अरावली की खदानों से उड़ रहा मौत का गुबार, जवानी में ही दम तोड़ रहे मजदूर
सीकर में अरावली की खदानों से निकलने वाली धूल हजारों परिवारों की सेहत पर भारी पड़ रही है, जिससे मजदूरों ...और पढ़ें

अरावली की खदानों में सिलिकोसिस का कहर (यह तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।)
HighLights
अरावली खदानों की धूल से सिलिकोसिस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं
स्यालोद्रा गांव में कम उम्र में ही कई मजदूरों की मौत हुई
सिलिकोसिस के सरकारी आंकड़े वास्तविक स्थिति को कम आंकते हैं
डिजिटल डेस्क, सीकर। अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाले पत्थरों की मांग भले ही देशभर में हो, लेकिन इन पत्थरों की कीमत सीकर के हजारों परिवार अपनी सेहत से चुका रहे हैं। यहां खदानों और क्रशर से उठने वाली धूल लोगों की सांसों में घुल रही है।
दिन-रात चलने वाले ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग और पत्थर तोड़ने के काम के बीच सिलिका की बारीक धूल फेफड़ों तक पहुंच रही है। कई लोगों के लिए यह धूल धीरे-धीरे ऐसी बीमारी का कारण बन रही है, जिससे उबरना संभव नहीं। क्रशर और खदानों में काम करने वाले लोगों में सिलिकोसिस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, कई मजदूरों में महज तीन-चार साल में फेफड़ों की यह गंभीर और लाइलाज बीमारी सामने आ रही है। कम उम्र में ही सांस फूलने लगती है, काम करना मुश्किल हो जाता है और परिवार की रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। स्यालोद्रा गांव में बीते कुछ वर्षों में 50 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया गया है।
पति के इलाज में खत्म हुई जमा-पूंजी
स्यालोद्रा और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की शिकायत है कि खनन का असर सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं है। खदानों के आसपास रहने वाले परिवार भी लगातार धूल के संपर्क में हैं। स्थानीय निवासी मनीषा बताती हैं कि पति के इलाज में परिवार की सारी बचत खत्म हो गई, लेकिन प्रशासन की ओर से न तो कोई उनकी बात सुनने आया और न ही मदद मिली।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त पैनल अरावली के कई हिस्सों का दौरा कर वहां की स्थिति का आकलन कर चुका है। हालांकि, 11 अगस्त तक पैनल के सदस्यों ने स्यालोद्रा गांव का दौरा नहीं किया था। इस इलाके में काम करने वाले कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कोटपुतली-बहरोड़ और सीकर जिलों के प्रभावित इलाकों को पैनल के दौरे में पर्याप्त जगह नहीं मिली।
बीमारी का वास्तविक बोझ आंकड़ों से कहीं ज्यादा
अरावली की परिभाषा और उसकी सीमा तय करने के लिए केंद्र की रिपोर्ट की स्वतंत्र समीक्षा भी की जा रही है। 30 नवंबर तक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा की जानी है। फारेस्ट सर्वे आफ इंडिया की 2025 की रिपोर्ट में गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 63 जिलों को अरावली रेंज का हिस्सा बताया गया है।
अरावली में दशकों से जारी खनन के कारण खदानों के आसपास वायु प्रदूषण बढ़ा है। इसका सीधा असर वहां काम करने वाले मजदूरों और आसपास रहने वाली आबादी पर पड़ रहा है। 2023 में जर्नल आफ आक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन में राजस्थान में पत्थर तराशने और बलुआ पत्थर की खदानों में काम करने वालों में सिलिकोसिस के प्रसार पर एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था।
इसमें राजस्थान सरकार के आनलाइन पोर्टल पर सिलिकोसिस से प्रभावित लोगों के पंजीकरण, बीमारी के प्रमाणन और राहत वितरण से जुड़े आंकड़ों की जांच की गई।यह पोर्टल राजस्थान न्यूमोकोनियोसिस (जिसमें सिलिकोसिस भी शामिल है) का पता लगाने, रोकथाम, नियंत्रण और पुनर्वास नीति-2019 के तहत शुरू किया गया था।
23,436 मामलों में 6,876 मौतें
अध्ययन के समय पोर्टल पर सिलिकोसिस के 23,436 मामले दर्ज थे। इनमें 6,876 मौतें भी शामिल थीं। सिलिकोसिस के 4,977 मामलों के विश्लेषण में, जिनमें 741 मौतें शामिल थीं, पाया गया कि पत्थर तराशने का काम अधिक होने वाले जिलों में सिलिकोसिस की पहचान की दर भी ज्यादा थी।
36 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में इसका असर सबसे अधिक पाया गया। सीकर के नीम का थाना शहर में रहने वाले पर्यावरणविद् कैलाश मीणा का कहना है कि सिलिकोसिस के मामलों और मौतों के सरकारी आंकड़े बीमारी के वास्तविक बोझ को नहीं दर्शाते। उनके मुताबिक, असल संख्या इससे काफी ज्यादा हो सकती है। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
