जयपुर, नरेन्द्र शर्मा। कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव में "हाईब्रिड" फार्मूला लागू करने को लेकर यू टर्न लिया है। उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट सहित उनके समर्थक मंत्री और कई विधायक इस फार्मूले का विरोध कर रहे थे। इस मुद्दे को लेकर करीब एक माह तक राज्य सत्ता और संगठन दो गुटों में बंट गया था। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समर्थक "हाईब्रिड" फार्मूले के पक्ष में थे, वहीं पायलट गुट इसका विरोध कर रहा था। मामला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंचा तो उन्होंने प्रदेश प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे को विवाद खत्म करने की जिम्मेदारी सौंपी।

पांडे ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री से बात करने के बाद स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल से बात कर इस फार्मूले को लागू नहीं करने के लिए कहा। पांडे के निर्देश पर ही धारीवाल पहले तो पायलट से मिले और फिर गुरुवार को गहलोत के साथ लंबी मंत्रणा की। इसके बाद शुक्रवार को हाईब्रिड फार्मूले पर चुनाव नहीं कराने का निर्णय लिया गया। शुक्रवार शाम स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने एक बयान जारी कर कहा कि यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि महापौर और सभापति स्थानीय निकायों से चुने हुए नगर पार्षदों के बजाय बाहर से थोपे जाएंगे, जो खेदजनक हैं।

उन्होंने कहा कि जो प्रावधान किया गया है, उसके माध्यम से राजनीतिक दलों को उल्टे यह अधिकार दिया गया है कि विशेष परिस्थितियों में विशेषकर एसटी, एससी, ओबीसी और महिला वर्ग के महापौर या सभापति की आरक्षित सीट के लिए अगर किसी पार्टी विशेष के सदस्य नहीं जीत पाते हैं तो उसे यह अधिकार होगा कि वह अपनी पार्टी के किसी के किसी आरक्षित वर्ग के नेता को खड़ा कर सकेगी। इससे पार्षदों की खरीद-फरोख्त भी रुकेगी और विपक्षी दलों में तोड़फोड़ भी नहीं होगी।

उल्लेखनीय धारीवाल ने पिछले दिनों प्रदेश की सभी निकायों में हाईब्रिड फार्मूला लागू करने की बात कही थी। लेकिन शुक्रवार को जारी बयान में उन्होंने विशेष परिस्थितयों में ही यह फार्मूला अपनाने की बात कही है। धारीवाल ने कहा कि अब पार्षद ही नगर निगम में महापौर एवं नगर परिषद अथवा नगरपालिका में सभापति का चुनाव करेंगे।

जानें, क्या है हाईब्रिड फार्मला

हाईब्रिड फार्मूले के तहत किसी भी नगर निगम में महापौर एवं नगर परिषद अथवा नगर पालिका में सभापति बनने के लिए पार्षद चुना जाना आवश्यक नहीं होगा। इसके तहत जिस राजनीतक दल का बहुमत मिलेगा, वह गैर पार्षद को भी महापौर या सभापति बना सकेगा। पायलट और उनके समर्थक मंत्रियों रमेश मीणा, प्रताप सिंह खाचरियावास, भंवरलाल मेघवाल एवं उदयलाल आंजना सहित कई विधायकों ने सार्वजनिक रूप से इस फार्मूले को अपनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। पायलट समर्थकों ने जयपुर से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे को उठाया था। आखिरकार उनके दबाव में गहलोत सरकार ने शुक्रवार को यू टर्न ले लिया।

49 निकायों के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित

प्रदेश की 49 स्थानीय निकायों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने शुक्रवार को चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया। इनमें जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे बड़े शहर नहीं हैं। उदयपुर और भरतपुर जैसे संभागीय मुख्यालयों को इसमें शामिल किया गया है। निर्वाचन आयुक्त प्रेम सिंह मेहरा ने बताया कि पार्षद के चुनाव के लिए एक नवंबर को अधिसूचना जारी होगी और पांच नवंबर से नामांकन-पत्र भरे जा सकेंगे।

छह नवंबर को जांच होगी और आठ नवंबर को नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 16 नवंबर को सुबह सात से शाम पांच बजे तक होगा। मतगणना 19 नवंबर को होगी। महापौर एवं सभापति के चुनाव के लिए 20 नवंबर को अधिसूचना जारी होगी। 21 नवंबर को नामांकन-पत्र भरे जा सकेंगे और 22 नवंबर को इनकी जांच होगी। 23 नवंबर को नाम वापस लिए जा सकेंगे और फिर 26 नवंबर को सुबह 10 से दो बजे तक मतदान होगा। मतगणना इसी दिन दो बजे बाद होगी। 

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