उदयपुर, सुभाष शर्मा। प्रदेश में जल्द ही नए टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित होने वाला कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व प्रदेश की सरकार के लिए आय के मामले में वरदान साबित हो सकता है। पर्यटन एवं वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व से राज्य सरकार को अस्सी करोड़ से ज्यादा सालान आय हो सकेगी, जो रणथंभौर टाइगर रिजर्व से दोगुनी से अधिक है।

रणथंभौर टाइगर रिजर्व से राज्य सरकार फिलहाल लगभग 38 करोड़ रुपए सालाना आय हो रही है। प्रस्तावित कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व राजसमंद, उदयपुर, पाली और अजमेर जिले के लगभग 1289 किलोमीटर वन्यक्षेत्र में फैाला हुआ है। उदयपुर, राजसमंद, अजमेर और पाली सीधे ट्यूरिज्म सर्किट में आते हैं। इनमें सबसे ज्यादा पर्यटक उदयपुर में हर साल दस से बारह लाख पर्यटक आते हैं। इनमें दो लाख से ज्यादा पर्यटक विदेशी होते हैं। पिछले साल के आंकड़े सबताते हैं कि उदयपुर में विदेशी पर्यटकों की संख्या 2 लाख 7 हजार 16 थी। जबकि देशी पर्यटक नौ लाख से अधिक थे। इस तरह कुल 11 लाख 36 हजार 946 पर्यटक उदयपुर आए। इनमें से कई पर्यटक कुंभलगढ़ भी गए।

उदयपुर एवं अजमेर शहर में एयरपोर्ट तथा पैलेस ऑन व्हील्स जैसी शाही रेलगाड़ी भी आते हैं। इसी तरह गुजरात से आने वाला पर्यटक भी डूंगरपुर और पालनपुर के रास्ते माउंट आबू होता हुआ उदयपुर आता है। इसी तरह नाथद्वारा तथा पाली के जवाई लेपर्ड कंजर्वेशन रिजर्व में भी पर्यटकों की संख्या तेजी से बढऩे लगी है। उदयपुर की तरह मारवाड़ और जोधपुर आने वाला पर्यटक भी प्रस्तावित कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व में जाना चाहेगा, जहां हर साल दस लाख से अधिक देसी-विदेशी पर्यटक आते हैं। इसी तरह राजसमंद के रणकपुर में भी पांच लाख देशी-विदेशी पर्यटक पिछले साल आए। इसके विपरीत सरिस्का टाइगर रिजर्व में पिछले साल एक लाख तीस हजार 356 देसी तथा महज पांच हजार 626 विदेशी पर्यटक पहुंचे।

वहीं रणथंभौर टाइगर रिजर्व में पिछले साल एक लाख 32 हजार 435 देसी तथा 58 हजार 627 ही विदेशी पर्यटक पहुंचे जो उदयपुर आने वाले पर्यटकों की संख्या की एक चौथाई है।

इसलिए खास बन सकता है कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व

विशेषज्ञ बताते हैं कि उदयपुर घूमने आए पर्यटकों के लिए कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व खास बन सकता है। यहां आने वाले पर्यटकों को उदयुपर एवं संभाग में बेहतरीन पर्यटन स्थल हैं। उदयपुर की झीलों में बोट्स की राइडिंग, सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क, प्रदेश की सबसे बड़ी फिश एक्वेरियम, सिटी पैलेस, फुलवारी की नाल एवं सीतामाता अभयारण्य, जहां उडऩ गिलहरी मिलती है। 

फुलवारी की नाल जो प्रदेश का इकलौता आर्किड पार्क, उदयपुर से माउंट आबू जाने वाले पर्यटकों को ग्रीन चिडिय़ा देखने को मिलेगी, जो विश्व में केवल यहीं पाई जाती है। उदयपुर का बर्ड विलेज मेनार, एशिया की मानव निर्मित मीठे पानी की दूसरी सबसे बड़ी झील जयसमंद, महाराणा प्रताप का इतिहास समेटे हल्दीघाटी, धार्मिक नगरी नाथद्वारा, विश्व की सबसे बड़ी शिव प्रतिमा, चीन की दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार कुंभलगढ़ की प्राचीर भी पर्यटकों को यहीं देखने को मिलेगी। विश्व विख्यात देलवाड़ा और रणकपुर के मंदिर, रावली टॉडगढ़ में दूध की तरह बहता गोरम घाट एवं भील बेरी का झरना, जो अरावली पर्वत माला का सबसे ऊंचाई से गिरने वाला झरना भी इसी क्षेत्र में है।

वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स का कहना है मेवाड़ मारवाड के जंगलों में टाइगर बसाया जाता है तो यहां का खोया हुआ वैभव लौटेग। यहां इतनी ज्यादा चीजें देखने के लिए होंगी और यहां एक सस्टेंनएबल एंव सिस्टमेटिक ट्यूरिज्म विकसित किया जाएगा तो पर्यटन का दबाव सीधा टाइगर पर नहीं होगा। अन्य जगहों पर पर्यटक केवल टाइगर को ही देखने जाता है। 

जोधपुर अधिवक्ता व वन्यजीव प्रेमी ऋतु राज सिंह राठौड़ का कहना है- कुंभलगढ़ बाघों का प्राकृतिक आवास रहा है। यहां के जंगलों में बाघ का प्राकृतिक आवास रहा है बाघ के पुनर्वास से कुंभलगढ़ के जंगलों के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी। पर्यटन बढ़ने से रोजग़ार के साधन विकसित होंगे।

उदयपुर जगत रिट्रीट रिसोर्ट युद्धवीर सिंह शक्तावत का कहना है- कुंभलगढ़ में टाईगर का इतिहास रहा है। यहां का लैंडस्केप टाइगर्स के लिए अनुकूल है। टाइगर्स की बढ़ती संख्या को भी आने वाले समय में यहां शिफ्ट किया जा सकता है। पर्यटन बढऩे से निश्चित तौर पर क्षेत्र को नई पहचान मिलेगी।

Posted By: Preeti jha

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