विनय ढींगरा, पठानकोट : जिले में कई दवाइयों की किल्लत महसूस होने लगी है। कारण यह है कि दवाई कंपनियों में इनकी सप्लाई बेहद कम हो रही है। इस वजह से जिथरोमायसिन, विटामिन सी, अजीवक जैसी कई दवाएं उपभोक्ताओं को नहीं मिल पा रही है। उत्पादकों की माने तो दवा के कच्चे माल के लिए भारत की चीन पर निर्भरता है और कम सप्लाई के कारण मेडिसिन प्रोडक्शन पर काफी असर दिख रहा है। इसकी कमी के चलते या तो दवाइयां महंगी हो रही है या बाजार में उपलब्ध नहीं है।

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बाजार में इनकी किल्लत

- अजीवक 500 मिलीग्राम वह ढाई सौ मिलीग्राम

- लिम्सी 500 मिलीग्राम

- विको जिक कैप्सूल

- एनाविन हैवी इंजेक्शन

- एनोक्सापरिन इंजेक्शन

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यह है स्थिति

दवा निर्माताओं की मानें तो लगभग 70 फीसद केमिकल चीन से आयात किए जाते हैं। पठानकोट में हालांकि कोई दवा बनाने वाली फैक्ट्री नहीं है पर यहां पर दवाएं पड़ोसी राज्य जम्मू-कश्मीर या हिमाचल प्रदेश की फैक्ट्रियों से आती हैं। कुछ दवा कंपनियां चलाने वाले कारोबारी थर्ड पार्टी मेन्युफेक्चरिग करवाते हैं, जोकि किसी दूसरी कंपनी से उस कंपनी को कुछ लाभांश देकर अपने प्रोडक्ट तैयार करवाते हैं।

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कंपनियां प्रयासरत पर दिक्कत जारी : बब्बा

केमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान राजेश महाजन का कहना है कि पड़ोसी मुल्क से रा मटीरियल कम आने से कई ब्रांड बाजार में कम मात्रा में उपलब्ध हैं। हालांकि भारतीय कंपनियां दवा की आपूर्ति पर पूरा ध्यान दे रही है लेकिन मांग के हिसाब से इसे पूरा करने में थोड़ा समय लगता है। उम्मीद करते हैं के जल्द ही दवाओं की कमी दूर होगी।

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खुद निर्भर होने में लगेगा समय : राजेश

दवा कंपनी के एमडी राजेश कुमार के मुताबिक रा मटीरियल के महंगा होने से फिनिश्ड प्रोडक्ट भी महंगे हो जाते हैं। हालांकि कई ब्रांड जिन पर सरकार ने बेचने की कीमत तय कर रखी है, ऐसे में मैटीरियल की कीमत बढ़ने के बावजूद भी उनके रेट बढ़ाए नहीं जा सकते। तब भी कंपनियां कोशिश करके यह ब्रांड उपलब्ध करा रही हैं। भारत आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहा है और उम्मीद है कि चीन पर निर्भरता धीरे धीरे कम हो जाएगी ।

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थोक विक्रेताओं के पास भी नहीं मिल रही दवाइयां

केमिस्ट अजय महाजन का कहना है कि कुछ दवाएं थोक विक्रेताओं पास भी नहीं मिल रही है। ऐसे में डाक्टर मरीज को दूसरी कंपनी की दवा लिखकर काम चला रहे हैं। मरीजों के लिए कई ब्रांड इस समय उपलब्ध करवाने में दिक्कत हो रही है।

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