जयपुर, नरेन्द्र शर्मा। widowed women. राजस्थान में सिरोही जिले के "रणधीरा" और भीलवाड़ा जिले के "श्रीजी खेड़ा" गांवों में दूरी तो सैकड़ों किलोमीटर की है। लेकिन इन दोनों गांवों का दर्द एक जैसा है। इन दोनों गांवों में सिर्फ विधवा महिलाएं और छोटे बच्चे नजर आते हैं। दोनों ही गांवों में 35 साल से अधिक उम्र की महिला विधवा हैं। यहां पुरुष का बुढ़ापा नहीं आता, जवानी में ही इनकी मौत हो जाती है। इस भयावह स्थिति का कारण है "सिलिकोसिस" बीमारी।

सिंचाई के साधनों की कमी और रोजगार का कोई अन्य साधन नहीं होने के कारण इन दोनों गांवों के 95 फीसद पुरुष पत्थरों की घिसाई के काम से जुड़े हुए हैं। वहां उड़ने वाला पत्थरों का बुरादा (सिलिका) धीरे-धीरे काम करने वाले लोगों के सीने में जमता रहता है और बाद में "सिलिकोसिस" जैसी बड़ी बीमारी का रूप धारण कर लेता है। इलाज के दौरान अस्पतालों में मरीजों को सिलिकोसिस बीमारी का जो प्रमाण-पत्र दिया जाता है, उसे यहां "डेथ वारंट" या "ऊपर वाले का बुलावा" कहा जाता है। पैसों के अभाव में इलाज नहीं होता और फिर इनकी जवानी में ही मौत हो जाती है। कम उम्र में मौतों के कारण बदनाम हुए इन गांवों में अब युवकों के विवाह होना भी मुश्किल होते जा रहे हैं।

खनन उद्योग में काम करने वाले मजदूरों में हो रही इस लाइलाज बीमारी को देखते हुए प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार ने इसी साल अक्टूबर में सिलिकोसिस नीति जारी की है। इस नीति के अनुसार पीड़ित के पुनर्वास के लिए तीन लाख रुपये की सहायता देने, पीड़ित की मौत पर दो लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपये की सहायता देना प्रावधान किया गया है। पीड़ितों को मुख्यमंत्री विशेषयोग्यजन पेंशन योजना का लाभ मिलेगा। दवाइयां फ्री उपलब्ध रहेंगी। वर्तमान में 11 हजार सिलिकोसिस पीड़ित प्रदेश में रजिस्टर्ड हैं।

रणधीरा और श्रीजी खेड़ा गांवों की कहानी

सिरोही जिले की पिंड़वाड़ा तहसील में स्थित "रणधीरा" गांव में लगभग हर दो माह में एक व्यक्ति की मौत होती है। 57 घरों के इस गांव में 32 विधावाएं हैं। मात्र 11 पुरुष जिंदा, इनमें से तीन बुजुर्ग हैं। प्रशासनिक अधिकारी दबे स्वरों में खुद मानते हैं कि यहां 100 से अधिक बच्चे ऐसे हैं, जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है। घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी विधवा महिलाओं पर है और वे या तो खेती करती हैं या फिर पास के ही गांव में मजदूरी के लिए जाती हैं। बच्चों की देखभाल उनकी दादी करती हैं। गरासिया (एसटी) बहुल इस गांव के 36 बच्चे ही पास के गांव के स्कूल में पढ़ने जाते हैंं।

ग्रामीण रामभज का कहना है कि कई परिवार तो ऐसे हैं, जिनकी तीन से चार पीढ़ियों के पुरुष सदस्यों ने अपने बच्चों को जवान होते नहीं देखा। गांव में लगभग सभी परिवार कच्चे घरों में रहते हैं। भीलवाड़ा जिले के "श्रीजी खेड़ा" गांव के 85 घरों में विधवाएं रहती हैं। इस गांव में 35 साल से अधिक उम्र के मात्र सात बुजुर्ग नजर आते हैं। गांव के चार युवक मजदूरी के लिए मुंबई गए हैं। बाकी सभी नौजवानों की मौत सिलिकोसिस से हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि पेट पालने का कोई अन्य साधन नहीं होने के कारण मजबूरी में पत्थरों की घिसाई का काम करते हैं।

मौत बांट रही खदानें

सरकारी आंकड़े के अनुसार, प्रदेश में 25 हजार से अधिक वैध और अवैध खदानों में 20 लाख से अधिक मजदूर काम करते हैं। इनमें 11 हजरी सिलिकोसिस पीड़ित है। फेफड़ों में संक्रमण के कारण इस बीमारी की अधिकांश मामलों में पहचान काफी देरी से होती है, जब तक रोगी मौत के करीब पहुंच जाता है। पत्थरों की कटाई में काम आने वाले कटर और ग्राइंडर मशीनों से पत्थरों में जमा सिलकन डाई ऑक्साइड और सिलिका क्रिस्टल उड़ता है, जो मजदूरों के फेंफड़ों में जमा हो जाता है। प्रदेश के खानमंत्री प्रमोद जैन भाया का कहना है कि नई नीति के बाद इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण हो सकेगा। 

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Posted By: Sachin Mishra

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