छोटी-छोटी बातों पर लडऩा-झगडऩा, रूठना और पल भर में मान जाना। अब कहां गई वो मासूमियत। जिंदगी की मुश्किलें व्यक्ति को चालाक बना देती हैं। वह हर बात को फायदे-नुकसान के तराजू पर तोलना सीख जाता है पर उसके मन में कैद शरारती बच्चा बाहर निकलने को बेताब रहता है। हम बच्चों की तरह सहज क्यों नहीं हो पाते, क्या उनकी मासूमियत हमें बहुत कुछ सीखने को प्रेरित नहीं करती, भोलेपन को हमेशा कमजोरी क्यों समझा जाता है, बाल दिवस के अवसर पर बच्चों के बहाने अंतर्मन में उठने वाले कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढ रही हैं विनीता। बचपन का दूसरा नाम है बेफिक्री। उम्र का वह मासूमियत भरा दौर जहां ढेर सारी खुशियां रंग-बिरंगे थर्मोकोल बॉल्स की तरह हमारे चारों ओर बिखरी रहती हैं, जिन्हें हम दोनों हाथों से बटोरते नहीं थकते...। जिसके साथ खेलना अच्छा लगा वही दोस्त बन गया, अपने-पराये का कोई भेद नहीं, केवल मौज-मस्ती और ढेर सारी शरारतें! उम्र के साथ बढऩे लगती हैं जिम्मेदारियां और चुनौतियां। क्लास में फस्र्ट आने की जो पहली चुनौती मिलती है, वह ताउम्र हमारा पीछा नहीं छोडती। हम हर इम्तिहान में अव्वल आना चाहते हैं, जिंदगी की इस दौड में आगे बढऩे के साथ बहुत पीछे छूट जाती हैं वो छोटी-छोटी बातें, जो कभी हमारे लिए बडी खुशियों का सबब हुआ करती थीं। हम भूल जाते हैं सच्ची दोस्ती का मतलब और बहुत गुणा-भाग करने के बाद अपने लिए चुनते हैं कुछ ऐसे दोस्त (वे वास्तव में होते नहीं), जो हमें फायदा पहुंचा सकें। समय के साथ हम उस सादगी से बहुत दूर चले जाते हैं, जो हमारे लिए कुदरत की सबसे बडी नेमत थी। फिर भी फुर्सत के पलों में हमें अपने बचपन के दिन बहुत याद आते हैं, जिन्हें हम आज भी पूरी शिद्दत के साथ जीना चाहते हैं पर जिंदगी की भाग-दौड में हमारा बचपना हमसे बहुत दूर होता चला जाता है। बच्चे मन के सच्चे याद कीजिए, बचपन में सच बोलने पर आपको पहली बार डांट कब पडी थी। ....ध्यान नहीं आ रहा, आए भी तो कैसे? जैसे ही हम बोलना सीखते हैं, हमारे शब्दों पर माता-पिता की सेंसरशिप शुरू हो जाती है। दूसरों के सामने ऐसा नहीं बोलते, बडों के बीच में बच्चे को नहीं बोलना चाहिए, जब पापा के लिए कोई फोन आए तो पहले उस व्यक्ति का नाम पूछना चाहिए...नन्ही सी जान एक साथ इतनी हिदायतें कैसे याद रखे? इसी डर से बच्चे झूठ बोलना सीख जाते हैं। जन्मजात रूप से इंसान सच बोलना ही जानता है पर माता-पिता उसे झूठ बोलना सिखाते हैं। बच्चे हमेशा काले को काला और सफेद को सफेद ही कहते हैं। वे इस बात से बेखबर होते हैं कि उनके बोलने का दूसरों पर क्या असर होगा। इसीलिए वे बेखौफ होकर सभी के सामने सच बोल देते हैं। डेनमार्क के कथाकार हेंस क्रिश्चियन एंडर्सन की विश्व प्रसिद्ध लघु कथा 'द एंपरर्स न्यू क्लोद्स' में इस बात को बहुत अच्छे ढंग से समझाया गया है- एक मूर्ख और सनकी राजा अच्छे वस्त्रों का शौकीन था। वह अकसर अपने राज्य के बुनकरों से हर दूसरे दिन कुछ अलग ढंग के वस्त्र तैयार करने की मांग करता। पोशाक पसंद न आने पर वह उन्हें सजा भी देता था। एक बार राजा ने उनसे कहा कि मेरे लिए कोई ऐसा वस्त्र तैयार करो, जो इतना आरामदेह और हलका हो कि उसे पहनने के बाद मुझे वस्त्र का स्पर्श भी महसूस न हो। साथ ही उसकी बुनावट इतनी सुंदर होनी चाहिए कि जब मैं उसे पहन कर निकलूं तो लोग देखते ही रह जाएं। राजा की बातें सुनकर उन बुनकरों