उदयपुर, नरेंद्र शर्मा। Tribal In Rajasthan. आजादी के 72 साल बाद भी राजस्थान के आदिवासियों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। खबरें आती रही हैं कि यहां कुछ परिवार बच्चों को बेच देते हैं या गिरवी रख देते हैं। लेकिन हालात इससे भी कहीं अधिक बदतर हैं। गुजरात से सटे प्रदेश के उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों में अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे आदिवासियों के जीवन स्तर को देख रूह कांप उठती है। मजबूरी में ही वे अपने बच्चों को अन्य राज्यों में मजदूरी, यहां तक कि भेड़ चराने जैसे कामों के लिए बेच या गिरवी रख देते हैं। अनेक इलाकों में हर दिन बच्चों की मंडी लग रही है, जहां उम्र के हिसाब से सौदा तय होता है। 

शुक्रवार सुबह 8 बजे जब जागरण की टीम कोटड़ा पहुंचीतो सड़क के किनारे एक कच्चे छप्पर के नीचे चार-पांच लोग बैठे नजर आए। संवाददाता ने खुद को सूरत का साड़ी कारोबारी बताते हुए बच्चों को कारखाने में काम के लिए ले जाने की बात कही तो दलाल ने तत्काल जवाब दिया- बातें बाद में करेंगे, पहले मोबाइल बंद कर के अपनी गाड़ी में रखो..। जैकिट की तलाशी लेने के दलाल सोहनलाल ने साफ कहा कि 10 से 16 साल तक की उम्र के बच्चे वो 150 रुपये प्रतिदिन में गिरवी रखवा देगा, लेकिन इसमें से 25 रुपये प्रति बच्चा कमीशन देना होगा..। मोलभाव के बाद आखिरकार सौदा 130 रुपये प्रति बच्चे पर तय हुआ और इसमें से दलाल 22 रुपये प्रति बच्चा लेने को तैयार हो गया। दलाल ने तीन दिन बाद उसी स्थान पर मिलने और 8 बच्चे साथ ले जाने की बात कही। बाकायदा एक पर्ची में बच्चों के नाम लिखकर दिए। इनमें चुडई गांव की लाली, सुगना, रामेहत एवं टेंगरवाडा गांव के छोटू, भोला, कुसमी, रघु और रमडी शामिल हैं।

राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों में ऐसी अनेक आदिवासी बस्तियां हैं। भरण-पोषण का एकमात्र जरिया मजदूरी ही है। मजदूरी नहीं मिलने पर भूखे मरने की नौबत आ जाती है। परिवार को भूख से बचाने के लिए मुखिया खुद को या फिर अपने बच्चों को मात्र 50 से 100 रुपये प्रतिदिन पर गिरवी रख देता है। आदिवासियों को गुजरात और महाराष्ट्र के किसानों, व्यापारियों अथवा गड़रियों के यहां गिरवी रखवाने के लिए बाकायदा दलाल का पूरा नेटवर्क यहां पैठ जमाए हुए है। पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे यह धंधा फलफूल रहा है। हालात तब और भी भयावह होते दिखते हैं, जब गिरवी रखे गए बच्चे या तो वापस नहीं लौटते या फिर अपंग होकर लौटते हैं।

ये दलाल वयस्क के बजाय 10 से 15 साल तक के बच्चों को प्राथमिकता से गिरवी रखते हैं। बच्चों को गिरवी रखने के बदले परिवार के मुखिया को 50 से 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसा दिया जाता है। इसमें से भी 20 से 25 रुपये दलाल लेते हैं। बच्चे को दोनों समय भोजन का आश्र्वासन दलाल देते जरूर हैं, लेकिन उन्हे भरपेट खाना नहीं मिल पाता। आदिवासी क्षेत्रों में इन दलालों को मैट कहते हैं। इस पूरे बाजार पर इनकी पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी मर्जी के बिना बच्चों को गिरवी नहीं रखा जा सकता है।

गुजरात से सटे कोटड़ा, फलासिया, झाडोल, गोगुंदा और आमलिया में प्रतिदिन बच्चों की बोली लगती है। यहां बाकायदा बच्चों की चौखटी (मंडी) लगती है। पुलिस के पास अपना बहाना है कि पहाडि़यों के बीच इन इलाकों में पुलिस का पहुंचना मुश्किल होता है और सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंचती है तब तक दलाल फरार हो जाते हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से उदयपुर रेंज की पुलिस महानिरीक्षक बिनिता ठाकुर और उदयपुर की जिलाधिकारी आनंदी के प्रयासों से बच्चों का सार्वजनिक रूप से सौदा होने पर लगाम तो लगती दिखती है, लेकिन पूरी तरह नहीं। चोरी-छिपे यह आज भी जारी है ।

आदिवासी इलाकों में बच्चों की तस्करी रोकने के लिए नियमित रूप से पुलिस एवं सामाजिक संगठनों के साथ अभियान चलाया जा रहा है। आदिवासियों को जागरूक किया जाता है। पिछले छह माह में करीब सौ बच्चों को दलालों से मुक्तकराया गया है।

-संगीता बेनीवाल, अध्यक्ष, राज्य बाल अधिकारिता आयोग, राजस्थान

पुलिस इसे रोकने को लेकर कटिबद्ध है। हम वह हर प्रयास कर रहे हैं, जो आवश्यक है। आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान दे रहे हैं ताकि बच्चे खुद भी स्वयं को बचा सकें। बच्चे शिक्षित होंगे तो ही इनके पूरे समाज में सुधार होगा।

-बिनीता ठाकुर, पुलिस महानिरीक्षक, उदयपुर रेंज, राजस्थान।

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Posted By: Sachin Kumar Mishra

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