपकार लिखी। उन्होंने इस फिल्म में कुछ अनोखे प्रयोग भी किए। साथ ही हिंदी फिल्मों में राष्ट्रीय भावना का नया मसाला भी दे दिया। स्वयं मनोज कुमार और उनके प्रभाव में अनेक फिल्मकारों ने देशभक्तिऔर राष्ट्रीय भावना की फिल्मों की परंपरा बनाए रखी। आज भी ऐसी फिल्में आती हैं, तो हम उन्हें मनोज कुमार की रची परंपरा से जोडते हैं। ऐसी फिल्मों में नायक की भूमिका निभा रहे कलाकार को भारत कुमार की संज्ञा देते हैं। अभी अक्षय कुमार को 21 वीं सदी का भारत कुमार कहा जाता है।

नई भूमिका में प्राण

मनोज कुमार ने 'उपकार के लिए कलाकारों की नयी टीम चुनी। उन्होंने कलाकारों की पुरानी छवि तोडऩे का भी सफल प्रयास किया। उन्होंने प्राण को मलंग की सकारात्मक भूमिका दी। प्राण हिंदी फिल्मों में बतौर ख्ालनायक स्थापित थे। अपनी कुटिल और क्रूर अदाओं से वह दर्शकों में भय पैदा करते थे और फिल्मों के नायकों को मनोरंजक चुनौती देते थे। मनोज कुमार ने जब प्राण को नई भूमिका का प्रस्ताव दिया तो वह तैयार नहीं हुए। उन्हें डर था कि दर्शक उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। मनोज कुमार ने फिर अपने छोटे भाई पूरण की भूमिका के लिए राजेश खन्ना को चुना था। यह राजेश खन्नाकी पहली फिल्म होती, लेकिन तभी उन्हें टाइम्स टैलेंट के रूप में चुन लिया गया। उनके अनुबंध के मुताबिक वह बाहर की फिल्में नहीं कर सकते थे। लिहाज्ाा मनोज कुमार को उनके विकल्प के रूप में प्रेम चोपडा को चुनना पडा।

ख्ाफा हुईं आशा पारेख

इस फिल्म की नायिका आशा पारेख को मनोज कुमार ने नए अंदाज में पेश किया। उनकी छवि डांसर एक्ट्रेस की थी। मनोज कुमार ने इस फिल्म में उन्हें महज्ा दो गाने दिए। उनमें भी झटकेदार नृत्य नहीं थे। साथ ही उन्होंने आशा पारेख को उनकी सिग्नेचर अदाओं से भी मना किया। स्थिति ऐसी आ गई थी कि दोनों के बीच बोलचाल तक बंद हो गई। आशा पारेख ने पेशेवर ज्िाम्मेदारी के तहत फिल्म पूरी तो की, लेकिन वह मनोज कुमार से इतनी ख्ाफा थीं कि फिल्म के प्रीमियर में नहीं गईं।

रिटर्न ऑफ कामिनी कौशल

इस फिल्म से मां के रूप में कामिनी कौशल की वापसी हुई थी। याद करें तो निरूपा राय के पहले वह हिंदी फिल्मों की मशहूर मां होती थीं। मां कामिनी कौशल अपने दोनों बेटों भारत और पूरण के साथ गांव में रहती हैं। वह चाहती हैं, कि उनके दोनों बेटे अच्छी तरह पढाई करें। गरीबी की वजह से बडे बेटे को त्याग करना पडता है। वह पढाई छोड कर खेती में लग जाता है। वह पूरण को ऊंची पढाई के लिए विदेश भी भेजता है, विदेश से लौटने पर पूरण लालच और भटकाव का शिकार होता है, वह हिस्सा लेकर अलग होना चाहता है। इस बीच भारत-पाकिस्तान युद्ध हो जाता है, तो भारत देश सेवा के लिए मोर्चे पर जाता है। युद्ध में विजय के बाद वह गांव लौटता है, तो उसकी राष्ट्रीय भावना से प्रभावित होकर पूरण भी सुधर जाता है। मनोज कुमार ने शहर, गांव, पश्चिमी सभ्यता, भारतीय मूल्य और परंपरा, नेकी और बदी जैसे अनेक मुद्दों को इस फिल्म की कहानी में पिरोया है। उन्होंने परदे पर देशभक्ति परोसने का कामयाब फार्मूला पेश कर दिया था।

किसान की रोमैंटिक छवि

ग्ाौर करें तो उसके पहले गांव की समस्याओं को फिल्मों में पेश करने का तरीका वास्तविक होने के साथ अलग था। 'मदर इंडिया और 'दो बीघा ज्ामीन में महबूब खान और बिमल रॉय ने किसानों की मुफलिसी और दयनीय स्थिति का चित्रण किया था। उन्होंंने बताया था कि ज्ामींदारी व्यवस्थामें कैसे किसान पिस रहे हैं। मनोज कुमार की 'उपकार का किसान ख्ाुशहाल, शिक्षित और देशप्रेमी है। दरअसल, मनोज कुमार ने भारतीय किसान की रोमैंटिक छवि पेश की। उन्होंने इप्टा से प्रेरित ग्रामीण फिल्मों की ज्ामीन बदल दी। उसे फिल्मी, काल्पनिक और मनोरंजक कर दिया। तर्क था कि आज्ाादी के 20 सालों में देश के किसानों की दशा और सोच में बदलाव आ गया है। उन्हें दर्शकों का समर्थन भी मिला।

यादगार गीत-संगीत

'उपकार के गीतों की भी कहानी है। इस फिल्म में कमर जलालाबादी, इंदीवर, प्रेम धवन और गुलशन बावरा के गीत हैं। गुलशन बावरा ने 'मेरे देश की धरती दूसरे संदर्भ में लिखा था। मनोज कुमार को यह गीत इतना पसंद था कि उसे 'उपकार के लिए चुना और फिल्म की थीम के हिसाब से शब्दोंं में ढाल दिया। 'कसमें वादे, प्यार वफा गीत के लिए मनोज कुमार और कल्याण जी चाहते थे कि किशोर कुमार की आवाज्ा ली जाए। उन्होंने किशोर कुमार से मुलाकात की तो उन्होंने साफ मना कर दिया। उन दिनों उन पर अभिनेता बनने का भूत सवार था। इस फिल्म का गीत 'आया झूम के बसंत प्रेम धवन ने लिखा था। 'उपकार को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और छह फिल्म फेयर पुरस्कार मिले थे। लेकिन जब श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार एक बंगाली फिल्म के साथ उन्हें शेयर करना पडा तो वह इतने नाराज्ा हुए कि उन्होने मेडल ही फेंक दिया और िफर बाद में कभी इस बात का ज्िाक्र भी नहीं किया।

अजय ब्रह्म्ाात्मज