सिनेमा से लेकर वास्तविक जिंदगी तक बोल्ड शब्द का कई तरह से प्रयोग किया जाता है। क्या इसकी परिभाषा महज कुछ उत्तेजक फिल्मी दृश्यों तक सिमटी है या फिर बोल्डनेस विचारों, व्यक्तित्व और कार्यों में भी प्रतिबिंबित होती है? रील से रीअल जिंदगी तक क्या है बोल्डनेस, बता रही हैं थिएटर, फिल्म व टीवी कलाकार असीमा भट्ट।

हिंदी सिनेमा में बोल्ड का जो मतलब है, उसे लेकर अकसर सेंसर बोर्ड में भी बहसें चलती हैं। फिल्म की बोल्डनेस के हिसाब से उसे 'यू (यूनिवर्सल) या 'ए (अडल्ट) जैसा सर्टिफिकेट दिया जाता है। कई बार ऐसा लगता है कि बोल्डनेस का वास्तविक अर्थ ही लोगों को मालूम नहीं है। गूगल सर्च इंजन पर बोल्ड टाइप करते ही कई ऐसे लिंक या तसवीरें आने लगती हैं, जिन्हें भारतीय मापदंडों के आधार पर सभ्य या पारिवारिक नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के कथित 'बोल्ड सीन्स भी इसी आधार पर तय होते हैं कि कौन कितना एक्सपोजर कर सकता है। यहां तक कि फिल्म-निर्माता भी यही मानते हैं कि बोल्ड दृश्यों का मतलब बेडरूम सीन्स या कम कपडे पहनने से है। सवाल यह है कि अगर इसे ही बोल्डनेस मान लिया जाए तो उन आदिवासी जनजातियों को क्या कहेंगे, जो सचमुच कम कपडों में रहते हैं? ऐसा पहनावा उनकी संस्कृति में ही निहित है।

नजारे वास्तविक जीवन के थिएटर वर्कशॉप्स के दौरान मुझे गांव-देहात में जाना पडता है। एक बार हरियाणा में हो रही कार्यशाला के दौरान किसी स्त्री को देखा, जो चारा मशीन पर काम कर रही थी। झुकने से उसके कुर्ते का गला कुछ खुल गया था। थोडी ही दूरी पर खडा एक पुरुष उसे अजीब सी नजरों से घूर रहा था। स्त्री ने पुरुष को ताडते हुए पकडा तो काम रोक कर तुरंत बोली, 'के हुआ? तने मां ने दूध नहीं पिलाई से के? इतना सुनना था कि पुरुष वहां से खिसक गया। मेरे विचार से यही है बोल्डनेस, जो गलत को गलत कहने का साहस दे सके।

मुंबई में कई बार देर रात घर लौटना पडता है। रात में कई बार कुछ सेक्स वर्कर्स से साबका पडता है। एक स्त्री से पूछा, तुम्हें मालूम है कि तुम क्या और क्यों कर रही हो? उसने सीधा जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता कि मैं जो कर रही हूं, वह सही है या नहीं, बस इतना चाहती हूं कि मेरे बेटे बडे होकर पिता की तरह शराबी न बनें, पढ-लिख कर समाज में सिर उठा सकें। मैं पढी-लिखी नहीं, इसलिए यह काम करती हूं। कोलकाता की दुष्कर्म पीडित जेनेट अब इस दुनिया में नहीं है। उसने एक टीवी शो में कहा था, 'मेरे साथ जो हुआ, उसकी जिम्मेदार मैं नहीं हूं तो मुझे शर्म क्यों आनी चाहिए या इस बात को क्यों छिपाना चाहिए?

बेबाकी और स्पष्टता ये आम स्त्रियां कितनी बेबाकी से अपनी बात रखती हैं। ये अपने दृष्टिकोण में बिलकुल साफ हैं। ये असाधारण बात को भी सामान्य ढंग से कह जाती हैं। इस बेबाकी को सीखने में लोगों की उम्र निकल जाती है। यही है बोल्डनेस...जो भी करें, अपने विचारों, रहन-सहन और कार्यों में स्पष्ट रहें।

संकुचित नहीं यह शब्द हिंदी सिनेमा व साहित्य में बोल्ड लेखन या दृश्यों को लेकर बडी हाय-तौबा है जबकि जिंदगी की हकीकत सिनेमा और किताबों से बेहद दूर निकल चुकी हैं। सच्चाई से अपनी बात कहने का साहस ही बोल्डनेस है। यहां अश्लीलता और बोल्डनेस के फर्क को भी समझना होगा। बोल्डनेस एक पैकेज है, जिसमें विचार, स्वाभिमान, बॉडी लैंग्वेज, स्पष्टता, आत्म-निर्भरता जैसी कई बातें शामिल हैं। केवल आधुनिक फैशन अपनाकर, शराब-सिगरेट पीकर, पब में जाकर या डिस्को में डांस करने से ही बोल्डनेस नहीं आती।

फिल्म कहानियां हों बोल्ड बॉलीवुड में फिल्म या टीवी में काम करने से पहले एक फॉर्म भरवाया जाता है, जिनमें सामान्य जानकारियों के अलावा एक कॉलम होता है, जिसमें पूछा जाता है, 'बोल्ड सीन्स करने में आप कितने कंफर्टेबल हैं? अगर इसका मतलब पूछें तो यह बेहद सीधा होता है कि बेडरूम सीन्स करने या फूहड अंग-प्रदर्शन करने में कोई प्रॉब्लम तो नहीं है?

