विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

31 साल में 6 CM और 35 DC बदले, पर नहीं हटा 60 हजार टन कूड़े का पहाड़, नवांशहर की 'नरक' वाली जमीनी हकीकत

Published: Sat, 19 Sep 2026 03:48 PM (IST)

नवांशहर में मुसापुर रोड पर 31 सालों से 60 हजार टन कूड़े का पहाड़ जस का तस खड़ा है, जबकि ...और पढ़ें

पंजाब के नवांशहर में कूड़े के पहाड़ से परेशान लोग।

पंजाब के नवांशहर में कूड़े के पहाड़ से परेशान लोग।

HighLights

  1. 31 साल में 6 CM, 35 DC बदले, कूड़ा पहाड़ कायम

  2. 60 हजार टन कूड़ा मुसापुर रोड पर, स्वास्थ्य संकट बढ़ा

  3. बायो-माइनिंग से ही संभव है नवांशहर डंप का समाधान

शुभेंदु शुक्ला, नवांशहर। जब किसी शहर का नाम देश के सबसे महान बलिदानी के नाम पर रखा जाए, तो उम्मीद की जाती है कि वहां का प्रशासन भी उसी आदर्श और जिम्मेदारी का अक्स होगा।

लेकिन नवंबर 1995 में जिला बने नवांशहर की हकीकत, सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह सिर्फ एक स्थानीय नाकामी की खबर नहीं है, बल्कि देश के उस खोखले 'विकास मॉडल' की त्रासदी है, जहां फाइलें दौड़ती हैं, लेकिन कूड़े का एक पहाड़ 50 साल से अपनी जगह से नहीं हिलता।

पिछले 31 वर्षों में पंजाब की सत्ता के शिखर पर 6 मुख्यमंत्री बदल गए। जिले की कमान 35 डिप्टी कमिश्नरों के हाथों से गुजरी। नगर परिषद में 25 कार्यकारी अधिकारियों (ईओ) की नेमप्लेट बदल गईं और 7 प्रधानों ने सत्ता की मलाई काटी।

इसके बावजूद, मुसापुर रोड स्थित 60 हजार टन कूड़े का बदबूदार पहाड़ आज भी व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है। आधी सदी से जारी इस नरक को खत्म करने के लिए आज तक एक टेंडर जारी न हो पाना, 'क्लास-2' नगर परिषद के 'डिजिटल' दावों का सबसे वीभत्स सच है।

इस लाइलाज बीमारी की जड़ में 'हार्ड इंफ्रास्ट्रक्चर' का अकाल है। शहर की सफाई व्यवस्था आज भी आदिम युग में जी रही है। कचरा उठाने के लिए कागजों में 6 'छोटा हाथी' (लोडर वाहन) हैं, जिनमें से 2 कबाड़ की शोभा बढ़ा रहे हैं और सिर्फ 4 ही सड़कों पर रेंग रहे हैं।

म्युनिसिपल कमेटी के पास पूरे शहर के लिए मात्र 1 जेसीबी, 3 ट्रैक्टर-ट्राली और प्राइवेट मैनुअल व मोटरसाइकिल वाली रेहड़ियां हैं। इन्हीं चंद जर्जर वाहनों के कंधों पर विकास का बोझ है। संसाधनों का यह अकाल इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि तीन दशकों में सत्ताधीशों के लिए जनता का स्वास्थ्य कभी प्राथमिकता रहा ही नहीं।

सत्ता की मलाई सबने खाई, पर नहीं ली सुध

1995 से 2026 तक नवांशहर ने हर राजनीतिक विचारधारा को आजमाया। कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन और आम आदमी पार्टी ने बारी-बारी सूबे की सत्ता चलाई। हाल ही में (2026) बहुजन समाज पार्टी ने भी ऐतिहासिक जीत के साथ स्थानीय कुर्सी पर कब्जा जमाया।

इसके बावजूद डंप हटाने को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी। यह सिर्फ प्रशासनिक अकर्मण्यता नहीं, बल्कि सरकारों की भी घोर लापरवाही का सुबूत है।

शहर से रोजाना निकल रहा 22 टन कचरा, पहुंच रहा मुसापुर डंप

ब्रिटिश काल में 'शिवाला बन्ना मल्ल' के समीप जिस नागरिक प्रशासन की नींव रखी गई थी, आज वह अपनी ही सांसें गिन रहा है। शहर के 19 वार्ड प्रतिदिन औसतन 22 टन ठोस कचरा उगलते हैं, जिसका अंतिम और एकमात्र ठिकाना मुसापुर का यही डंप है।

आज यह जगह एक विषैले ज्वालामुखी में तब्दील हो चुकी है। इससे उठने वाली सड़ांध और मीथेन गैस ने आसपास के गांवों और शहरी परिधि को एक ओपन-एयर गैस चैंबर बना दिया है। कागजों पर पर्यावरण संरक्षण का नाटक करते हुए गीला-सूखा कूड़ा अलग कर खाद बनाने के लिए 76 पिट (गड्ढे) जरूर बनाए गए हैं, लेकिन इस विशालकाय पहाड़ के सामने ये प्रशासनिक लीपापोती महज एक क्रूर मजाक लगती है।

इतिहास पर भारी वर्तमान की दुर्दशा

अलाउद्दीन खिलजी के दौर में अफगान प्रमुख नौशेर खान द्वारा बसाए गए 'नौसर' ने 1914 में रेलवे और अनाज मंडी के आगमन के साथ एक शानदार व्यावसायिक उड़ान भरी थी।

वर्ष 2008 में जब इस जिले का नाम एसबीएस नगर किया गया, तो लगा कि इस नाम का तेज बुनियादी अंधकार को मिटा देगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर वाकई नौकरशाही ने अपनी जवाबदेही समझी होती, तो आज नवांशहर आधुनिक सीवरेज, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन नागरिक सुविधाओं का राष्ट्रीय मॉडल होता। मुसापुर का यह डंप केवल कचरे का ढेर नहीं, बल्कि मृतप्राय हो चुके सिस्टम का जीता-जागता स्मारक है।

डंप से मुक्ति का रास्ता: बायो-माइनिंग की दरकार

इस विशालकाय पहाड़ को केवल ट्रैक्टर-ट्रालियों से नहीं हटाया जा सकता। इसे खत्म करने के लिए 'बायो-माइनिंग' और 'बायो-रेमेडिएशन' जैसी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की सख्त जरूरत है। इस प्रक्रिया में हेवी-ड्यूटी ट्रामल मशीनें, कचरे को छांटने वाले बैलिस्टिक सेपरेटर, श्रेडर, हैवी एक्सकेवेटर और डंपरों का बड़ा बेड़ा शामिल होता है।

दशकों पुराने कचरे को मशीनों से खोदकर उसमें 'बायो-कल्चर' का छिड़काव किया जाता है। इसके बाद ट्रामल मशीनों के जरिए पन्नी, प्लास्टिक, कपड़ा (आरडीएफ - रिफ्यूज ड्राइव्ड फ्यूल), मिट्टी (बायो-सॉइल) और पत्थरों को अलग किया जाता है। ज्वलनशील कचरे को सीमेंट फैक्ट्रियों में ईंधन के रूप में जला दिया जाता है। विडंबना यह है कि म्युनिसिपल कमेटी आज तक इस पूरी प्रक्रिया का खाका तक नहीं खींच पाई है।

हवा और पानी में घुल रहा जानलेवा जहर

बारिश के दिनों में डंप से रिसने वाला काला और अत्यधिक विषैला पानी (लीचेट) सीधा जमीन के अंदर जाकर ग्राउंडवाटर को दूषित कर रहा है, जो कैंसर, पीलिया, हैजा और किडनी की गंभीर बीमारियों को जन्म देता है।

दमघोंटू हवा: कचरे के अनियंत्रित तरीके से सड़ने के कारण भारी मात्रा में मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड गैसें बन रही हैं। गर्मी में अक्सर यहां आग भड़क जाती है, जिसके धुएं में मौजूद खतरनाक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) निवासियों को अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां दे रहे हैं।

हवा में तैरते कचरे के सूक्ष्म कणों और विषैले तत्वों से आसपास के ग्रामीणों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में त्वचा संक्रमण (स्किन एलर्जी) व आंखों में जलन की शिकायतें आम हो चुकी हैं।

एनजीटी के आदेशों की उड़ रहीं धज्जियां, प्रदूषण बोर्ड बना 'कागजी शेर'

इस पूरे संकट में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका भी कटघरे में है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के तहत 'लीगेसी वेस्ट' (पुराने कचरे के पहाड़ों) को तय समय सीमा के भीतर वैज्ञानिक तरीके से खत्म करना नगर परिषदों की कानूनी जिम्मेदारी है। ट्रिब्यूनल ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए करोड़ों रुपये का जुर्माना लगाता रहा है, लेकिन यहां दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं।

दूसरी ओर, पर्यावरण नियमों का पालन सुनिश्चित करवाने वाला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस मामले में महज 'कागजी शेर' साबित हुआ है। किसी भी बड़े अधिकारी ने आज तक कमेटी पर ऐसी कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, जिससे सिस्टम की नींद टूट सके। नतीजा यह है कि नियमों की किताब फाइलों में दबी है और जनता इस नरक को भोगने के लिए बेबस है।

अमृतसर का भगतांवाला डंप का प्लान तैयार करें तो बन सकता है मिसाल

अमृतसर स्थित भगतांवाला डंप में अंग्रेजों के समय से करीब 100 साल पुराने डंप में 11 लाख एमटी कूड़े का पहाड़ बन चुका था। अगस्त-2025 में तत्कालीन निगम कमिश्नर गुलप्रीत सिंह औलख ने मास्टर प्लान तैयार किया।

करीब 36.53 करोड़ का टेंडर 15 माह के लिए प्राइवेट कंपनी इकोस्टैन इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड को मिला। 2 अक्टूबर 2025 को इसका उद्घाटन हुआ। अब 10 माह में करीब 8.50 लाख टन कूड़े का पहाड़ खत्म हो चुका है। इसके लिए कंपनी ने दो एक्सकेवेटर, दो ट्रॉमल और एक बैलिस्टिक सेपरेटर लगाया।

तत्कालीन निगम कमिश्नर औलख का यह सफल प्लान आज भी अमृतसर में मिसाल बना हुआ है। यदि कुछ ऐसा प्लान नवांशहर में बनाया जाए तो करीब 60 हजार टन कूड़ा दो से तीन माह में ही खत्म किया जा सकता है।

मूसापुर रोड पर डंप खत्म करने पर काम कराया जाएगा: डीसी

मूसापुर रोड पर सालों पुराने डंप को खत्म करने के लिए काम कराया जाएगा। म्युनिसिपल कमेटी और प्रशासन मिलकर काम करेगी। शहर को क्लीन रखना पहली प्राथमिकता है। जिसके लिए समय-समय पर सफाई अभियान लोगों को जागरूक करने के लिए चलाया जाता है। जल्द ही डंप को खत्म करने पर काम शुरू होगा।

मूसापुर रोड डंप खत्म करने का मुद्दा विधानसभा में उठा चुके

विधायक नछत्तर पाल सिंह ने कहा कि मूसापुर रोड पर सालों से शहर का कूड़ा जाने से पहाड़ खड़ा हो गया है। विधानसभा सत्र में मुद्दा उठाया था तो सरकार ने डंप को खत्म कराने का भरोसा दिलाया था।

बाद में म्युनिसिपल कमेटी की तरफ से प्राइवेट जगह पर बन चुके डंप को दूसरी जगह शिफ्ट और खत्म करने को लेकर टेंडर लगाने का प्रस्ताव भी पास किया। लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। फिर से यह मुद्दा उठाएंगे। उनका प्रयास आगे भी जारी रहेगा।

मूसापुर का डंप खत्म कराने पर पहली बैठक में होगा फैसला: अध्यक्ष

म्युनिसिपल कमेटी की अध्यक्ष सुमन लाल ने कहा कि मूसापुर रोड स्थित डंप को खत्म कराने के लिए पहली मीटिंग में फैसला लिया जाएगा। शहर को साफ-सुथरा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

जल्द ही कमेटी की बैठक बुलाई जाएगी। स्वच्छता अभियान के तहत कई प्लान तैयार किए गए हैं। जल्द ही लोगों को जमीन पर भी दिखेगा।

मूसापुर रोड पर डंप खत्म करने पर काम कराया जाएगा: डीसी

मूसापुर रोड पर सालों पुराने डंप को खत्म करने के लिए काम कराया जाएगा। म्युनिसिपल कमेटी और प्रशासन मिलकर काम करेगी। शहर को क्लीन रखना पहली प्राथमिकता है। जिसके लिए समय-समय पर सफाई अभियान लोगों को जागरूक करने के लिए चलाया जाता है। जल्द ही डंप को खत्म करने पर काम शुरू होगा।