हिंदी को खुद अपनाकर, देश के कोनेकोने में इसे अपनाने के लिए लोगों को प्रेरणा दी। हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना पूरा जीवन गुजार देने वाली लेखिका मूलरूप से कश्मीर से ताल्लुक रखती हैं। वह अब तक करीब 200 कहानियां, 30 उपन्यास और 35 से अधिक कविताएं के जरिए समाज को जागरूकता का संदेश दे चुकी हैं। आठवें दशक की दहलीज पर कदम रखने वाली लेखिका हिंदी भाषा के संवर्धन के लिए काम करने से अब भी गुरेज नहीं करती है।

गुरुग्राम में तीस वर्षों र्से हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास कर चुकी हैं। इस कार्य के लिए उन्हें दर्जनों सम्मान भी मिल चुके हैं।

बचपन में पकड़ी कलम
जिस उम्र में बच्चे गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं उस उम्र लेखिका चंद्रकांता ने कलम-दवात को अपना खिलौना और लेखनी को अपना खेल बना लिया था। बचपन से लेखन विद्या में गहरी रुचि की वजह घर का परिवेश था। पिता प्रो. रामचंद्र पंडित यूं तो बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते थे, लेकिर्न हिंदी के प्रचारक थे। पिता को कश्मीर र्में हिंदी भाषा को बचाने के लिए मुहिम चलाते देखकर उनके मन राष्ट्रभाषा के लिए सम्मान जागा और वे भी पिता की इस मुहिम में जुट गईं। हिंदी से एमए करने के बाद राजस्थान, हैदराबाद, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित कई राज्यों भाषा को बचाने के लिए संस्थाएं बनाईं। हिंदी भाषा के प्रति उनका मोह इस कदर बढ़ता चला गया कि उन्होंने कई किताबें, कहानियां, कविताएं व उपन्यास लिखें। कभी नारी मन की व्यथा तो किसी में स्त्री विमर्श की जटिलताएं, कभी सामयिक व्यवस्था के विद्रूप तो कभी संबंधों के विघटन जैसे मुद्दों को अपनी लेखनी का केंद्र बनाया। इसके साथ ही वर्तमान में तकनीक की बढ़ती घुसपैठ के बीच जीवन मूल्यों को बचाए रखने का संदेश भी अपनी रचनाओं के जरिए समाज को लगातार देती रहती हैं।

रचनाओं को मिली सराहना
अंतिम साक्ष्य एवं अथांतर, बाकी सब खैरियत है, ऐलान गली जिंदा है, अपनेअपने कोणार्क, यहां वितस्ता बहती है, कथा सतीसर, हाशिए की इबारतें (आत्मकथात्मक संस्करण) सहित अन्य रचनाओं के लिए पाठकों ने जमकर सराहना की।

नहीं भाता हिंदी का बदलता स्वरूप
लेखिका कहती हैं र्कि हिंदी लोक व्यवहार की भाषा है, देश की संस्कृति की संवाहिका है व राष्ट्रीय अस्मिता की द्योतक है। आज भले ही अंग्रेजी दुनिया से जोड़ती है, लेकिर्न हिंदी देश की पहचान बनाती है। ऐसे में युवाओं को अंग्रेजी के साथ ही हिंदी को भी अपनाना चाहिए। संचार क्रांति के इस दौर र्में हिंदी की पहचान व पैठ लोगों के बीच बढ़ी है। लेकिन हिंदी का रोमन तरीके से लिखा जाना मुझे बिल्कुल नहीं भाता है।

सम्मान व पुरस्कार

-साहित्य सम्मान ( हिंदी अकादमी द्वारा) 2008 में

-हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन पुरस्कार (2005 में)

-व्यास सम्मान (2005 में)

-राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान ( 2006 में)

-बाल मुकुंद गुप्ता सम्मान

-चंद्रावती शुल्क सम्मान

-कल्पतरु सम्मान

-रिचा लेखिका रत्न

-वाग्मणि सम्मान

-कल्पना चावला सम्मान


प्रस्तुति : प्रियंका दुबे मेहता , गुरुग्राम

यह भी पढ़ें : पारखी नजर और गहरी संवेदना की पूंजी है साहित्य

Posted By: Srishti Verma