जयपुर, मनीष गोधा। Rajasthan Local Body Elections Results 2019. निकाय चुनाव में मिली जीत से कांग्रेेस में उत्साह का माहौल है। अगले वर्ष जनवरी फरवरी में होने वाले पंचायत चुनाव से पहले इसे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए बूस्टर डोज माना जा रहा है। वहीं, भाजपा के लिए कुछ निराशा तो है, लेकिन वहां इस बात पर संतोष व्यक्त किया जा रहा है कि प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं रहा, हालांकि पार्टी के नए अध्यक्ष सतीश पूनिया के लिए उपचुनाव के बाद यह परिणाम भी बहुत सुखद नहीं रहे। मई के लोकसभा चुनाव में एकतरफा हार के बाद कांग्रेस को अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाए रखने के लिए इस जीत की बहुत जरूरत थी। यही कारण था कि चुनाव से पहले समीकरणों को हर तरह से अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई।

निकाय अध्यख का सीधा चुनाव पार्टी के लिए घातक सिद्ध हो सकता था, इसलिए उस प्रावधान को बदला गया। नए सिरे से परिसीमन कराया गया और वार्डों की संख्या बढ़ा कर उनका आकार छोटा किया गया। पार्टी को इसका बड़ा फायदा नगरपालिकाओं में मिला। इसके अलावा चुनाव से पहले आर्थिक आधार पर आरक्षण के नियमों को सरल किया गया। शहरी युवा मतदाता के लिए यह बडी राहत थी और माना जा रहा है कि इसका भी काफी असर इस चुनाव मेें पड़ा। पार्टी ने चुनाव की कमान अपने मंत्रियों और स्थानीय नेताओं के हाथ में सौंपी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने सिर्फ माॅनिटरिंग का जिम्मा संभाला। हालांकि चुनाव से पहले दोनों के निकाय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर खींचतान भी दिखी, लेकिन इसका बहुत ज्यादा असर चुनाव परिणाम पर नहीं दिखा। अब जनवरी- फरवरी में होने वाले पंचायत चुनाव पर इस जीत का असर पड़ना तय माना जा रहा है।

गहलोत ने कहा, जीत जनता को समर्पित

निकाय चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह जीत जनता को समर्पित करते हुए कहा कि जनता बहुत सोच समझ कर फैसला करती है। प्रदेश की सरकार ने हमारी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को समर्थन दे कर संवेदनशील, जवाबदेह शासन देने की प्रतिबद्धता को मजबूत किया है।

वहीं, प्रदेश अध्यक्ष तथा उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने प्रदेश की जनता ने एक बार फिर कांग्रेस की विचारधारा में अपनाविश्वास दोहरा कर हमारी सरकार को मजबूती दी है। उन्होंने सभी जीते हुए प्रत्यशियों और कार्यकर्ताओ को बधाई दी है।

नहीं चले अनुच्छेद 370 और राममंदिर जैसे मुद्दे

लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत और पिछले दिनों देश में कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने तथा राममंदिर पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा को इस चुनाव में बड़ी जीत की उम्मीद थी। पार्टी का मानना था कि शहरी मतदाता को यह मुद्दे काफी प्रभावित करते हैं, लेकिन परिणामों ने पार्टी की इस धारणा को गलत साबित कर दिया। हालांकि पार्टी बहुत बुरी हार नहीं हारी और तीन बड़े शहरों उदयपुर, बीकानेर और भरतपुर में पार्टी ने कांग्रेस से बढ़त हासिल की है। उदयपुर में तो छठी बार स्पष्ट बहुमत के साथ बोर्ड बन रहा है, लेकिन कुल मिला कर यह वह परिणाम नहीं है, जिसकी उम्मीद पार्टी को थी।

