जैसलमेर, एएनआइ। देश के सबसे चर्चित अयोध्या विवाद पर शनिवार को प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। फैसले में मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए वैकल्पिक जमीन देने का आदेश दिया गया है, अदालत ने कहा कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड अयोध्या विवाद में अपने मामले को स्थापित करने में विफल रहा है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मुसलमानों ने मस्जिद नहीं छोड़ी थी। हालांकि, हिंदू भी राम चबूतरा पर पूजा करते थे। उन्होंने गर्भगृह पर भी स्वामित्व का दावा किया है।  

किसी भी अप्रिय घटना की आशंका को देखते हुए अजमेर, जैसलमेर और बूंदी में धारा 144 लागू कर दी गयी है। जैसलमेर में 30 नवंबर तक और श्री गंगानगर में 19 नवंबर तक धारा 144 लागू रहेगी। जयपुर कमिश्नरेट में 10 बजे से इंटरनेट सेवाएं बंद करने के आदेश दे दिये गये हैं। गहलोत सरकार ने बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सभी स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने के आदेश दे दिये है।  

श्री गंगानगर में 19 नवंबर तक धारा 144 लागू कर दी गयी है। 

अजमेर में धारा 144 लागू, स्‍कूल कॉलेज बंद ।  

जयपुर कमिश्नरेट में आज सुबह 10 बजे से 24 घंटे के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद रहेंगी।

 स्कूलों को बंद रखने का आदेश दे दिया गया है ।

जैसलमेर में 30 नवंबर तक धारा 144 लागू कर दी गयी है।  

अंतिम नहीं होगा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

गौरतलब है कि अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला आने ही वाला है, वैसे सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अंतिम माना जाता है, क्योंकि इसके बाद कोई अपील नहीं होती। फिर भी अगर कोई फैसले से असंतुष्ट हुआ तो उसके लिए भी दो कानूनी विकल्प मौजूद होंगे। पक्षकार सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दाखिल कर फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर सकते हैं और पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद असंतुष्ट पक्ष क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर सकता है। ज्ञात हो कि पुनर्विचार और क्यूरेटिव याचिका पर सुनवाई के नियम तय हैं।

नियम के अनुसार किसी भी फैसले के विरोध में 30 दिन के अंदर पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। दाखिल की गयी याचिका पर वही पीठ विचार करती है जिसने फैसला दिया होता है। पुनर्विचार याचिका में यह साबित करना होता है कि फैसले में साफ तौर पर गलती हुई है। पुनर्विचार याचिका पर सामान्य रूप से खुली अदालत में कभी भी सुनवाई नहीं होती है। इस पर फैसला सुनाने वाली पीठ के न्यायाधीश चैंबर में सर्कुलेशन के जरिये सुनवाई होती है। जिसमें वकीलों की दलीलें नहीं होतीं, सिर्फ केस की फाइलें और रिकॉर्ड होता है जिस पर विचार किया जाता है।

 कब-कब क्या हुआ

1528: अयोध्या में एक ऐसी जगह पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं, मुगल सम्राट बाबर ने यहां मस्जिद बनवाई थी इसलिए इसे बाबरी मस्जिद कहा गया। 

1853: हंदुओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनायी गयी। जिसे लेकर हिंदू- मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई थी।

23 दिसंबर 1949: विवादित भवन के केंद्रीय स्थल पर भगवान राम की मूर्ति का प्राकट्य हुआ। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू यहां पूजा पाठ करने लगे और मुसलमानों ने नमाज पढऩा बंद कर दिया।

1984: विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने विवादित स्थल का ताला खोल दिया और मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। जिसके लिए समिति का गठन हुआ।

01 फरवरी 1986: फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने इस विवादित स्थान पर हिंदुओं को पूजा कीं इजाजत दी। ताला खोला दियाइगया। नाराज मुस्लिमों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

09 नवंबर 1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने विवादित स्थान के पास ही शिलान्यास की इजाजत दी।

30 अक्टूबर 1990: विहिप के आह्वान पर अयोध्या पहुंचे कारसेवकों ने विवादित ढांचे पर भगवा ध्वज फहराया भगवा झंडा। सुरक्षा बलों की फायरिंग से कई कारसेवक हताहत हो गये।

02 नवंबर 1990: विवादित स्थल की ओर बढ़ रहे कारसेवकों पर सुरक्षाबलों ने गोलियां चला दी ।

06 दिसंबर 1992: हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंच विवादित ढांचे को गिरा दिया। जिसके बाद अस्थायी राममंदिर बना। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया।

जुलाई 2005: आतंकियों ने विवादित स्थल पर विस्फोटक से भरी जीप के द्वारा आत्मघाती हमला कर दिया, सुरक्षा बलों ने पांच आतंकियों को मार गिराया। 

27 सितंबर 2018: सर्वोच्च न्यायालय ने नमाज के लिए मस्जिद अपरिहार्य न होने के फैसले पुनर्विचार के लिए संविधान पीठ के हवाले करने से इन्कार कर पूर्व फैसले को बहाल रखा।

21 मार्च 2017: अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की। चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि अगर दोनों पक्ष राजी हों तो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार है।

27 सितंबर 2018: सर्वोच्च न्यायालय ने नमाज केलिए मस्जिद अपरिहार्य न होने के फैसले को पुनर्विचार के लिए संविधान पीठ के हवाले करने से इन्कार कर पहले हुए फैसले को बहाल रखा।

29 अक्टूबर 2018: सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई जनवरी 2019 तक टली।

जनवरी 2019: विवादित मामले की सुनवाई के लिए  सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की संवैधानिक पीठ का गठन हुआ।

08 मार्च 2019: सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में एक मध्यस्थता कमेटी का गठन हुआ। कमेटी में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एफएम कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर एवं अधिवक्ता श्रीराम पंचू को शामिल किया गया। हालांकि, मध्यस्थता की ये कोशिश सफल न हो सकी।

02 अगस्त 2019: मध्यस्थता रिपोर्ट की सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई करने के बाद कहा गया कि इसे मध्यस्थता से नहीं सुलझाया जा सकता।

06 अगस्त 2019: सर्वोच्च न्यायालय में मंदिर-मस्जिद विवाद की नियमित सुनवाई शुरू हो गई।

16 अक्टूबर 2019: सर्वोच्च न्यायालय ने 40 दिन में मामले की सुनवाई पूरी की।

Posted By: Babita kashyap

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