ने उससे विशेष किस्म का वस्त्र तैयार करने के लिए थोडी मोहलत मांगी। अंतत: बुनकर वह राजसी पोशाक लेकर दरबार में हाजिर हुए। उन्होंने राजा को समझाया कि ये वस्त्र इतने महीन और पारदर्शी हैं कि किसी को दिखाई नहीं देंगे। फिर राजा को वह 'अदृश्य वस्त्र' पहना कर पूरे नगर में उनकी शोभा यात्रा निकाली गई। राजा को बुरा न लगे, यह सोचकर लोग उस 'पारदर्शी पोशाक' की खूब प्रशंसा कर रहे थे। इसी बीच एक बच्चा सामने आया और भरी भीड में चिल्ला पडा, 'राजा नंगा है।' कहने का आशय यह है कि उस बच्चे की मासूमियत ही उसकी सबसे बडी ताकत थी, जिसकी वजह से वह राजा के सामने भी नहीं डरा। बडे होने के बाद अगर इस मासूमियत का कुछ हिस्सा भी हमारे भीतर बचा रहे तो हम सच बोलने से नहीं डरेंगे। दिल तो बच्चा है कहते हैं, हर इंसान के मन में एक मासूम बच्चा छिपा होता है पर यह तो दुनियादारी का तकाजा है, जो हमें गंभीरता का मुखौटा पहनने को मजबूर करता है। बातचीत के दौरान हम एक-दूसरे से हमेशा यही कहते हैं, 'क्या बच्चों जैसी बातें करते हो?' फिर भी मन के किसी कोने में हमारा बचपना जीवित रहता है और जब भी मौका मिलता है वह बाहर निकलने के लिए चंचल हिरण की तरह कुलांचें भरने लगता है। इसलिए जब हम बच्चों के बीच होते हैं तो थोडी देर लिए खुद को भूलकर उनके साथ हंसने-खेलने और गाने लगते हैं। उन्हीं की तरह तोतली भाषा में बातें करने का आनंद ही कुछ और होता है। बच्चों के साथ कुछ वक्त बिताने के बाद हमें उनकी जिंदगी से रश्क होने लगता है। कई बार यही जी चाहता है, काश! हम भी बच्चे होते तो कितना अच्छा होता, न ऑफिस की टेंशन, न घर की जिम्मेदारियां, कितनी अच्छी है इनकी जिंदगी! इसलिए जब भी मौका मिले, हमें कुछ पलों के लिए बच्चों की तरह बेफिक्र होकर सिर्फ अपने लिए जीना चाहिए। कभी दूसरों की परवाह किए बगैर अपने दिल को जो भी अच्छा लगे, वही करें। यह सच है कि हमारा बचपन वापस नहीं लौट सकता पर बच्चों के साथ थोडा वक्त बिता कर हम अपने बचपन को दोबारा जी सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए कई अध्ययनों से अब यह तथ्य सही साबित हो चुका है कि बच्चों के साथ खेलना और बातें करना तनाव दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। बच्चों का मनोविज्ञान हम बच्चों जैसे सहज क्यों नहीं रह पाते? अकसर हमारे मन में यह सवाल उठता है। आखिर उनके मन में ऐसी क्या बात होती है कि उनकी नाराजगी पल भर में दूर हो जाती है। रोते हुए बच्चे को बहलाने पर वह पल भर में मुसकुराने लगता है लेकिन जब हमारा मन उदास होता है तो हम उसे बहला क्यों नहीं पाते? खिलौना टूट जाने पर बच्चे को बहुत दुख होता है और वह रोने लगता है। जब मां उसे समझाती है कि कोई बात नहीं मैं तुम्हें नया खिलौना दिला दूंगी तो आंसुओं से भरे उसके चेहरे पर पल भर में ही मुस्कान खिल जाती है। आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, 'बच्चों का ब्रेन बहुत तेजी से विकसित हो रहा होता है और उन्हें ढेर सारी नई बातें सीखने की जरूरत होती है। इसलिए यह उनके ब्रेन का स्वाभाविक मेकैनिज्म है कि वे पुरानी और नकारात्मक बातों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं, ताकि जल्द से जल्द कुछ नया सीख सकें। यह प्रक्रिया बिलकुल उसी तरह है, जैसे हम अपने कंप्यूटर में स्पेस बनाने के लिए पुरानी फाइलों को डिलीट करते हैं। हां, फर्क सिर्फ इतना है कि बचपन