संवाद सहयोगी, बमियाल : देश का मान मस्तिष्क कहलाने वाले कश्मीर में अमन-शांति की बहाली के लिए असंख्य वीर सपूतों ने बलिदान देकर राष्ट्र की एकता व अखंडता को बरकरार रखा है। शहीदों की स्वर्ण फेहरिस्त में एक नाम आता है सीमावर्ती गांव जनियाल के सिपाही संतोष सिंह का, जिन्होंने 6 साल पहले श्रीनगर के हंदवाड़ा क्षेत्र में पाक प्रशिक्षित आतंकियों से लोहा लेते हुए 30 वर्ष की अल्पायु में शहादत का जाम पीकर अपना नाम देश के अमर शहीदों में दर्ज करवा लिया। इस वीर योद्धा के जीवन संबंधी जानकारी देते हुए शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविद्र सिह विक्की ने बताया कि जांबाज सैनिक का जन्म 20 मार्च 1983 को माता मधु अंदोत्रा और पिता ठाकुर तारा सिंह के घर हुआ। सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल नगरी से बारहवीं कक्षा पास करने के बाद 31 दिसंबर 2010 को संतोष आइआरपी की 16 बटालियन में भर्ती होकर देश सेवा में जुट गए। तीन साल के सेवाकाल में वह ज्यादातर आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में ही रहे। 2 मार्च 2013 को इनकी ड्यूटी श्रीनगर के हंदवाड़ा क्षेत्र के बस स्टैंड पर लगी थी कि तभी एक आतंकी दल ने हमला बोल दिया जिसका संतोष ने बहादुरी से मुकाबला किया। आतंकवादियों की संख्या अधिक होने के चलते वह ज्यादा समय तक टिक न सके तथा उनके द्वारा दागी एक गोली सीने को भेदते हुए निकल गई। जिससे इस रणबांकुरे ने अपना बलिदान दे दिया। कुंवर विक्की ने बताया कि इस शूरवीर की शहादत को नमन करने के लिए 2 मार्च को सीमावर्ती गांव जनियाल के सतगुरु पैलेस में एक श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जाएगा।

Posted By: Jagran

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