उदयपुर, सुभाष शर्मा। सांझी यानी एक तरह की चित्र बनाने की कला। इसके कई रूप है। किन्तु एक रूप ऐसा भी है जिसे बनाना हर किसी के बस की बात नहीं। वह है जल सांझी, जो केवल उदयपुर में ही श्राद्ध यानी पितृ पक्ष में ही देखने को मिलती है।

श्राद्ध पक्ष में उदयपुर के चुनिंदा कृष्ण मंदिरों यानी पुष्टिमार्गीय संप्रदाय के मंदिरों में इसे देखा जा सकता है। इस तरह की जलसांझी बनाने की कला केवल उदयपुर का एक ही परिवार के पास है, जो पिछले पांच दशक से इसे बनाते आ रहे हैं। वर्तमान में जलसांझी बनाने वाले कलाकारों में राजेश वैष्णव और उनके दो बेटे ही शामिल हैं।

पुरखे बनाते थे जलसांझी 

जलसांझी कलाकार राजेश वैष्णव बताते हैं कि उनकी पीढ़ी पिछले पांच सौ सालों से जलसांझी बनाती आ रही है। उनके पिता जलसांझी कला के पुरोधा के साथ पखावज वादक थे। उनके बाद वह उसी परम्परा को निभाते आ रहे हैं। बतौर साक्ष्य उनके पास लगभग चार सौ साल प्राचीन पत्रक मौजूद हैं, जो साबित करते हैं कि उनके पुरखे जलसांझी बनाते थे।

अब 20 वीं पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ा रही है। मथुरा और वृन्दावन के कृष्ण मंदिरों में जलसांझी बनाए जाने के प्रमाण मौजूद है लेकिन वहां के कलाकारों ने इसे आगे नहीं बढ़ाया और दशकों पहले वहां जलसांझी बनना बंद हो गई। इसका उल्लेख गुजराती भाषा में गोपाल दास द्वारा लिखित पुस्तक ‘सांझी‘ में उपलब्ध है। जिसमें लेखक ने तरह-तरह की सांझी, उनके इतिहास और कलाकारों के बारे में जानकारी दी है।

सांझी और श्राद्ध पक्ष

सांझी मूलतः संध्या देवी को रिझाने का महोत्सव है। श्राद्ध यानी पितृ पक्ष में एक ओर कुंवारी कन्याएं सांध्य देवी की पूजा घरों के दरवाजे पर सांझी बनाकर पूजा करती हैं। दूसरी ओर, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा, आदर भाव व्यक्त करने के लिए पितृ पक्ष में गोबर की सांझी बनाए जाने की परम्परा रही है।

जबकि पुष्टीमार्गीय संप्रदाय में भगवान कृष्ण को रिझाने के लिए पितृ पक्ष में विविध तरह की सांझी बनाई जाती है, जिनमें गोबर, सूखे मेवों, फूल, दाल पत्तों और रंगों से बनाई सांझी शामिल है। जिनमें जलसांझी भी शामिल है।

श्रम के साथ भावना की कला

राजेश वैष्णव बताते हैं कि जलसांझी की कला श्रम साध्य कला है। यानी श्रम के साथ भावना हो तभी इसे बनाया जा सकता है। एक सांझी तैयार करने में छह से दस घंटे लगते हैं। पूर्व में भगवान श्रीकृष्ण जन्म से लेकर कंस वध तक की जलसांझी बनाई जाती थी लेकिन अब समय के साथ बदलाव आए हैं।

वह बताते हैं कि जलसांझी बनाने में स्टेनसिल्स उपयोग लेते हैं, जो एक कागज पर बनी डिजायन होती है। उसके जरिए जलसांझी बनाई जाती है।

मोरारी बापू से लेकर जैन संत तरूण सागर भी रह चुके हैं मुरीद

जलसांझी कलाकार राजेश वैष्णव बताते हैं कि इस कला के प्रख्यात रामकथा वाचक मोरारी बापू, जैन संत तरूण सागर ही नहीं, बॉलीवुड के कई कलाकार मुरीद रह चुके हैं। मोरारी बापू के समक्ष उन्होंने हनुमानजी, भगवान राम की तथा संत तरूण सागर के समक्ष गुड़गांव में महावीर स्वामी की जलसांझी तैयार की।

इसके अलावा पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के सौजन्य से दिल्ली और मुम्बई में भी जलसांझी बनाई, जिसे कई फिल्मी कलाकार देखने आए और वह उनकी कला के मुरीद हो गए।

सरकारी संरक्षण की दरकार

जलसांझी कलाकार राजेश वैष्णव और उनके बेटे कलाकार अंकुर का कहना है कि इस कला को सरकारी संरक्षण की जरूरत है। मेवाड़ के महाराणा जलसांझी के दर्शन के लिए आते रहे लेकिन इस कला को संरक्षण तब मिली ना अब। सरकार चाहे तो अन्य दूसरी कलाओं की तरह इसे भी संरक्षण प्रदान कर सकती है।

उनकी कला को पहचान दिलाने में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र का बड़ा हाथ रहा लेकिन नए कलाकार नहीं जुड़ पाए। इसके पीछे एक कारण आय से जुड़ा हो सकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस कला के संरक्षण और बढ़ावा देने के लिए पत्र लिखा है। वह चाहते हैं कि इस कला का भी एक म्यूजियम बनाया जाए।

जल सांझी का इतिहास

पहली बार जल सांझी किसने बनाई, इसका उल्लेख किसी पुस्तक में उपलब्ध नहीं है। हालांकि माना जाता है कि रूठे भगवान श्रीकृष्ण को मनाने के लिए पहली बार राधा रानी ने यमुना किनारे फूलों की सांझी बनाई थी, जिसे देखकर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए थे।

जिसकी परछाई देखकर राधारानी के मन में जलसांझी बनाने का विचार आया और पहली जलसांझी राधारानी ने ही तैयार की थी। फोटो कैप्शन जलसांझी बनाते उदयपुर के कलाकार राजेश वैष्णव और उनके द्वारा तैयार जलसांझियां।

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Edited By: Priti Jha