में यह प्रक्रिया अपने आप बहुत तेजी से चलती रहती है लेकिन उम्र बढऩे के बाद इसे सचेत ढंग से अपनाने की जरूरत होती है। आपने नोटिस किया होगा कि जो लोग ऐक्टिव और कामयाब होते हैं, वे किसी भी बात को लेकर ज्य़ादा देर तक नाराज या उदास नहीं रहते। अगर उन्हें किसी व्यक्ति पर गुस्सा आता है तो उसे उसकी गलती का एहसास दिलाने के बाद वे उसी पल सहज ढंग से बातें कर रहे होते हैं क्योंकि अपनी मन:स्थिति पर उनका पूरा नियंत्रण होता है। अगर बडे भी बच्चों का मनोविज्ञान समझते हुए उन्हीं की तरह नकारात्मक बातें जल्द से जल्द भूलने की कोशिश करें तो उनकी सारी परेशानियां अपने आप दूर हो जाएंगी।' बचकानी नहीं होती हर बात अकसर हम बच्चों को नासमझ मानते हुए उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते पर वास्तव में ऐसा नहीं है। बच्चों का कोमल मन बेहद संवेदनशील होता है और छोटी-छोटी बातों का भी उन पर बहुत गहरा असर पडता है। बचपन में मिलने वाले प्यार-दुलार और मान-अपमान को इंसान ताउम्र याद रखता हैं। हाल ही में अमेरिका स्थित हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में यह तथ्य सामने आया है कि बच्चों में भी आत्मसम्मान होता है। उन्हें बच्चा समझकर उनके साथ हमें कोई भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे। आशीष वर्मा (परिवर्तित नाम) आइएएस अधिकारी हैं। पिता के असामयिक निधन की वजह से उनका बचपन बेहद अभावग्रस्त था। पडोस में ही उनके चाचा का घर था और वे लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न थे पर उनका व्यवहार अच्छा नहीं था। वह बताते हैं, 'बचपन में जब मैं उनके घर टीवी देखने जाता था तो उनके बच्चे सोफे पर बैठे होते पर वे लोग मुझसे जमीन पर बैठकर टीवी देखने को कहते। इससे मुझे बहुत दुख हुआ और मैंने उनके घर जाना बंद कर दिया। उसी वक्त मैंने यह तय कर लिया था कि अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालाने के लिए मैं जी जान लगाकर पढाई करूंगा। आज हमारे पास सब कुछ है पर मैं अब भी उस अपमान को नहीं भूल पाया।' कहने का आशय यह है कि बचपन के अनुभवों का हमारे व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर पडता है। इसलिए हमें बच्चों की भावनाओं को समझते हुए उनके साथ संयमित और संतुलित व्यवहार करना चाहिए। मासूम सवालों के जवाब बच्चे दुख पहुंचाने वाली बातों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं। इसीलिए वे बहुत कुछ नया सीख पाते हैं। बच्चों के सवालों से ज्य़ादातर पेरेंट्स परेशान रहते हैं पर अपनी बाल-सुलभ उत्सुकता की वजह से वे सब कुछ जल्द से जल्द सीख लेना चाहते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि सीखने के क्रम में होने वाली गलतियों से वे जरा भी नहीं घबराते। इसीलिए वे सब कुछ बहुत जल्दी सीखते हैं। आपने गौर किया होगा कि टेक्नोलॉजी से जुडी कोई भी बात बच्चे बहुत आसानी से समझ जाते हैं। दो-तीन साल के बच्चे, जिन्हें ढंग से बोलना भी नहीं आता, वे अपने पेरेंट्स के मोबाइल में उन आइकॉन्स को पहचान लेते हैं, जिनमें उनकी मनपसंद तसवीरें या गेम्स होते हैं। इससे थोडे बडे बच्चों के बारे में क्या कहना! आजकल सातवीं-आठवीं कक्षा के छात्रों को भी इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की इतनी अच्छी जानकारी है कि वे कई नए एप्लीकेशंस और सॉफ्टवेयर तक तैयार कर लेते हैं। बच्चे इतनी