दोस्ती पर आज भी जब किसी फिल्म की बात होती है तो 1964 में बनी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'दोस्ती' के आगे कोई फिल्म खडी नजर नहींआती। दो दोस्तों की अटूट दोस्ती पर आधारित यह फिल्म कैसे बनी, बता रहे हैं फिल्म संपादक अजय बह्म्ाात्मज।

राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'दोस्ती के निर्देशक सत्येन बोस थे। बीना भट्ट की कहानी पर बनी 'दोस्ती की पटकथा और संवाद गोविंद मूूनिस ने लिखे थे। 1949 से फिल्मों में सक्रिय सत्येन बोस को 1958 की फिल्म 'चलती का नाम गाडी से अप्रतिम सफलता मिली थी। इस फिल्म में भी उनके लेखक गोविंद मूनिस थे। यही वजह है कि जब ताराचंद बडजात्या ने उन्हें 'दोस्ती फिल्म के निर्देशन का भार सौंपा तो उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट और संवाद के लिए गोविंद मूनिस को जोडा। ताराचंद बडजात्या को बीना भट्ट की कहानी 'दोस्ती के लिए पसंद थी लेकिन वह आश्वस्त नहीं थे कि बीना भट्ट फिल्म लिख पाएंगी। गोविंद मूनिस ने बीना भट्ट की कहानी का सिनेमाई विस्तार किया। नैतिकता, आदर्श और दोस्ती की मिसाल के रूप में आज भी यह फिल्म याद की जाती है। 'दोस्ती के गीत काफी लोकप्रिय हुए थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों को कर्णप्रिय धुनों से सजाया था। 'दोस्ती के गीत आज भी म्यूजिकल रीअलिटी शो में गाए और दोहराए जाते हैं।

उलझे रिश्तों की कहानी

1964 में बनी दोस्ती की पृष्ठभूमि में मिल मजदूर और उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद होने वाली समस्याएं हैं। फिल्म मजदूर आंदोलन की तरफ मुडने के बजाय नैतिकता व सामाजिकता की राह लेते हैं। मिल मजदूर गुप्ता की मृत्यु काम के दौरान हो जाती है। उनकी पत्नी और इकलौते बेटे रामनाथ को उम्मीद है कि कंपनी से उचित मुआवजा मिल जाएगा। कुछ दिनों बाद पता चलता है कि कंपनी मुआवजे के तौर पर कुछ भी नहीं देगी। इस खबर से हुई घबराहट में पत्नी के पांव सीढियों से फिसल जाते हैं। बेटा रामनाथ डॉक्टर को बुलाने के लिए भागता है और एक गाडी के नीचे आ जाता है। इधर बीवी की मौत होती है और उधर रामनाथ की टांग काटनी पडती है। रामनाथ को किराये के घर से निकलना पडता है। वह मुंबई की सडकों पर आश्रय और आजीविका की तलाश में भटक रहा होता है कि उसकी मुलाकात मोहन से होती है। मोहन अंधा है। मोहन को अपनी बहन मीना की तलाश है, जो नर्स का काम करती है। इस बीच उनकी दोस्ती बीमार लडकी मंजुला से होती है। मोहन और रामनाथ को उम्मीद है कि मंजुला से आर्थिक मदद मिल जाएगी तो रामनाथ की पढाई पूरी हो जाएगी। इस फिल्म में कुछ भी मनचाहा नहीं होता, लेकिन विषम परिस्थितियों में जिस तरह से रामनाथ और मोहन की दोस्ती बनी रहती है, वह उल्लेखनीय है। वे एक-दूसरे का सहारा बने रहते हैं।

दोस्ती की मिसाल

'दोस्ती अपाहिज और अंधे लडके की दोस्ती, त्याग, समर्पण और आदर्श की भावपूर्ण कहानी है। परस्पर सौहार्द और लगाव से वे जिंदगी की मुश्किलों का मुकाबला करते हैं। नैतिकता और आदर्श से लबालब है उनकी दोस्ती। इस फिल्म में कोई भी खलनायक नहीं है। 'दोस्ती में गोविंद मूनिस ने रामनाथ और मोहन को अनाथ रखा है। हिंदी फिल्मों के अनाथ बच्चे भटकाव के शिकार होते हैं। वे या तो किसी गुंडे की गिरफ्त में आ जाते हैं और अपराध की दुनिया में विचरण करने लगते हैं या फिर अभाव और असहाय जिंदगी से दर्शकों को द्रवित करते हैं। 'दोस्ती में रामनाथ और मोहन आरंभ से ही आत्मनिर्भर होने की कोशिश करते हैं। परस्पर समर्पण और शिक्षा के माध्यम से वे आगे बढना चाहते हैं। एक बार उनके गाने से खुश होकर कोई राहगीर उनकी जेब में सिक्का डाल देता है तो रामनाथ नाराज हो जाता है। उसे वह भीख लगती है। मोहन उसे समझाता है कि उसने मांगा तो नहीं, किसी ने खुश होकर कुछ दिया तो वह भीख कैसे हुई। पढाई के लिए पैसों का इंतजाम न होने पर वे गाते-बजाते हैं।

