अपनी अच्छाई को अपने तरीके से बचाए रखने की कोशिश करते हुए अगर हम दूसरों को उनकी अच्छाई बचाए रखने से वंचित करने की कोशिश नहीं करते या उसमें बाधा नहीं पहुंचाते तो यही सच्ची स्वतंत्रता है। जॉन स्टुअर्ट मिल की ये पंक्तियां आजादी को बेहतर ढंग से परिभाषित करती हैं। स्वतंत्रता की चाह सभी जीव-जंतुओं में समान रूप से होती है। पिंजरे में बंद कोयल गाती भले ही नजर आए, मगर चहचहाना तो वह दरख्तों पर ही चाहती है, बंद चूजा चाहता है कि अंडे की मजबूत दीवारें तोड कर बाहर निकले, नन्ही सी गौरैया अपने परों के सक्षम होने का इंतजार करती है ताकि डाल-डाल पर मर्जी से उड सके और दुनिया को अपनी नजरों से देख सके....। आजादी की चाह इंसान के भीतर जन्म से होती है। छोटा सा बच्चा रोकर या जिद करके इस इच्छा को जाहिर करता है, कई बार माता-पिता की उंगलियां छोड कर चलना चाहता है, फिर भले ही चलने की कोशिश में गिर क्यों न पडे! यही तो है आजादी... सम्मान, स्वाभिमान और समानता से जीने की, फिर चाहे इस तरह जीने में ठोकरें क्यों न खानी पडें! पीडा गुलामी की व्यक्ति आजाद जन्म लेता है लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकडा है....दार्शनिक-चिंतक रूसो का यह कथन भले ही अतिवादी हो, लेकिन हर इंसान कई बंधनों से ग्रस्त है। ये बंधन निजी स्तर पर नकारात्मकता, हीन-भावना, अशिक्षा, ईष्र्या, अहं, तनाव, दुख, पीडा के हो सकते हैं तो सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर आतंकवाद, अत्याचार, भेदभाव, भ्रष्टाचार और कुप्रथाओं के हो सकते हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी 'प्रवोक्ड'। एक हिंदुस्तानी लडकी एनआरआई लडके से शादी करके लंदन में बस जाती है। शादी के बाद लडकी को मानसिक-शारीरिक प्रताडऩा मिलती है। एक दिन गुस्से में लडकी पति के पैर जलाना चाहती है, ताकि वह जान सके कि पत्नी घरेलू हिंसा झेल कर कैसा महसूस करती है मगर इस हादसे में पति की मौत हो जाती है। हत्या के आरोप में लडकी को जेल हो जाती है। जेल में रहते हुए उसे महसूस होता है कि वह अब आजाद है। वह अन्य कैदियों के साथ हंसती-बोलती है, जिसे वह बीती जिंदगी में भूल चुकी थी। यहां सलाखें लडकी के लिए आजादी का संदेश लेकर आती हैं। मानसिक गुलामी से आजादी आजादी का अर्थ है- मानसिक गुलामी से मुक्ति। गुलाम दिमाग सोचने-समझने की क्षमता खो देता है। मशहूर अभिनेता स्वर्गीय बलराज साहनी ने वर्ष 1972 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एक अद्भुत भाषण दिया था। इसमें उन्होंने आजाद और गुलाम दिमाग का फर्क छात्रों को समझाते हुए अपना एक अनभव शेयर किया। '...