जागरण संवाददाता, उदयपुर। राजस्थान के मरूस्थलीय जिलों में बहने वाली लूनी नदीघाटी में पाषाणकालीन औजार तथा भित्ति चित्र के प्रमाण मिले हैं। लॉकडाउन अवधि में इनकी खोज उदयपुर के जर्नादन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के क्यूरेटरों ने किया है। उनका कहना है कि उत्खनन कार्य के दौरान मिले यह प्रमाण पचास हजार साल से लेकर बीस हजार वर्ष पुराने हैं। जिन्हें आदिम काल का कहा जा सकता है।

1969 में उत्खनन कार्य शुरू किया था

जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय ने मरूस्थलीय जिलों जोधपुर, सिरोही तथा पाली में लूनी नदी घाटी में लगभग पचास साल पहले 1969 में उत्खनन कार्य शुरू किया था। इस विश्वविद्यालय के म्यूजियम क्यूरेटर डॉ. कृष्ण पाल सिंह देवड़ा एवं चिंतन ठाकर बताते हैं कि नए प्रमाण मिले हैं, वह कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन अवधि में खोजे गए। 

उत्खनन कार्य जारी, प्रबल संभावना

यहां उत्खनन की शुरूआत पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज के पूर्व निदेशक प्रो. वीएन. मिश्रा के साथ राजस्थान विद्यापीठ ने साल 1969 से लेकर 1973 के बीच की थी। तब इस क्षेत्र के तिलवाड़ा, सोजत, समदड़ी आदि में उत्खनन कार्य किया गया और तब भी पाषाण काल के प्रमाण यहां मिले थे। यहां उत्खनन का कार्य जारी है और अन्य प्रमाण भी मिलने की प्रबल संभावना है।

यह मिले है पाषाणकालीन औजार

क्यूरेटन चिंतन ठाकर बताते हैं कि लूनी नदी घाटी का भू-भाग ग्रेनाइट की पहाडिय़ों से घिरा है। कोरोना काल में किए गए उत्खनन के दौरान यहां कोर, फ्लुटेड कोर, फ्लेक्स, त्रिभुजाकार नुकीले औजार, दो धारी नुकीली चाकू, पत्थर के भाले का अग्र भाग व तीर का अग्र भाग, ब्लेड इत्यादी औजार मिले हैं। साथ ही पाषाण और ऐतिहासिक कालीन भित्तिचित्रों के प्रमाण भी मिले।

कई रहस्यों को समेटे हैं लूनी नदी

क्यूरेटर डॉ. कृष्णपाल देवड़ा बताते हैं, राजस्थान के मरूस्थलीय क्षेत्र में बहने वाली लूनी नदी कई रहस्यों को समेटे हुए है। अरावली पर्वत माला के विकास के आखिरी चरण में लूनी नदी घाटी का उद्भव हुआ था, जो अतीत के कई रहस्यों को अपने अंदर समेटे हुए है। इस नदी के किनारे आदिम मनुष्य के विकास क्रम से लेकर उसके विकास के साक्ष्य मौजूद हैं।

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