नए कलाकारों का दम

ताराचंद बडजात्या ने इस फिल्म के लिए सत्येन बोस से आग्रह किया था कि वह सुधीर कुमार और सुशील कुमार जैसे नए कलाकारों को मुख्य भूमिकाओं में लें। 1964 का साल याद करें, तब हिंदी सिनेमा में राज कपूर, शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, जितेंद्र से लेकर किशोर कुमार जैसे लोकप्रिय सितारों की धूम थी। राजश्री के कास्टिंग को-ऑर्डिनेटर नंद किशोर कपूर ने इन नई प्रतिभाओं को ताराचंद बडजात्या की बेटी राजश्री के सुझाव पर फिल्मों से जोडा। यह रहस्य ही है कि क्यों बाद में सुधीर और सुशील कुमार को फिल्में नहीं मिलीं, जबकि इसी फिल्म में पहली बार आए अब्बास खान उर्फ संजय खान आगामी वर्षों में पॉपुलर स्टार बने। तब खबर उडी थी कि एक बडे सितारे ने उनकी लोकप्रियता से डर कर उनकी हत्या करवा दी थी। हाल में पता चला कि सुशील कुमार जीवित हैं और मुंबई में ही रहते हैं। उनसे जानकारी मिली कि बाद के वर्षों में सुधीर कुमार की स्वाभाविक मृत्यु हो गई थी।

सुधीर ने तोडा करार

दरअसल, आज की तरह ही ताराचंद बडजात्या ने दोनों कलाकारों के साथ तीन साल का अनुबंध किया था। वह कुछ फिल्मोंं की प्लैनिंग भी कर रहे थे। उस अनुबंध को सुधीर कुमार ने तोड दिया। दरअसल, उन्हें दक्षिण भारत में एवीएम की फिल्म 'लाडला मिल गई थी। ऑफर इतना अच्छा था कि उन्होंने अनुबंध की परवाह नहीं की। 1964 में 'दोस्ती की रिलीज के साल ही राजकपूर की 'संगम, मोहन कुमार की 'आई मिलन की बेला, शक्ति सामंत की 'कश्मीर की कली, चेतन आनंद की 'हकीकत और राज खोसला की 'वो कौन थी जैसी फिल्में पॉपुलर स्टार के साथ रिलीज हुई थीं। 'दोस्ती ने इन सभी फिल्मों का मुकाबला किया।

फिल्मफेयर में छाई 'दोस्ती

उस साल फिल्मफेयर के छह पुरस्कार 'दोस्ती को मिले थे। याद करें तो संगीत श्रेणी में 'दोस्ती के मुकाबले 'संगम और 'वो कौन थी थी। शंकर-जयकिशन और मदन मोहन के मुकाबले लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत को तरजीह दी गई। उन्हें ही पुरस्कार योग्य माना गया। इस फिल्म के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक का भी पुरस्कार मिला था।

गीत-संगीत की कहानी

िकस्सा है कि मोहम्मद रफी को जब पता चला कि उन्हें 'दोस्ती में दो किशोरों के लिए आवाज देनी है तो वह पशोपेश में पड गए। उन दिनों वह दिलीप कुमार, देव आनंद और शम्मी कपूर के लिए गाने गाते थे। मोहम्मद रफी ने इस अवसर को चुनौती के रूप में लिया। किशोर कलाकारों की आवाज के लिए उन्होंने घंटों मेहनत की। इस फिल्म में माउथ ऑर्गन (हार्मोनिका) का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। सभी गानों और बैकग्राउंड के लिए भी आरडी बर्मन ने माउथ ऑर्गन बजाया। दरअसल, एसडी बर्मन के सहायक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की आरडी से दोस्तीे थी। वह उनकी इस प्रतिभा से परिचित थे। फिल्म के संगीत में जब माउथ ऑर्गन की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने आरडी से आग्रह किया। माउथ ऑर्गन प्रेमी बताते हैं कि इस फिल्म के गानों की माउथ ऑर्गन पर नकल करने में सांस उखडने लगती हैं। इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मजरूह सुल्तानपुरी को मिला। इस फिल्म के गीत याद करें 'जाने वालों जरा, मुड के देखो मुझे, 'कोई जब राह न पाए, 'राही मनवा दुख की चिंता और 'गुडिय़ा हम से रूठी रहोगी जैसे गीतों में दर्शन और संदेश निहित हंै।

मूनिस की अनूठी कहानियां

गोविंद मूनिस राजश्री के लिए फिल्में लिखते थे। बाद में उन्होंने इसी प्रोडक्शन के लिए 'नदिया के पार निर्देशित की। हिंदी के मिजाज, मुहावरों और लोकोक्तियों पर उनकी अच्छी पकड थी। इस फिल्म के संवादों में उनका कौशल और ज्ञान दिखता है। 'रोने से क्या होगा, 'इस दुनिया में गरीबों का जीना मुश्किल है, 'आंखों में रोशनी नहीं, पानी तो है, 'क्या आदमी की पहचान कपडे-लत्ते से होती है, 'अच्छे कपडे पहनने से कोई बडा नहीं होता, अच्छे गुण होने चाहिए..., इन संवादों को समाज में रचा-बसा लेखक ही लिख सकता था। गहरे अर्थों को सरल संवाद देना फिल्म के किरदारों के मिजाज की बानगी होते हैं। सत्येन बोस ने फिल्म की शैली सरल और सुबोध

रखी है।

अजय बह्म्ाात्मज