एक बार मैं परिवार के साथ गर्मी की छुट्टियां बिताने रावलपिंडी से कश्मीर जा रहा था। बारिश के चलते जगह-जगह भूस्खलन हो गया था और सडक बंद हो गई थी। दोनों तरफ गाडिय़ों की लंबी कतारें लग गर्ईं। पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी सडक की मरम्मत करवाने में जुट गए, फिर भी ड्राइवर्स और यात्री उन्हें सुस्त और निकम्मा कहते। आखिरकार रास्ता खुला और सबको हरी झंडी दिखा दी गई। फिर एक मजेदार वाकया हुआ। कोई अपनी गाडी आगे बढाने को ही तैयार नहीं था। रास्ता कच्चा था, खतरनाक भी। एक तरफ पहाड तो दूसरी तरफ खाई। सब एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे कि कोई तो आगे बढे। तभी पीछे से एक छोटी सी स्पोर्ट्स कार आकर रुकी, जिसे एक अंग्रेज चला रहा था। उसने पूछा, क्या हुआ? उसे बताया गया कि कच्चा रास्ता देख कर लोग आगे बढऩे से डर रहे हैं। यह सुनकर वह मुस्कराया, गाडी स्टार्ट की, हॉर्न दिया और बेखौफ आगे निकल गया। इसके बाद का नजारा देखने लायक था। सारी गाडिय़ां हॉर्न बजाते हुए एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करने लगीं। भगदड सी मच गई। तब मुझे महसूस हुआ कि आजाद दिमाग और गुलाम दिमाग में क्या फर्क होता है।' फैसला लेने की आजादी 'आज भी स्त्रियों को अपने बारे में फैसला लेने का अधिकार नहीं है...,' कहती हैं पारस हॉस्पिटल, पंचकुला की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिल्वा। वह कहती हैं, 'आजादी के इतने सालों बाद भी स्त्री को अपने बारे में फैसला लेने की आजादी नहीं है। सबसे अहम है अपने शरीर पर अपना अधिकार। स्त्री को शादी करने, बच्चा पैदा करने या न करने जैसे फैसले लेने का अधिकार होना चाहिए। आज देश की कितनी स्त्रियां उचित चिकित्सा के अभाव में प्रसव के दौरान मर जाती हैं। शिशु जन्म बडा फैसला है मां और बच्चे दोनों के लिए। शिशु भी दुनिया के नए सदस्य होते हैं और उन्हें सही पालन-पोषण का अधिकार है, जो एक स्वस्थ और सक्षम मां ही उन्हें दे सकती है। केवल स्त्री को ही यह अधिकार होना चाहिए कि वह जन्म देना चाहती है या नहीं। गर्भावस्था के दौरान उन्हें खुश रहने का अधिकार है। अगर वह खुश नहीं है तो बच्चा भी खुश नहीं होगा। खतरनाक चिकित्सा पद्धतियां स्त्री को नुकसान पहुंचाती हैं। हर स्त्री को गर्भावस्था के दौरान उचित चिकित्सा सुविधा मिले, ताकि वह स्वस्थ शिशु को जन्म दे, यह उसका अधिकार है और उसे हर हाल में मिलना चाहिए। यह तभी संभव होगा, जब हॉस्पिटल्स सुविधाओं से लैस होंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री को प्रसव-पीडा से नहीं गुजरना होगा लेकिन पीडा कुछ कम जरूर होगी...।' देना भी सीखें अब्राहम लिंकन का एक कथन है, 'जो लोग दूसरों को आजादी नहीं देते, उन्हें खुद भी इसका हक नहीं होता। आजादी कोई भेदभाव नहीं करती स्त्री-पुरुष या अमीर-गरीब में। लेकिन यह सच है कि एक की आजादी वहीं तक सही है, जहां तक कि वह दूसरों के अधिकारों का हनन नहीं करता। सवाल यह भी उठता है कि क्या हम अपने घर, ऑफिस, सामाजिक जीवन में दूसरों को आजादी और उनका यथोचित सम्मान दे पाते हैं? महात्मा बुद्ध का एक कथन था, वीणा के तारों को इतना भी न कसो कि वे टूट जाएं और इतना भी ढीला न छोडो कि वे बज ही न पाएं। आजादी भी वीणा के तारों जैसी ही है। मर्यादा से बाहर जाते ही या तो वह खत्म हो जाती है या वह बिखर जाती है। आजादी दूसरे को सम्मान