आसानी से यह सब इसीलिए कर पाते हैं क्योंकि उनके मन में नई बातें जानने- समझने की अदम्य इच्छा होती है। अगर बडों में भी बच्चों जैसा उत्साह और उत्सुकता हो तो उनके लिए हर काम बहुत आसान हो जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि क्रिएटिव लोग भी बच्चों की तरह कल्पनाशील होते हैं। तभी कोई नया आविष्कार या किसी नई कलाकृति का सृजन कर पाते हैं। यही वजह है कि आजकल बच्चों की परवरिश को लेकर पेरेंट्स और टीचर्स के नजरिये में भी काफी बदलाव आया है। पहले सवाल पूछने वाले बच्चों को डांटकर चुप करा दिया जाता था पर अब ऐसा नहीं है। आजकल लोग यह समझने लगे हैं कि सवाल वही पूछता है, जिसके मन में जानने की इच्छा हो। सयाने होते बच्चे बच्चों के मन को समझना और उन्हें अपनी बातें समझाना भी एक कला है। जो लोग बच्चों के लिए काम करते हैं, वे इस बात को बखूबी समझते हैं। बाल साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रचनाकार मंजरी शुक्ला कहती हैं, 'आमतौर पर बच्चों के लिए लिखना काफी मुश्किल माना जाता है क्योंकि इसके लिए हमें हर बात को बच्चों के नजरिये से देखने और समझने की जरूरत होती है। पांच-छह साल की उम्र तक बच्चों की दुनिया बेहद मासूम और जीवंत होती है। उनकी कल्पना की दुनिया बहुत सुंदर है, जिसमें पशु-पक्षी और पेड-पौधों के अलावा टेबल-कुर्सी जैसी निर्जीव चीजें भी आपस में बातें करती हैं। इसलिए हम बच्चों के साथ उन्हीं की भाषा में संवाद करते हैं। समय के साथ बच्चों की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। टीवी और इंटरनेट ने उन्हें उम्र से पहले ही सयाना बना दिया है। आज के ज्य़ादातर बच्चे ऑनलाइन गेम्स में ही व्यस्त रहते हैं। अब वे उपदेश सुनना बिलकुल पसंद नहीं करते। इसलिए अगर कहानी के माध्यम से उन्हें नैतिक शिक्षा देनी भी हो तो हम उसे इतना रोचक बना देते हैं कि शिक्षाप्रद बातें भी बच्चों को बोझिल न लगें।' अच्छा है थोडा बचपना बोझिल और उदासी भरी बातें बच्चों को अच्छी नहीं लगतीं। वे तो बस, हर हाल में खुश रहना चाहते हैं लेकिन उम्र बढऩे के साथ हमारा हर निर्णय दूसरों की पसंद-नासपंद से प्रभावित होने लगता है। अपनी कोई भी इच्छा पूरी करने से पहले हमारे मन में यही खयाल आता है कि कहीं दसरा व्यक्ति नाराज तो नहीं हो जाएगा, अगर मैं ऐसा करूंगा तो लोग क्या कहेंगे? यही सब सोचकर हम अपनी इच्छाओं को मारना शुरू कर देते हैं। हमें खुद मालूम नहीं होता पर इससे हमारे व्यवहार में चिडचिडापन आने लगता है। ताउम्र हम छोटी-छोटी खुशियों को भूलकर फायदे-नुकसान के गणित में उलझे रहते हैं। फिर प्रौढावस्था में पहुंचने के बाद हमें अपनी इस भूल का एहसास होता है। तब हम दोबारा बच्चों की तरह अपनी खुशियों के बारे में सोचना शुरू करते हैं। यही वजह है कि खास उम्र के बाद लोग नाती-पोतों में अपना बचपन ढूंढने की कोशिश करते हैं। बच्चों को अपने साथ पार्क ले जाना, कहानियां सुनाना और उनसे ढेर सारी बातें करना उनके मन को बहुत सुकून देता है। सच, अगर हमारे भीतर थोडा सा भी बचपना बचा रहे तो यह जिंदगी बेहद खूबसूरत जाएगी। (इंटरव्यू : इंदिरा राठौर, विनीता और दीपाली पोरवाल) खुद भी बच्चा बन जाता हूं रितेश देशमुख, अभिनेता मेरा मानना है कि जीवन को संपूर्णता से जीने के लिए हमें अपने दिल में छिपे बच्चे से दोस्ती कर लेनी चाहिए। यह अलग बात है कि अब तो बच्चों पर भी पढाई और करियर