बोल्डनेस का इन बातों से कोई लेना-देना नहीं है। जरा श्याम बेनेगल की फिल्में देखें...स्मिता पाटिल या शबाना आजमी पर कई बेडरूम सीन्स फिल्माए गए हैं मगर ये दृश्य फूहड या अश्लील नहीं लगते क्योंकि वे कहानी का जरूरी हिस्सा होते हैं। कई ऐसे दृश्य नाटकों में भी आते हैं। मणिपुर के कन्हैया लाल का नाटक है 'द्रौपदी, इसकी नायिका स्टेज पर कुछ पल के लिए वस्त्रहीन दिखती है। राजेंद्र सिंह बेदी की फिल्म 'दस्तक की नायिका तीन सेकंड के लिए न्यूड नजर आती है मगर वह दृश्य अश्लील या फूहड नहीं, पिकासो की खूबसूरत पेंटिंग सा नजर आता है।

भ्रम से निकलना जरूरी एक युवा अभिनेत्री से पिछले दिनों बात हो रही थी, जिसे यह मालूम था कि बिकिनी सीन्स को बोल्ड कहते हैं। बिकिनी पहनने से उसे गुरेज नहीं था, बिना यह जाने भी कि ऐसे दृश्य फिल्म की जरूरत हैं भी या नहीं। इस तरह के दृश्य केवल दर्शकों के खास वर्ग को प्रभावित करने के लिए रखे जाते हैं।

सलेब्रिटीज से अकसर सवाल पूछा जाता है, 'आपने इतना बोल्ड सीन कैसे किया? ऐसी नायिकाओं की डिमांड भी कुछ समय तक फिल्मों में बढ जाती है मगर नतीजा? एक बार ऐसा दृश्य करने के बाद हर निर्माता-निर्देशक उनसे वैसे ही दृश्यों की मांग करने लगता है। उनकी अभिनय क्षमता गायब हो जाती है और रह जाता है सिर्फ एक्सपोजर। एक समय के बाद वे परदे से गायब हो जाती हैं। कई अभिनेत्रियों ने बी ग्रेड फिल्में कीं, चर्चा में रहीं और फिर उन्हें भुला दिया गया।

बिना जरूरत के न्यूड होना अभिनय नहीं है। अगर ऐसे सीन्स के बलबूते फिल्में सफल होतीं तो आज की ज्यादातर फिल्में हिट होतीं। कई लडकियां पहले ही अपना पोर्टफोलियो ऐसा बनवाती हैं कि प्रोडक्शन हाउस तुरंत उन्हें काम दे दे। कई बार डायरेक्टर-प्रोड्यूसर और दर्शक भी इस भ्रम के शिकार हो जाते हैं।

विचारों में चाहिए बोल्डनेस कुछ समय पहले सुजॉय घोष की एक फिल्म आई थी, 'कहानी। उसमें विद्या बालन एक प्रेग्नेंट लेडी की भूमिका में थीं, जो ठीक से चल भी नहीं पाती। एक गाउन में वह लगातार अस्त-व्यस्त सी अपने पति को ढूंढती नजर आती हैं। फिल्म में न तो आइटम नंबर था, न ग्लैमरस हीरोइन, न प्रेम त्रिकोण, न बोल्ड सीन्स... मगर फिल्म ने दर्शकों को छुआ क्योंकि इसकी कहानी बोल्ड थी।

जाहिर है, वही फिल्में लंबे समय तक टिकती हैं, जिनका कंटेंट स्ट्रॉन्ग हो और जहां उम्दा अभिनय किया गया हो। दरअसल कहानी कहने की कला ही उसे सफल या विफल बनाती है। एक दौर में इस्मत चुगताई की 'लिहाफ, कृष्णा सोबती की 'मित्रो मरजानी और मृदुला गर्ग की 'कठगुलाब जैसी बोल्ड कहानियां आईं और इन्हें हिंदी के पाठकों ने स्वीकार किया। ऐसे बोल्ड विषयों पर लिखना आज भी आसान नहीं है। आज के सिनेमा की बोल्डनेस महज किस सीन्स, प्रेम प्रसंगों या उत्तेजना फैलाने वाले दृश्यों तक सीमित है।

इससे केवल इतना होता है कि बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की चर्चा होती है और निर्माता को लगता है कि फिल्म हिट हो जाएगी। कई बार सेंसर की कैंची चलती है तो विवाद होता है और फिल्म को मुफ्त प्रचार मिल जाता है। जाहिर है, कई दर्शक इसी जिज्ञासा में सिनेमाहॉल तक चले जाते हैं कि आखिर फिल्म में ऐसा क्या है, जो उस पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली?

बोल्डनेस विचारों में होनी चाहिए। अपनी बात को स्पष्ट मगर कलात्मक अंदाज में प्रस्तुत करना और चित्रकार की तरह अपने विचारों को जखूबसूरती से परदे पर उकेरना है बोल्डनेस, फिर चाहे सिनेमा हो या साहित्य।