देना भी है। एक व्यक्ति किसी फ्रीजर प्लांट में काम करता था। एक दिन वह शाम को काम कर रहा था। छुट्टी का समय था और सारे सहकर्मी जाने को तैयार थे। तभी प्लांट में कोई तकनीकी गडबडी आ गई और उसे रुक कर उसकी जांच करनी पडी। इस काम में उसे काफी देर हो गई। बत्तियां बुझा दी गईं और दरवाजे सील हो गए। वह प्लांट में बंद हो गया। कुछ सोच रहा था कि उसने पाया कि दरवाजे के खुलने की आवाज आ रही है। यह एक चमत्कार ही था। उसने सामने सिक्योरिटी गार्ड को टॉर्च लेकर खडे देखा। उसने पूछा, 'तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहां हूं' तो गार्ड ने जवाब दिया, 'सर, यहां इतने लोग काम करते हैं लेकिन आप ही हैं, जो सुबह आने पर हेलो और शाम को जाते हुए बाय कहते हैं। आज आपने हेलो कहा लेकिन जाते हुए बाय नहीं कहा। मुझे लगा कि कुछ गडबड है। इसीलिए देखने चला आया।' शायद उस व्यक्ति को भी नहीं पता था कि दूसरों को आजादी व सम्मान देने की उसकी यह आदत एक दिन उसकी जिंदगी बचाएगी। स्वतंत्रता-सफलता का द्वंद्व कई बार स्वतंत्रता को सफलता से जोड कर देखा जाता है। महात्मा गांधी का कथन है, गलती करने की स्वतंत्रता न हो तो फिर स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। आजादी सिर पर कफन बांध कर चलना ही तो है। स्वतंत्रता की राह में जरूरी नहीं कि हर बार सफलता मिले। एक सफलता से पहले 100 विफलताएं मिल सकती हैं। जैसे ही हम स्वतंत्रता को सफलता से जोड कर देखते हैं, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर कर देते हैं। समाजशास्त्री डॉ. ऋतु सारस्वत कहती हैं, 'आजादी प्रयासों में है, न कि सफलता में। समाज के आदर्श वो लोग होने चाहिए जिन्होंने प्रयास किए। अपनी कोशिशों में उन्हें सफलता मिली या विफलता, यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। मान लें, एक लडकी अपना जीवनसाथी चुनती है। उसका यह फैसला गलत हो सकता है। क्या इसका अर्थ यह होगा कि इससे प्रयास करने, फैसले लेने की उसकी आजादी छीन ली जाए? फैसला लेना और आगे कदम बढाना महत्वपूर्ण है।' मशहूर हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर पहले बस कंडक्टर थे। तब उनका नाम बदरुद्दीन काजी था। वे मिमिक्री करके लोगों को हंसाते थे। उनके पिता मिल मजदूर थे। आर्थिक तंगी के कारण वे लोग मुंबई चले आए। एक दिन एक सप्लायर ने उन्हें किसी की नकल उतारते देखा और एक्स्ट्रा के लिए रख लिया। तब भीड में खडे होने के लिए उन्हें पांच रुपये मिला करते थे। वहां भी वह फुर्सत में कलाकारों को लतीफे सुनाया करते। फिर उन्हें गुरुदत्त की फिल्म 'बाजी ' में भूमिका मिली और नया नाम जॉनी वॉकर मिला। साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत कहते हैं कि कंडक्टर से स्टार बनने की प्रेरणा उन्हें जॉनी वॉकर से ही मिली। जिम्मेदारी है स्वतंत्रता आजादी अपने साथ कई जिम्मेदारियां लेकर आती है। अगर कोई अपने लिए आजादी चाहता है तो उसे पहले जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार रहना होगा। उसके साथ जुडे खतरों का सामना करना होगा। जिम्मेदारी से रहित आजादी अनुशासनहीनता और उच्छृंखलता को जन्म देती है। आजादी का सही अर्थ है-नागरिक धर्म का पालन करते हुए इस तरह विकास करना कि किसी को नुकसान न पहुंचे। आजादी पा लेना काफी नहीं है, उसे बरकरार रखना भी बडी चुनौती है। डॉ. सारस्वत कहती हैं, 'आजादी की भी एक मर्यादा होती है। जैसे, छात्रों का प्राथमिक कार्य पढाई करना है। यही उनका कर्तव्य है। कई बार वे छात्र-हित की बात पर संगठन बनाते हैं। इसके बाद वे बात-बात पर नारे लगाते हैं, जुलूस निकालते हैं या कक्षाओं में जाकर कॉलेज या यूनिवर्सिटी की संपति को नुकसान पहुंचाते हैं तो यह आजादी का दुरुपयोग है। अपनी आजादी और अधिकार पाने से पहले अपने कर्तव्यों को समझना होगा।' स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि सिर्फ अधिकारों की बात करें, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी को कुछ भी बोलें या सार्वजनिक तौर पर अपमानित करें, हिंसा और आतंक के बल पर अपनी बात मनवाने की कोशिश करें। महात्मा गांधी का विचार था, 'हिंसक तरीकों से हिंसक आजादी ही मिल सकती है।' आजादी के नाम पर हिंसा, आतंकवाद या तोड-फोड को किसी भी हाल में जायज नहीं ठहराया जा सकता। आजादी शोर मचाने में नहीं, अपने कर्तव्यों का पालन करने और शांतिपूर्ण व संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने में निहित है। स्वतंत्रता कभी इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती कि वह निजी स्वार्थ के आग देश हित को त्याग दे। कुछ बंधन-कुछ आजादी महर्षि अरविंद का कहना है, 'सारा संसार स्वतंत्रता चाहता है, फिर भी हर जीव बंधनों से प्यार करता है। यह हमारी प्रकृति का बडा विरोधाभास है।' यह सच है कि संविधान, नियम-कानून, सामाजिकता, रिश्ते और मान-मर्यादा के बंधन व्यक्ति को उच्छृंखल बनने से रोकते हैं। इनमें से कुछ बंधन मनुष्य स्वयं चुनता है और कुछ उसे राज्य और समाज से मिलते हैं। इनके दायरे में रहते हुए आगे बढऩा ही संतुलित स्वतंत्रता है। हर इंसान खुली हवा में सांस लेने को स्वतंत्र है लेकिन इसके लिए वह दूसरे की हवा को बांध कर नहीं रख सकता। उस बच्चे को खिलखिलाते देखें, जिसे उसका पिता हवा में उछाल रहा है। हवा में उछलता बच्चा मुक्त होकर इसलिए खुश होता है क्योंकि उसे पता है कि उसे संभालने के लिए उसके माता-पिता हैं। परिवार, समाज और राज्य के नियम-कानून भी उस अभिभावक की तरह हैं, जो व्यक्ति को पूरी आजादी देते हैं लेकिन यह भी देखते हैं कि उसका अनुशासित इस्तेमाल हो ताकि व्यक्ति लडख़डाए तो उसे संभाला जा सके। समूची प्रकृति नियमों पर चल कर ही संसार की गति को संतुलित रखती है। आजादी भी संतुलित-संयमित ढंग से आगे बढऩे का नाम है। अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर व्यापक दुनिया के बारे में सोचना ही असल आजादी है। अपने आप से मुक्त होना है आजादी मैंने अपने निजी और प्रोफेशनल जीवन में हमेशा आजादी महसूस की है। मेरे लेखन को किसी ने बदला नहीं। लेखन ही मेरे लिए सब कुछ है। मैं इसमें सही सुझावों का स्वागत करता हूं और इसे आजादी का हनन नहीं मानता क्योंकि फिल्म का लेखक कहानी की शुरुआत है, उसका अंत नहीं है। ऐसे में हर सुझाव को सुनना और जरूरत पडऩे पर मानना मुझे आता है। मेरे लिए आजादी का मतलब है अपने आप से स्वतंत्रता। दरअसल हम सभी एक सांचे में बडे होते हैं। हमारी परवरिश, शिक्षा, समाज हमारे जीवन को आकार देते हैं। ये सभी एक खास तरीके से हमारा निर्माण करते हैं। आगे चलकर आजादी में ये सारी चीजें कई बार बाधक हो जाती हैं। एक सीमा में रहकर जीवन जीने से दूसरी दुनिया के दरवाजे बंद हो जाते हैं। जीवन में एक पडाव आता है, जब हमें अपने आप से मुक्त होना पडता है, साथ ही समाज के गलत नियमों को भी तोडऩा होता है। मेरे लिए सही मायने में आजादी का अर्थ यही है। कमलेश पांडे, फिल्म लेखक आजादी पर न हो कोई पहरेदारी आजादी हर इंसान के लिए अहमियत रखती है। अभिव्यक्ति, जीवन जीने, रहन-सहन, पहनावे की लक्ष्मण रेखा क्या हो, यह हमारे देश में अभी पेचीदा विषय बना हुआ है। मेरे खयाल से जिस दिन लोगों की पसंद-नापसंद से कथित पहरेदारी खत्म हो जाएगी, उस दिन हम असल मायनों में आजाद हो जाएंगे। मिसाल के तौर पर मैं जिस परिवार व समाज से आता हूं, वहां कोई बंदिशें नहीं थीं। करियर से लेकर जीवनसाथी चुनने तक की आजादी हमें है। ये बुनियादी सहूलियतें मिल जाएं तो हर कम्युनिटी और समाज में मुहब्बत व भाईचारा कायम रह सकता है। हमारी फिल्म लाइन में असल धर्मनिरपेक्षता की मिसाल मिलती है। काश कि हर देशवासी ऐसी बराबरी को अपना पाता तो देश जन्नत हो जाता। वैसे अब तो छोटे शहरों व कसबों में भी लडकियों को आजादी मिल रही है। डिजिटल क्रांति से भी उनकी राहें आसान होंगी। अर्जुन कपूर, अभिनेता संकीर्ण विचारों से निकलें बाहर हम सभी को आजादी का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए। आजादी के साथ ही कई तरह की जिम्मेदारियां भी साथ मिलती हैं, उन्हें भी दिल से निभाने की चाह होनी चाहिए। मेरा मानना है कि समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाना चाहिए, साथ ही अपने विचारों को स्वतंत्र रखना चाहिए। अपने आप को संकीर्णता की बंदिशों से मुक्त रखें, तभी वास्तव में आजाद कहलाएंगे। हरभजन सिंह, क्रिकेटर स्वतंत्रता का मतलब मनमर्जी नहीं मेरे लिए आजादी अनमोल है क्योंकि शहीदों के बलिदान के बाद यह हमें मिली है। आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं तो इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, साथ ही आजादी की कीमत भी समझनी चाहिए। मेरे लिए आजादी का अर्थ विचारों की अभिव्यक्ति से है। सामाजिक दबाव के बिना सही या गलत में फर्क करने की आजादी होनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी की भावनाओं को आहत करें या मजाक में किसी का अपमान करें। आजदी का अर्थ सामाजिक जिम्मेदारी भी है। मैं जब कभी अपने परिजनों या दोस्तों के साथ रहता हूं तो रिश्तों की सीमा-रेखा का ध्यान रखता हूं। यही फासला हमें जोडे रहता है। सीमा लांघने पर रिश्तों में दरार आने लगती है। दुनिया में कई जगहों पर लोगों को अभिव्यक्ति या पसंदीदा काम करने की आजादी नहीं है। हमें यह अधिकार मिला है तो उसका नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए। अपनी बात करूं तो अभी मैं हिंदी सिनेमा में नया हूं लेकिन मुझे कोई दबाव महसूस नहीं हुआ। अपनी भूमिका कैसे करूं, यह आजादी मुझे है। अगर उसमें कोई सकारात्मक बदलाव करने का सुझाव मिलता है तो उसे मैं जरूर करता हूं। इससे मेरा अहं आहत नहीं होता। वरुण शर्मा, ऐक्टर क्रिएटिव स्वतंत्रता तो जरूरी है मेरे लिए आजादी का मतलब सोचने, बोलने और अपनी कला का विस्तार करने की आजादी से है। हमारे देश को बडी मुश्किल से आजादी मिली है इसलिए हमें इसकी कद्र करनी चाहिए। हमें बेहतर जिंदगी और भविष्य मिल सके, इसके लिए शहीदों ने कुर्बानियां दी हैं। आज के माहौल में सबको एकजुटता के सूत्र में बंध कर आजादी और सम्मान को बनाए रखने की जरूरत है। मैं मानता हूं कि हमें किसी की स्वतंत्रता को बाधित नहीं करना चाहिए चाहे वह हमसे छोटा हो या बडा। मैं कोरियोग्राफर हूं, लिहाज मुझे अपने लिए क्रिएटिव आजादी चाहिए और वह मुझे मिलती भी है। इसी से मेरी राहें आसान हुर्ईं और मैं अपना विकास कर सका। कला कभी दबाव में नहीं उभर सकती। मुझे भी हर जगह खुल कर अपनी कला को जीने का एहसास मिला है, मैंने कभी किसी दबाव में काम नहीं किया, इसीलिए बेहतर कर पा रहा हूं। बोस्को मार्टिस, कोरियोग्राफर गायन में ली है पूरी स्वतंत्रता आजादी बिना बंधनों और सीमाओं के नहीं हो सकती। आजादी चाहते हैं तो उससे जुडी जिम्मेदारियों को समझना होगा। कश्मीर मसले को लें। कितने साल हो गए इसे? धरती का स्वर्ग कही जाने वाली धरती बदहाल है। वहां इतने वर्षों में विकास नहीं हुआ, लोग परेशान हैं और इसका सकारात्मक हल चाहते हैं। आजादी का मतलब यह नहीं है कि देश को तोड दें। वैसे मैं गायिका हूं और संगीत के फील्ड में स्वतंत्रता का अलग अर्थ होता है। मैंने बेगम अख्तर और गिरिजा देवी से संगीत की तालीम हासिल की है। इसलिए मेरी गायन शैली पर लखनऊ और बनारस घराने की छाप है। गायन में जब जहां जैसी जरूरत पडी, मैंने बदलाव किया है। मैं मानती हूं कि संगीत एक नदी है। जिस तरह नदी में पत्ते आकर गिरते हैं और नदी इसे खुद में समाहित कर लेती है, उसी तरह संगीत में भी समय-समय पर बदलाव होते हैं। मेरी गुरु बेगम अख्तर भी मानती थीं कि बदलाव होने चाहिए। उन्होंने एक गीत 'कोयलिया मत कर पुकार' को दादरा की तरह पेश किया और वह बहुत लोकप्रिय हुआ। लेकिन मैं यह भी मानती हूं कि परंपरा का अपना आनंद है। मैं खुद परंपरागत गजल और ठुमरी गाती हूं। अल्लामा इकबाल को मैं दादरा या ठुमरी की तरह पेश कर रही हूं, कई लोगों को इस पर भी एतराज होता है। मैंने कबीर की गजल भी गाई है। मैं संतों की वाणी नहीं, उनके विचार मानती हूं लेकिन मैं गजल को गीत बनाने के पक्ष में नहीं हूं। इसकी वजह यह है कि गजल में सरगम और तिहाइयां डालना गलत है क्योंकि ये सब खयाल की चीजें हैं। रेखा सूर्या, शास्त्रीय गायिका, दिल्ली नियमों पर चलना ही है आजादी अपने राष्ट्रीय गान को गाते हुए हम सम्मान में खडे होते हैं, झंडा देख कर गर्व महसूस करते हैं। यही तो आजादी है। मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी आजादी नहीं है। मिडिल ईस्ट में तो सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है लोगों को लेकिन भारत में हम अपना विरोध भी दर्ज करा सकते हैं। समस्या तब आती है, जब हम आजादी का सुख तो उठाना चाहते हैं मगर उससे जुडी जिम्मेदारियों से मुंह चुराते हैं। परिवार के स्तर पर ही देखें। मैं पढाई में अच्छा था, पापा की ख्वाहिश थी कि सरकारी नौकरी में जाऊं लेकिन मैं अपना काम करना चाहता था। बाद में उन्होंने मेरे फैसले की कद्र भी की। आज मेरी बेटी बराबरी पर खडी होकर बात करती है, फिर भी कई बार उसे लगता है कि उसकी आजादी बाधित हो रही है। हर दौर में हमें कभी न कभी ऐसा महसूस होता है। मैं स्वतंत्रता का हिमायती हूं लेकिन बिना अनुशासन के इसका आनंद नहीं है। अगर मैं आज के समय में बच्चों को नेट, सोशल साइट्स या व्हॉट्सएप से रोकूं तो यह उनकी आजादी के खिलाफ होगा लेकिन पेरेंट होने के नाते मुझे इसके लिए उनका निश्चित समय तय करना होता है, ताकि उनकी पढाई प्रभावित न हो। इसी तरह कॉरपोरेट सेक्टर में भी आजादी की सीमाएं तय करनी पडती हैं। मैं सबको काम करने की आजादी देता हूं लेकिन कुछ नियम भी बनाने होते हैं ताकि काम अपनी गति से होता रहे। कई बार मेरे साथ ऐसा भी हुआ कि मुझे लगा अकेले कर लूंगा, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं समझी, लेकिन इसका परिणाम ठीक नहीं रहा। इसलिए आज मुझे लगता है कि अपने अहं को किनारे रखते हुए सबसे सीखने, पूछने, राय लेने और सुझाव मानने से किसी की आजादी बाधित नहीं होती। -डॉ. समीर कपूर, वरिष्ठ कम्युनिकेशन कंसल्टेंट मुझे मिली है फैसले लेने की आजादी आजादी तो हर किसी को चाहिए क्योंकि यह इंसान को बेहतर काम करने की आशा देती है। फिर चाहे वह प्रोफेशनल जीवन हो या निजी । बचपन से ही मेरे माता-पिता ने मुझे आजादी दी है। हर फैसले में मुझे उनका साथ मिला है। मेरे हर सही और गलत फैसले में वे मेरे साथ रहते हैं। सच कहूं तो एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में भी मेरी यह आजादी बरकरार है, तभी तो परदे पर अलग-अलग किस्म के किरदार निभाने का अवसर मिलता है। आजादी न मिले तो हम अपनी कला को कैसे निखार सकते हैं? फिल्ममेकिंग टीम वर्क है। सिनेमा निर्देशक का मीडियम है। निर्देशक के विजन को ऐक्टर पर्दे पर प्रस्तुत करते हैं। कई बार हमें निर्देशक के विजन को ध्यान में रखते हुए काम करना पडता है मगर अपने विचार रखने की आजादी हमें होती है। हम फिल्म से जुडे किसी भी मसले पर राय दे सकते हैं। ऐक्टर के लिए यह सबसे जरूरी है। मंजरी फडणीस, अभिनेत्री साक्षात्कार : मुंबई से प्राची दीक्षित, अमित कर्ण, स्मिता, दिल्ली से इंदिरा