आत्मकथा स्वयं को खोलने [रिवील करने] का सबसे अधिक सशक्त माध्यम है, यह जितनी ईमानदारी से लिखी जाती है, उतनी ही आकर्षक और पठनीय बनती है। कृष्ण बलदेव वैद की आत्मकथा का दूसरा खण्ड शम अ हर रंग में उनके व्यक्तित्व के अनेक पक्षों और रंगों को प्रकाशित कता हुआ, न केवल उनके व्यक्तित्व अपितु उनके संपर्क में आये अनेक हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू लेखकों के अंतरंग का परिचय देता है।

पहली किस्त के केंद्र में विदेश और विदेश में मेरे लम्बे और व्यथाग्रस्त प्रवास की कैफियत के अनेक रंग थे, दूसरी के केंद्र में स्वदेश और स्वदेश में मेरे पुनर्वास में कैफियत के कुछ काले नीले रंग हैं। वर्ष 1954 ई. से 1990 ई. तक की डायरी के कुछ चुनिंदा प्रसंग वर्षवार बिना किसी तारीख के, बडी ईमानदारी से उतारे गए हैं। लेखक ने प्रसंग अपनी शादी से उठाए हैं और फिर जैसे-जैसे जिंदगी आगे बढती गयी, लेखक सूक्ष्मता से ब्यौरों में जाता है। उन्होंने क्या, कब पढा, कहां से उनका लेख लौटा- इन सह विवरणों को पढना सिलिए रोचक है कि लेखक बडा रुतबा हासिल करने के बाद अपनी असफलताओं की बात पर चुप्पी साध जाता है। लेखक अपने संघर्ष के प्रारंभिक दिनों में भी मुल्कराज आनंद जैसे बडे लेखक को अभिभूत होकर खूब खुलकर उनके व्यक्तित्व का तटस्थ विशेषण मूल्यांकन करता है। औरत, सुंदरता, प्रेम आदि विषयों पर भी उनकी सोच और उसे व्यक्त करने की साफगोई उनके व्यक्तित्व को और भी प्रभावान बनाती है। इस डायरी अंश में अपने अनेक समकालीन हिंदी लेखकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर कृष्ण बलदेव वैद की टिप्पणियां देखने लायक हैं, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल, केदारनाथ सिंह, रमेश चंद्र शाह आदि पर बेबाकी से दी गयी सम्मतियां इन्हें और पठनीय बनाती हैं। न केवल दूसरों के रचना कर्म पर अपितु अपनी रचनात्मकता को लेकर कृष्ण बलदेव वैद उसकी पूरी प्रक्यिा से भी परिचित कराते चलते हैं। एकाग्रत: शाम अ हर रंग में को समकालीन हिंदी गद्य में एक उपलब्धि माना जा सकता है।