के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बने रहने का इतना जबर्दस्त दबाव होता है कि वे कम उम्र में ही बडे बन जाते हैं। अपने बेटों, रियान और राहिल के जन्म के बाद मेरा बचपन वापस लौट आया है। पिता बनने के बाद मैं ज्य़ादा केयरिंग और जिम्मेदार हो गया हूं। अपने नन्हे से बच्चे को बढते देखने का अनुभव बेहद खूबसूरत होता है। मैं भी आम पिता की तरह अपने बडे बेटे को वॉक पर ले जाता हूं और छोटे का डायपर बदलता हूं। उनके साथ खेलते वक्त मैं भी बच्चा बन जाता हूं। अगर हम अपने भीतर बचपन की सहजता को बचाए रखें तो हमारी कई समस्याएं अपने आप दूर हो जाएंगी क्योंकि ज्य़ादातर परेशानियां ईगो की वजह से ही पैदा होती हैं। अगर हम बुरी यादों को भूलना और लोगों को माफ करना सीख जाएं तो रिश्तों में कभी भी कडवाहट नहीं आएगी। बहुत कुछ सीखती हूं बच्चों से सोहा अली खान, अभिनेत्री बचपन से ही मैंने अपनी अम्मा को हम तीनों भाई-बहनों के लिए अपने आराम और खुशियों का त्याग करते हुए देखा है। मां बनने के बाद किसी भी स्त्री में जिम्मेदारी का भाव खुद ही आने लगता है। वह सब कुछ छोड कर बच्चों की परवरिश में लग जाती है और उनमें ही अपना खोया हुआ बचपन तलाशने लगती है। अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं मां कब बनूंगी। ऐसे निजी सवाल का जवाब देना थोडा मुश्किल है पर मैं इतना जरूर कहूंगी कि मुझे बच्चों से बहुत लगाव है। मुझे उनके साथ बातें करना और खेलना बहुत अच्छा लगता है। उन्हें देखकर मैं हमेशा यही सोचती हूं कि हमें भी उनकी तरह हर हाल में खुश रहना चाहिए। उनके साथ कुछ पल बिताने के बाद सारा स्ट्रेस दूर हो जाता है। मैंने हाल ही में फिल्म '31 अक्टूबर' में तीन बच्चों की मां का किरदार निभाया है। यह फिल्म 1984 के दंगों पर आधारित है। मेरा मानना है कि अगर बडे अपने अंदर थोडी सी मासूमियत बचा कर रखें तो इस दुनिया से नफरत और हिंसा पूरी तरह ख्त्म हो जाएगी। हर हाल में खुश रहना सीखें नावेद जाफरी, टीवी प्रेजेंटर आज हमारी लाइफस्टाइल इतनी स्ट्रेसफुल है कि हम अपने मन में छिपी मासूमियत को खोते जा रहे हैं। ज्य़ादा पैसे और शोहरत कमाने की होड में हम हंसना-मुसकुराना भूल चुके हैं। जिंदगी की परेशानियों को दूर करने के लिए थोडा बचपना भी जरूरी है। अगर हम बच्चों के साथ थोडा सा वक्त बिताएं तो हमारा सारा तनाव पल भर में दूर हो जाएगा। बचपन में मैं बेहद शरारती था और आज भी जब मौका मिलता है तो मुझमें छिपा वह नटखट बच्चा बाहर निकल कर उछल-कूद मचाने लगता है। बच्चों के डांस शो 'बूगी-वूगी' के दौरान मैं भी बच्चों के साथ बच्चा बन जाता था। उनके साथ काम करने का मजा ही कुछ और है। जीती हूं अपने बचपन में मैत्रेयी पुष्पा, साहित्यकार मेरे भीतर 18 साल की चंचल और मासूम किशोरी आज भी जीवित है। मेरी सभी रचनाओं में वह बार-बार नजर आती है। मेरे बचपन की कुछ आदतें अब तक नहीं बदलीं। मसलन, मैं आज भी बहुत खुलकर हंसती हूं और अपनी कोई भी बात दूसरों से छिपा नहीं पाती। 19 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। मैं अपने साथ सारे प्रेमपत्र उठाकर ससुराल ले आई और बहुत खुश होकर पति को दिखा दिए। ...