संवाद सूत्र, श्री मुक्तसर साहिब

शिव को संहारक और दुखों से मुक्त करने वाला माना गया है। दूसरे के दुखों को दूर करने वाले देवाधिदेव महादेव दुखों के सागर में डूब जाएं और रोने लगें ऐसा संभव नहीं लगता। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि एक बार ऐसा भी हुआ। संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संकटों से निजात दिलाने वाले शिव को आखिर क्या दुख हुआ कि वह रोने लगे। इस बारे में गांधी नगर में कथावाचक पं. पूरन चन्द्र जोशी ने बताया।

पं.जोशी ने बताया कि देवी भागवत पुराण के अनुसार बहुत शक्तिशाली असुर त्रिपुरासुर को अपनी शक्तियों पर घमंड हो गया और उसने धरती पर उत्पात मचाना शुरू किया। वह देवताओं और ऋषियों को भी सताने लगा। देव या ऋषि कोई भी उसे हराने में कामयाब नहीं हुए तो ब्रह्मा, विष्णु और दूसरे देवता भगवान शिव के पास त्रिपुरासुर के वध की प्रार्थना लेकर गए। भगवान यह सुनकर बहुत द्रवित हुए और अपनी आंखें योग मुद्रा में बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद जब उन्होंने आंखें खोलीं तो उनसे अश्रु बूंद धरती पर टपक पड़े। कहते हैं जहां-जहां शिव के आंसू की बूंदें गिरीं वहां-वहां रुद्राक्ष के वृक्ष उग आए। रुद्र का अर्थ है ''शिव और अक्ष मतलब ''आंख जिसका अर्थ है शिव का प्रलयंकारी तीसरा नेत्र। इसलिए इन पेड़ों पर जो फल आए उन्हें ''रुद्राक्ष मोती कहा गया। शिव ने अपने त्रिशूल से त्रिपुरासुर का वध कर पृथ्वी और देवलोक को उसके अत्याचार से मुक्त कराया।

पं. जोशी ने बताया कि धरती पर रुद्राक्ष और इसकी माला का बहुत महत्व है। पुराणों के अनुसार इसे धारण करने वालों पर शिव की कृपा होती है। रुद्राक्ष पहनना पवित्रता का प्रतीक और पापों से मुक्तिदायक माना गया है। पुराणों में ही रुद्राक्ष रखा हुआ पानी पीना धरती पर देवत्व की प्राप्ति करना बताया गया है। इसके अनुसार ऐसे मनुष्य का खाना देवताओं के भोजन के समान पवित्र हो जाता है और वह अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इसे पहनना जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना बताया गया है। अन्यथा मनुष्य लाखों जन्मों तक जीवन चक्र में बंधा हुआ मृत्युलोक में जन्म लेता रहेगा।

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