मनीष गोधा, जयपुर। राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हिम्मताराम भांभू 1975 से अब तक साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं। यही नहीं, इनमें से साढ़े तीन लाख पेड़ बन चुके हैं। इसमें छह एकड़ में 11 हजार वृक्षों वाला एक जंगल भी शामिल है। पर्यावरण को समर्पित इस अहम योगदान के लिए उन्हें हाल ही में पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।

पर्यावरण के प्रति प्रेम उन्हें संस्कारों के रूप में मिला। नागौर जिले के सुखवासी गांव के रहने वाले हिम्मताराम जब 18 साल के थे तो उनकी दादी ने उनसे पीपल का एक पौधा लगवाया था और इस पौधे का पूरा ध्यान रखने के लिए कहा था। उस दिन दादी से मिली प्रेरणा का नतीजा यह है कि 1975 से अब तक हिम्मताराम राजस्थान के कोने-कोने में करीब साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं।

हिम्मताराम ने नागौर के नजदीक हरिमा गांव में छह एकड़ जमीन खरीदी और उस पर 11 हजार पौधे रोपकर एक समृद्ध जंगल तैयार कर दिया। यहां 300 मोर और पशु-पक्षी प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं। जागरण समूह के प्रकाशन नईदुनिया से बातचीत में हिम्मताराम ने कहा, इंसान की जिंदगी अधिक से अधिक 100 वर्ष होती है, लेकिन पेड़ सैकड़ों साल तक रहते हैं। बस इसी सोच और दादी से मिली प्रेरणा ने मुझे यह काम करने के लिए प्रेरित किया। मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने जो कुछ किया, उससे आज सैकड़ों पशु-पक्षियों को रहने के लिए प्राकृतिक वातावरण मिल पाया और मैं पर्यावरण को बचाए रखने में भी एक छोटा सा योगदान दे पाया।

69 साल के हिम्मताराम भांभू का गृह जिला नागौर रेगिस्तानी इलाके की शुरुआत का जिला माना जाता है। अधिकांश इलाके में पानी खारा है। खुद हिम्मताराम जब जंगल बसा रहे थे और इसके लिए नलकूप खुदवाया तो 250 फीट की गहराई पर खारा पानी आ गया। हिम्मताराम ने इस खारे पानी का इस्तेमाल तो किया ही साथ ही बारिश के पानी को खेत में रोककर जमीन में नमी पैदा की और इससे पेड़ उगाए। आज उनका उगाया-बसाया जंगल पर्यावरण का अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए एक संस्थान की तरह है। हिम्मताराम कहते हैं कि खारे पानी में भी पौधे पनप सकते हैं। यह हमने यहां किया है। इस जंगल में हर तरह के पेड़ हैं।

हिम्मताराम बताते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया अपनी पूंजी और पुरस्कारों के रूप में प्राप्त धनराशि से किया। कहते हैं, वन विभाग से पौधे खरीदकर लोगों को देता था और उनसे संपर्क में रहता था। जो पौधे लगाए गए, उनकी वृद्धि के बारे में पूछता रहता था, इसीलिए पौधे पेड़ बन पाए। पर्यावरण के साथ ही पशु-पक्षियों से भी प्रेम बढ़ा। वे मेनका गांधी की संस्था पीपल फॉर एनिमल से भी जुड़े हैं और अब तक 13 शिकारियों को जेल पहुंचा चुके हैं। उनके काम को राज्य और केंद्र सरकार ही नहीं विभिन्न संस्थाओं ने भी सराहा है।

वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार ने उन्हें राजीव गांधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार दिया था। 1999 में पर्यावरण श्रेणी में यूनेस्को द्वारा पुरस्कार प्रदान किया गया। उनके बसाए जंगल ‘हरिमा’ को अब कृषि-वानिकी के एक सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है। आसपास के स्कूलों के छात्र यहां प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए आते हैं।

पेशे से मिस्त्री हैं...

हिम्मताराम बहुत अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं। गोगेलाव गांव के स्कूल में कक्षा छह तक पढ़ाई की है। उन्होंने खेती के मशीनीकरण के शुरुआती दौर में ट्रैक्टर की मरम्मत का काम सीखा और कुशल मिस्त्री बन गए। खेती और इस काम से अपना परिवार चलाते हैं। एक बेटा है जो व्यापार करता है। पौधे रोपने और जंगल उगाने का काम वे अपना पैसा लगाकर करते हैं।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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