और उन्होंने मुझे बेवकूफ समझकर माफ भी कर दिया। अकसर लोग ऐसे भोलेपन को मूर्खता समझते हैं और इसी वजह से दुनिया से मासूमियत ख्त्म होती जा रही है। आज के बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं लेकिन हमें भी उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मेरी नातिन वासवदत्ता अकसर मुझे इंटरनेट और मोबाइल के नए एप्लीकेशंस के बारे में बताती रहती है। उम्र के इस मोड पर मुझे उसके साथ दोबारा अपने बचपन को जीने का मौका मिला। मेरा मानना है कि कला के क्षेत्र से जुडे लोग उम्र से चाहे कितने ही बूढे क्यों न हो जाएं पर दिल से वे बच्चों जैसे मासूम होते हैं। उनकी यही सादगी और भोलापन उन्हें कुछ सुंदर और नया रचने को प्रेरित करती है। मेरे दिल में बसी गांव की वह मासूम बच्ची आज भी हंसती-खिलखिलाती है। अगर लोगों में थोडा सा बचपना बचा रहे तो यह धरती स्वर्ग बन जाए। दिल से आज भी बच्चा हूं मोहित मलिक, टीवी कलाकार मुझे ऐसा लगता है कि बडों में भी बच्चों की तरह थोडी मासूमियत, उत्साह और जिज्ञासा का होना बहुत जरूरी है लेकिन उम्र के साथ बढती जिम्मेदारियां हमें तनावग्रस्त और चिडचिडा बना देती हैं। मैं इस बात से बहुत डरता हूं कि दुनियादारी की मुश्किलें कहीं मुझे गुस्सैल न बना दें। इसलिए मैं सचेत तरीके से हमेशा खुश और रिलैक्स्ड रहने की कोशिश करता हूं। बचपन में मुझे क्रिकेट खेलना बेहद पसंद था। आज भी फुर्सत के पलों में मेरा बचपना वापस लौट आता है। सच तो यह है कि दिल से मैं आज भी बच्चा ही हूं। बच्चों से मासूमियत ने छीनें सिम्मी श्रीवास्तव, फाउंडर, कथाशाला नोएडा लगभग बीस साल पहले अपने बेटे को कहानी सुनाते वक्त मेरे मन में यह ख्याल आया कि आजकल ज्य़ादातर घरों में बच्चों के दादा-दादी उनके साथ नहीं होते और पेरेंट्स के पास इतना समय नहीं होता कि वे अपने बच्चों को कहानियां सुना सकें। मेरी इसी सोच से 'कथाशाला' की शुरुआत हुई। बच्चों से मुझे बेहद लगाव है। शायद इसी वजह से मैंने कॉरपोरेट वल्र्ड की जॉब छोडकर नर्सरी टीचर्स ट्रेनिंग ली, ताकि मैं डांस, म्यूजिक और पपेट्री आर्ट के माध्यम से कहानियां सुना सकूं। बच्चों को कहानियां सुनाते वक्त मैं भी बच्ची बन जाती हूं। स्टोरी टेलिंग का सेशन काफी मजेदार होता है। इसके लिए मैं तसवीरों और प्रॉप्स की मदद लेती हूं, पात्रों के संवाद को अलग-अलग अंदाज में बोलना, जानवरों की आवाजें निकालना, डांस करना यह सब कुछ मेरी कहानियों में शामिल होता है। बच्चे भी मेरे साथ मिलकर डांस करते हैं, डायलॉग बोलते हैं और पूरे सेशन को खूब एंजॉय करते हैं। सही मायने में हमें बच्चों से जिंदगी जीने की कला सीखनी चाहिए। वे हर हाल में खुश रहना जानते हैं लेकिन बडे ही बच्चों के मन में छल-कपट, ऊंच-नीच और अपना-पराया जैसी नकारात्मक भावनाएं भरते हैं। बच्चे हमसे ही दिखावा सीखते हैं। जैसे-जैसे हम बडे होते हैं, खुलकर हंसना-बोलना भूल जाते हैं क्योंकि हम पर माता-पिता की तरफ से तमाम तरह की बंदिशें लगाई जाती हैं कि ऐसे मत करो लोग क्या कहेंगे, उसके साथ मत खेलो, उससे बातें मत करो... इन्हीं बातों से हम बच्चों की सरलता ख्त्म कर देते हैं। बच्चे बिलकुल मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें हम जिस सांचे में ढालेंगे, वे वैसे ही ढल जाएंगे। मैं पेरेंट्स से यही गुजारिश करती हूं कि वे बच्चों से उनकी मासूमियत न छीनें। समय के साथ वे खुद ही समझदार हो जाएंगे। उन्हें सहज ढंग से खेलने और बढऩे का मौका दें। वाकई बच्चे हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं। अगर हमारा मन भी उनकी तरह निश्छल हो तो हमारे लिए यह जिंदगी बहुत आसान हो जाएगी।