मोगा [सत्येन ओझा]। Contract farming: कृषि कानून पर चर्चाओं के बीच कांट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध कृषि) को लेकर भी देशभर में चर्चा जोरों पर रही। इधर, पंजाब के मोगा में कांट्रैक्ट फार्मिंग को बीते डेढ़ दशक से आजमा रहे किसान की सफलता की कहानी बताती है कि यह विधा किसानों की किस्मत बदल सकती है।

गांव इंद्रगढ़ निवासी किसान मनजिंदर सिंह ने वर्ष 2005 में अपनी 20 एकड़ जमीन पर खेती का अनुबंध एक कंपनी के साथ किया। इसके बूते सफलता की नई कहानी लिखी और आज वह 100 एकड़ कृषि भूमि के स्वामी बन चुके हैं। सामान्य किसान जहां प्रति एकड़ 70 से 80 हजार रुपये तक कमाता है, वहीं मनजिंदर डेढ़ लाख रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने अब एक और कंपनी से भी करार किया है।

मनजिंदर बताते हैं कि 2005 में जब खेती से निराशा होने लगी और कर्ज बढ़ने लगा तो उन्होंने खेती छोड़ने का फैसला कर लिया था। तब किसी ने कांट्रैक्ट फार्मिंग की जानकारी दी तो उन्होंने आखिरी दांव खेला। मनजिंदर के अनुसार कांट्रैक्ट फार्मिंग से उन्हें हर साल खेती की नई-नई तकनीकों की जानकारी मिली। नए और उन्नत बीज मिलते गए। आमतौर पर सीजन के बाद किसान ट्रैक्टर-ट्रालियां खड़ी कर देते हैं, लेकिन यहां उनकी मशीनरी 12 महीने काम करती। कंपनी उसे अपने काम के लिए किराए पर ले लेती। यह उनकी अतिरिक्त कमाई का हिस्सा बना।

मनजिंदर ने बताया कि खेती के लिए आमतौर पर मजदूरों को सीजन के हिसाब से पैसे मिलते हैं और आधा साल वे बेरोजगार ही रहते हैं, लेकिन यहां उनसे जुड़े 200 लोगों को पूरे 12 महीने काम मिल रहा है। जब से उन्होंने खेती का यह फार्मूला अपनाया है, मंडियों पर निर्भरता समाप्त हो गई। तय शर्तो के अनुरूप कंपनी निर्धारित रकबे में फसल तैयार कराती है, देखरेख कराती है और तैयार होने पर पैदावार को खुद खेत से ले जाती है। समय पर पैसा खाते में आ जाता है। हर साल वह तीन फसलें ले रहे हैं। कुछ जमीन पर आलू, धान और सब्जियां अलग से उगाते हैं। दरअसल, वह दो प्रकार से कंपनी के साथ काम कर रहे हैं। कांट्रैक्ट पर तो खेती करते ही हैं, कंपनी से बीज लेकर अपने स्तर पर भी कुछ भूमि पर स्वयं कृषि करते हैं। खुद से तैयार की गई फसल का कंपनी यदि वाजिब दाम देती है तो ठीक है, अन्यथा बाजार में बेच देते हैं।

बकौल मनजिंदर सिंह, कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर उनका अनुभव सुखद रहा है। इससे उनका जीवनस्तर बदला है। पहले भी अपने खेत के मालिक थे और आज भी हैं। अब संसाधनों की कमी, कर्ज के दलदल और घाटे से मुक्ति मिल गई है। अब फसल खराब हो या बाढ़ आए, उनको कंपनी पूरे पैसे देती है। पूरे समय फसल कंपनी के कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में रहती है। कृषि उत्पाद के लिए मूल्य का निर्धारण भी अपनी शर्तो पर करते हैं।

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