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जयपुर में इजरायल की तकनीक ने बदली खेती की तस्वीर, कभी बंजर रही धरती पर अब उग रही है समृद्धि की फसल

Published: Wed, 06 May 2026 04:19 PM (IST)

जयपुर के गुढ़ा कुमावतान और बसेड़ी गांवों में इजरायली तकनीक से खेती ने किसानों की किस्मत बदल दी है। पॉलीहाउस ...और पढ़ें

दोनों गांवों में करीब साढ़े सात सौ पाली हाउस बन गए हैं।

दोनों गांवों में करीब साढ़े सात सौ पाली हाउस बन गए हैं।

HighLights

  1. इजरायली तकनीक से खेती ने गांवों में खुशहाली लाई

  2. पॉलीहाउस और बूंद-बूंद सिंचाई से किसान करोड़पति बने

  3. गुढ़ा कुमावतान और बसेड़ी गांव 'मिनी इजरायल' कहलाने लगे

नरेंद्र शर्मा, जयपुर। शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर गुढ़ा कुमावतान और बसेड़ी गांव डेढ़ दशक पहले तक कभी ऐसे इलाके माने जाते थे, जहां खेती करना संघर्ष से भरा काम था। जमीन सख्त, पानी सीमित और मौसम का मिजाज अनिश्चित रहता था। किसान पारंपरिक फसलें उगाते थे। मसलन, गेहूं, जौ, चना, लेकिन हर बार मुनाफा हाथ नहीं आता था।

कई बार फसल खराब होती तो कर्ज लेना मजबूरी बन जाता था। इन्हीं हालातों के बीच 2013 में कांग्रेस सरकार के कृषिमंत्री इजरायल की यात्रा पर गए तो उनके साथ किसान भी गए। इनके साथ बसेड़ी गांव के रामनारायण चौधरी और खेमराम चौधरी भी शामिल थे। इसके बाद जब 2015 में भाजपा सरकार के कृषि मंत्री किसानों के साथ इजरायल यात्रा पर गए तो भी ये दोनों किसान उनके साथ गए।

इजरायल की तकनीक ने बदली गांव की तस्वीर

दोनों ने इजरायल में खेती की नई तकनीक सीखी, जोकि कम पानी में अधिक उत्पादन देती थी। वहां उन्होंने नियंत्रित वातावरण में होने वाली खेती को समझा और उसे अपने गांव में अपनाने का निर्णय लिया। इससे कुछ ही सालों में किसानों की किस्मत बदलने लगी। वर्तमान में गुढ़ा कुमावतान एवं बसेड़ी गांवों में आठ सौ से अधिक किसान इजरायल तकनीक से खेती कर रहे हैं।

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दोनों गांवों में करीब साढ़े सात सौ पाली हाउस बन गए। एक सौ किसान ऐसे हैं, जो डेढ़ दशक में करोड़पति बन गए। जो बच्चे पहले सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वे अब महंगे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इजरायल से गांव लौटने के बाद दोनों किसानों ने सबसे पहले पाली हाउस तैयार कराए। शुरुआत में लोगों को यह प्रयोग असामान्य लगा। कई लोगों ने इसे जोखिम भरा कदम माना।

भरोसे से मिली जीत

इसके बावजूद उन्होंने अपने निर्णय पर भरोसा बनाए रखा। कुछ ही समय में पाली हाउस के भीतर उगने वाली फसल ने परिणाम देना शुरू किया। विदेशी खीरा, टमाटर और शिमला मिर्च जैसी फसलें बेहतर गुणवत्ता के साथ तैयार होने लगीं। पाली हाउस की तकनीक में तापमान और नमी को नियंत्रित किया जाता है, जिससे मौसम का सीधा असर फसल पर नहीं पड़ता। बूंद-बूंद सिंचाई के जरिये पानी का उपयोग सीमित और सटीक रहता है।

यही कारण रहा कि कम संसाधनों में भी उत्पादन लगातार बढ़ता गया। दोनों किसानो के इस प्रयोग ने गांव के अन्य किसानों को भी प्रेरित किया। अनेक किसानों ने इस माडल को अपनाया। धीरे-धीरे दोनों गांवों में पाली हाउस की संख्या सैकड़ों तक पहुंच गई। दोनों गांवों की सीमा आपस में सटी हुई है और दोनों गांवों में खुशहाली देखकर अब आसपास के गांवों के किसान भी पाली हाउस लगाना शुरू कर रहे हैं।

अब वैज्ञानिक तरीके से तैयार होती है प्रत्येक फसल

अब दोनों ही गांवों में खेती का पूरा ढांचा बदल गया है। अब प्रत्येक फसल वैज्ञानिक तरीके से तैयार होती है। बीज का चयन, पोषण प्रबंधन और बाजार तक पहुंच, हर स्तर पर योजना के साथ काम किया जाता है। यही वजह है कि उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर होती है और बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है। जयपुर सहित आसपास के शहरों में इन सब्जियों की नियमित आपूर्ति होती है।

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मजबूत हुई आर्थिक स्थिति

खेती का तरीका बदला तो आर्थिक स्थिति में भी बड़ा बदलाव आया। एक पाली हाउस से सालाना लाखों रुपय की आय संभव हुई है। सरकारी अनुदान ने शुरुआती लागत को संभालने में मदद की। लगातार मिलने वाले मुनाफे ने किसानों को स्थिरता दी। कई किसान आज करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक बन चुके हैं।

संपन्नता आई तो बदल गया गांव का परिदृश्य

किसान साधन संपन्न हुए तो गांव का परिदृश्य भी बदल गया है। पक्के मकान, आधुनिक सुविधाएं, आंगन में खड़ी गाड़ियां और बच्चों की बेहतर शिक्षा, ये सभी बदलाव उस नई दिशा की पहचान हैं, जो खेती ने दी।

इन गांवों को कहा जाने लगा मिनी इजरायल

गुढ़ा कुमावतान और बसेड़ी गांवों की यह कहानी दिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी रास्ते निकाले जा सकते हैं। सही तकनीक, सीखने की इच्छा और प्रयोग करने का साहस मिल जाए तो बंजर जमीन भी समृद्धि का आधार बन सकती है। यही वजह है कि इन गांवों को आज ‘मिनी इजराइल’ कहा जाता है और यह माडल दूर-दूर तक किसानों को नई दिशा दे रहा है।

किसानों ने बताया अपना अनुभव

किसान खेमराम चौधरी ने बताया कि, एक पाली हाउस पर करीब 40 लाख रुपये का खर्च होता है। सरकार लागत पर 50 प्रतिशत अनुदान देती है। पाली हाउस खेती में फसल के अनुसार तापमान, आर्दता (नमी) नियंत्रित करना आसान है। रोग कम लगते हैं। मौसम का असर नहीं होने से गुणवत्ता बेहतर होती है। बूंद-बूंद सिंचाई की तकनीक से पानी की 90 प्रतिशत से अधिक बचत होती है।

वहीं, दूसरे किसान रामनारायण चौधरी ने बताया कि, क्षेत्र में भूजल स्तर लगातार गिर रहा था। ऐसे में पाली हाउस के निकट तालाब बनाए गए हैं। इनमें बरसाती पानी एकत्रित कर वर्ष भर बूंद-बूंद सिंचाई करते हैं। पहले गेंहू, जौ, प्याज एवं चना की परंपरागत खेती करते थे, जिसमें पानी अधिक लगने के साथ ही मुनाफा कम होता था, लेकिन पाली हाउस में टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च सहित कई सब्जियां उगाते हैं। मेरे और मेरे स्वजन के करीब 50 पाली हाउस हैं।

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