पार्टी के नए अध्यक्ष सतीश पूनिया के लिए भी इस परिणाम को बहुत अच्छा नहीं माना जा रहा है। उन्होंने हालांकि कमान कुछ समय पहले ही संभाली है, ऐेसे में उन्हें बहुत ज्यादा समय नहीं मिल पाया और चुनाव से पहले उन्होंने प्रदेश पदाधिकारियों की टीम में भी कोई बदलाव नहीं किया। पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना है कि चूंकि पिछले चुनाव में अधिकतर जगह हमारे बोर्ड थे, इसलिए एंटी इनकम्बेंसी का असर देखने को मिला है। इसके अलावा पार्टी सत्ता के दुरुपयोग की बात भी कह रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि निकाय चुनाव की प्रक्रिया में बार-बार बदलाव और बिना जरूरत परिसीमन कर कांग्रेस ने चुनाव को प्रभावित किया है। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन को भी प्रभावित करने की कोशिश की गई है।

लाॅटरी से करना पड़ा फैसला

राजस्थान के निकाय चुनाव की मतगणना में एक निकाय में एक वार्ड में जीतने वाले प्रत्याशी का फैसला पर्ची निकाल कर लाॅटरी से करना पडा। यह स्थिति श्रीगंगानगर जिले की सूरतगढ़ के वार्ड नंबर 31 में सामने आई। यहां दोनों पार्टियों को बराबर वोट मिले। कांग्रेस के बसंत बोहरा और बीजेपी के अशोक आसेरी दोनों को 363-363 वोट मिले। मुकाबला बराबरी पर रहा तो फैसला पर्ची निकाल कर लाॅटरी के जरिए करना पडा और इसमें कांग्रेस के बसंत बोहरा जीत गए। सूरतगढ़ नगरपालिका चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर और एसडीएम मनोज कुमार मीणा ने दोनों उम्मीदवारों की उपस्थिति में पर्ची निकाली। दोनों ही प्रत्याशियों को एक जैसे वोट मिलना चर्चा का विषय बन गया। सूरतगढ़ निकाय चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर मनोज कुमार मीणा ने जैसे ही पर्ची के माध्यम से कांग्रेस के बंसत बोहरा को विजयी घोषित किया कांग्रेस समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। खास बात यह रही कि हारे प्रत्याशी यहां नगर पालिका अध्यक्ष के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे।

जीते पार्षदों के लिए अब सात दिन का राजनीतिक पर्यटन

निकाय चुनाव में जीते हुए प्रत्याशियों के लिए अब सात दिन राजनीतिक पर्यटन के है। दोनों दलों ने अपने पार्षदो को तो फाइव स्टार होटलों और रिसोर्ट में भेजा ही है। उन निर्दलियों और अन्य दलों के पार्षदों से भी सम्पर्क किया जा रहा है जो समर्थन दे कर बोर्ड बनवा सकते है। खास बात यह है कि अध्यक्ष का चुनाव 26 नवंबर को और उपाध्यक्ष का चुनाव 27 नवंबर को होना है। ऐसे में पार्टियों का सात दिन तक इन की “खातिरदारी“ करनी पडेगी। आमतौर पर पार्षद का चुनाव होने के दो से तीन बाद ही अध्यक्ष का चुनाव हो जाता है, लेकिन इस बार इसकी मियाद सात दिन रखी गई है।

इसे लेकर भाजपा ने कड़ी आपत्ति भी की है और पार्टी अध्यक्ष सतीश पूनिया कई बार यह कह चुके है कि परिणाम के सात दिन बाद अध्यक्ष का चुनाव कराना सरकार के मंसूबे साफ बता रहा है। चुनाव में 23 निकायों का फैसला निर्दलियों और अन्य दलों के जीते हुए पार्षदों के जरिए होना है। ऐसे में सबसे ज्यादा खातिरदारी इन निर्दलियों की ही होनी है। दोनों पार्टियों ने अपने वरिष्ठ नेताओं को निकायों में सक्रिय कर दिया है और अब सात दिन तक सरकार के कई मंत्री और विपक्ष के कई नेता इन निकायों में ही डेरा डाले रहेंगे। पार्षदो का यह राजनीतिक पर्यटन 27 नवंबर को उपाध्यक्ष के चुनाव के बाद ही समाप्त होगा।

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Posted By: Sachin Mishra

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