सुरेश कामरा, पटियाला

परिवार को आत्मनिर्भर बनाने व अपने नन्हे बच्चे के सपने साकार करने की ख्वाहिश लेकर दुबई गया था, लेकिन उस रात को याद करके आज भी कांप जाता हूं, जब मुझे सड़क पर खड़े ट्रक-ट्राले के नीचे रात गुजारनी पड़ी। ट्रक के आसपास टेंटनुमा चादर बांधी और साथियों के साथ ट्रक के ट्राले के नीचे सोया। इससे पहले सुबह व रात के समय ही खाना खाता था, जबकि दिन के समय खाना भी नसीब नहीं होता था। दुबई से अपने घर लौटे नितीश चांदला ने दैनिक जागरण को कुछ इस तरह की आपबीती सुनाई और उसकी आंखें भर आई। नीतिश का परिवार सुबह के समय मंदिर में जाकर भगवान का शुक्र करेगा कि उनका पुत्र घर लौट आया है। रो-रो कर गुजारीं ये तीन रातें

पिता नरेश चांदला व माता सरोज चांदला ने कहा उनके पुत्र ने उनसे 11 फरवरी से लेकर 29 फरवरी तक झूठ बोला कि वो जिस कंपनी में काम करता है वो ठीक है, लेकिन 11 फरवरी को इसकी कंपनी बंद हो गई और यह सड़कों पर मारा-मारा घूम रहा था। वे जब भी उससे फोन पर बात करते थे, तो वो उनको कहता रहा कि सब कुछ ठीक चल रहा है। तीन दिन जब उसका भारत लौटना कंफर्म हो गया तो उसने परिवार को बताया कि बंद होने वाली कंपनी उसकी ही थी और वो कुछ ही दिनों में घर आ रहा है तो परिवार का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। पिता के मुताबिक पिछले तीन दिनों से उन्होंने आंखों के बल रातें गुजारी हैं । दो महीने के वीजे पर गया था नितीश

नितीश चांदला ने बताया कि वह 15 जनवरी को दो महीने के वीजे पर दुबई के डेरा सिटी में मदार अलफलक सिक्योरिटी कंपनी में बतौर सिक्योरिटी गार्ड की नौैकरी करने के लिए गया था, जबकि वहां मेडिकल टेस्ट के बाद उसका वीजा दो साल आगे बढ़ना था। रोपड़ में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के जरिए वो एक एजेंट के संपर्क में आया था। उक्त एजेंट ने कंपनी में काम करने वाले व्यक्ति की मांग पर उनका वीजा लगवाकर उनको दुबई भेजा। उससे कहा गया कि वहां पर रहने का इंतजाम कंपनी करेगी । उनको दो हजार वेतन के अलावा 260 रुपये खाने के मिलेंगे। 11 जनवरी को दुबई पहुंचने के बाद उसे 28 फरवरी को एक अपार्टमेंट में ड्यूटी के लिए भेजा गया । एक समय का नहीं खा पाता था खाना

रुपये कम होने की वजह व वेतन 11 फरवरी को मिलने के कारण वो दोपहर का खाना भी नहीं खाता था। 11 फरवरी को जब वेतन मिलने का दिन था तो उनके पास खबर आई कि कंपनी बंद हो गई है और मानो उस पर बिजली सी गिर गई। साथियों के साथ किसी तरह अपने कमरे में पहुंचे और वहां से सामान निकाला। जहां पर वे रहते थे और सामान रखा था वहां का किराया भी कंपनी ने नहीं दिया था तो मालिक ने उनको किराया बगैर लिए सामान देने से साफ मना कर दिया, लेकिन मुश्किल से उन्होंने सामान निकाला और वे रात को गुरुद्वारा साहिब में जाकर ठहरे। दूसरी रात को उनको वहां भी ठहरने नहीं दिया तो उन्होंने वो रात ट्रक-ट्राले के नीचे गुजारी। उसके बाद वे समाज सेवक एसपी ओबराय के संपर्क में आए तो उन्होंने उनको अपने पास न केवल ठहराया, बल्कि उनके खाने पीने का इंतजाम करके वापसी की टिकटें भी दिलवाई। दुबई जाने और वापस भारत लौटने के दौरान उनको दो लाख रुपये की चपत लग गई है । सपने हुए चकनाचूर

नितीश ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति दुबई किसी कंपनी में जाना चाहता तो उसकी हिस्ट्री का छानबीन जरूर करके जाए ताकि उनको मेरे जैसी दिक्कत न झेलनी पड़े । जब 11 फरवरी को उसे वेतन मिलने के बजाय यह पता लगा कि उसकी कंपनी बंद हो गई तो उसके सपने चकनाचूर हो गए । वो इस चाहत से दुबई आया था कि कुछ समय यहां गुजारने के बाद वो अपने परिवार को आत्मनिर्भर बनाएगा, लेकिन उसके सपने अधूरे रहे गए।

Posted By: Jagran

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਖ਼ਬਰਾਂ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ!