उदयपुर, जेएनएन। राजसमंद जिले के भीम स्थित आबकारी विभाग के शराब भण्डारण भवन की भूमि का अवैध पट्टा जारी करने के मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एक ग्राम सेवक और भीम पंचायत के सरपंच के खिलाफ मामला दर्ज किया है। मामला उदयपुर राजघराने के सदस्य महेंद्रसिंह मेवाड़ से जुड़ा हुआ है, जिनके नाम से उक्त भूमि का पट्टा जारी किया गया और बाद में उसे बेच दिया गया।

दर्ज प्रकरण के मुताबिक भीम कस्बे के अतिव्यस्त क्षेत्र में आबकारी विभाग के शराब का भण्डारघर था। जहां से देशी शराब की भराई और भण्डारण होता था। इस भवन के क्षतिग्रस्त होने पर आबकारी विभाग का यह दफ्तार करीब पैंतीस साल पहले राजसमंद जिला मुख्यालय पर नए भवन में स्थांतरित हो गया। जो लंबे समय से खाली तथा खंडहरनुमा हो गया था। पिछले साल सितम्बर महीने में किसी ने इस भवन को जेसीबी से ध्वस्त कराया और मलबा तक वहां से स्थानांतरित कर दिया। जिसको लेकर 27 सितम्बर 2018 को आबकारी विभाग ने भीम थाने में भादसं की धारा 447 और पीडीपीपी एक्ट की धारा तीन के तहत मामला दर्ज कराया था।

मामला आबकारी आयुक्तालय तक पहुंचा तथा विभाग के निर्देशानुसार देवगढ़ वृत्त के आबकारी निरीक्षक ने उप पंजीयक भीम को पत्र भेजकर अनुरोध किया कि इस भवन को किसी के नाम रजिस्टर्ड नहीं करें और ऐसा मामला सामने आने पर इसकी सूचना आबकारी विभाग को दी जाए। विभाग का कहना था कि बाजार मूल्य के अनुसार उक्त भूमि की कीमत दो करोड़ रुपये है और भूमाफिया उस पर नजर टिकाए हुए हैं। महेंद्र सिंह मेवाड़ के नाम जारी कर दिया पंचायत ने पट्टा मामले की जांच में पता चला कि आबकारी विभाग के इस भवन वाली भूमि का पट्टा पंचायत ने उदयपुर राजघराने के सदस्य महेंद्रसिंह मेवाड़ के नाम जारी कर दिया। जिसके लिए पंचायत ने बताया कि पांच फरवरी 2018 को महेंद्रसिंह मेवाड़ ने इस भवन को अपना पुश्तैनी मकान बताते हुए पिछले पचास साल से परिवार के सदस्यों का रहना बताया था। पंचायत ने बीस मार्च 18 को कोरम में मेवाड़ की अर्जी को मंजूरी दे दी और 23 मई 18 को महेंद्रसिंह मेवाड़ के नाम पट्टा जारी कर दिया।

इसके विपरीत शपथ पत्र के लिए खरीदे गए स्टाम्प चार जून 18 और 8 जून 18 को खरीदे गए। पट्टा जारी करने से पहले आबादी भूमि या अन्य भूमि को लेकर कोई उल्लेख और प्रमाण मौजूद नहीं पाया गया। उसके एक महीने बाद 19 जुलाई 18 को महेंद्रसिंह मेवाड़ ने उक्त भूमि देवगढ़ निवासी दिलखुश जैन को 28 लाख रुपये में बेच दी। मामले में आबकारी विभाग ने एसीबी को शिकायत की थी।

एसीबी की प्रारंभिक जांच में यह हुआ खुलासा

एसीबी की जांच में खुलासा हुआ कि आबकारी विभाग इस भूमि या भवन को लेकर किसी तरह का दस्तावेज पेश नहीं कर पाया लेकिन सार्वजनिक निर्माण विभाग की ओर से कराए गए निर्माण और मरम्मत कार्यों के हवाले संबंधी दस्तावेज साबित करते हैं कि इस भवन में पांच दशक से आबकारी विभाग काबिज रहा। उदयपुर राजघराने के महेंद्रसिंह मेवाड़ या उसके परिवार के सदस्यों का कभी भी इस भवन और भूमि पर ना तो कब्जा था और ना ही कोई दस्तावेज। राजस्व रिकार्ड में यह भूमि बिलानाम गैरकाबिल काश्त के रूप में दर्ज थी। ग्राम पंचायत ने उक्त भूमि और भवन का पट्टा जारी करने में पंचायत राज अधिनियम के प्रावधानों की पालना नहीं की। पट्टा जारी करने की समूची कार्रवाई एक ही दिन में छपे हुए प्रफार्मा पर पूरी कर दी गई थी। इस तरह पंचायत महेंद्रसिंह मेवाड़ के नाम पट्टा गलत तरीके से जारी किया।

महेंद्रसिंह मेवाड़ इस भवन या भूमि के पैतृक संबंधी दस्तावेज पेश नहीं कर पाए। पट्टा 23 मई 2018 को जारी किया गया, जबकि शपथ पत्र चार और आठ जून को नोटरी कराए गए। जो साबित करते हैं कि उक्त पट्टा जारी करने में ग्राम पंचायत ने पूरी तरह फर्जीवाड़ा किया। आबकारी विभाग ने 11 दिसंबर 1986 को विभागीय भवनों

की जानकारी सार्वजनिक निर्माण विभाग को दी, उसमें उक्त भवन का उल्लेख है, जो साबित करता है कि उक्त भवन आबकारी विभाग का है।

मामले की जांच में साबित हुआ कि ग्राम विकास अधिकारी (ग्राम सचिव) भीम मुरलीधर पण्ड्या और सरपंच भीम गिरधारी सिंह रावत ने आपराधिक षड्यंत्र रचकर, पदों का दुरुपयोग करते हुए उक्त भवन का पट्टा मिलीभगत से महेंद्रसिंह मेवाड़ के नाम जारी कर दिया। जिस पर एसीबी मुख्यालय ने दोनों के खिलाफ पीसी एक्ट 1988 की धारा 13(1)(सी)(डी), 13(2), भादसं की धारा 193 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया है। 

Posted By: Preeti jha

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