जेएनएन, खडूर साहिब (तरनतारन)। 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ। उसी दिन भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। भारत के विभाजन से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। जिन्होंने इस विभाजन की पीड़ा को झेला यह दर्द आज भी उन्हें सालता है। आजादी के जश्‍न के साथ विभाजन का दर्द, हर तरफ हिंसा, मारकाट हो रही थी। मानवता शर्मशार थी।

इसी दौरान देश के बंटवारे के समय मुस्लिम परिवार की महिला कर्मभरी का 16 वर्षीय बड़ा बेटा दंगों का शिकार हो गया। छोटे बेटे माहना को जिंदा रखने के लिए उसने उसे सिख परिवार को सौंप दिया और इस उम्मीद से पाकिस्तान चली गई कि वह बेटे को एक दिन वापस ले जाएगी।

उस समय माहना की उम्र पंद्रह वर्ष थी। सिख परिवार में हुई परवरिश की बदौलत माहना गुरसिख रूप धारण करके गुरमहिंदर सिंह खालसा बन गया। गुरमहिंदर ने सारी जिंदगी युवाओं को गुरबाणी से जोड़ने का काम किया। वर्ष 1932 में जन्मे गुरमहिंदर सिंह खालसा का रविवार को बीमारी के कारण देहांत हो गया। सोमवार को उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे सभी लोगों की आंखें नम थीं।

मां ने कई प्रयास किए पर नहीं हुई सफल

उन्हें वापस पाकिस्तान ले जाने के लिए उसकी मां कर्मभरी ने बहुत प्रयास किए, लेकिन वह सफल नहीं हो पाईं। तरनतारन के गांव भैल ढाए वाला के गुरसिख परिवार में उन्हें ऐसा माहौल मिला कि वे गुरु के लाल बन गए। कारसेवा खडूर साहिब संप्रदाय में जाकर सेवा करने के दौरान उसने अमृतपान कर लिया।

दो महीने पहले हुआ था मां का देहांत

गुरमहिंदर सिंह की मां कर्मभरी ने पाकिस्तान के गांव चक्क जिला खानोवाल से बेटे को कई पत्र भेजे और वापस बुलाया, लेकिन मुस्लिम से गुरसिख बने गुरमहिंदर सिंह खालसा ने पाक जाने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की हुजूरी में मैं गुरु का सिख बना हूं। दो माह पहले उनकी मां का भी देहांत हो गया था। गुरमहिंदर सिंह खालसा के अंतिम संस्कार पर पद्मश्री संत बाबा सेवा सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने गुरु घर की सेवा करके कई नौजवानों को गुरबाणी से जोड़ा।

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਖ਼ਬਰਾਂ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ!