मोगा में 103 साल की उम्र में बुजुर्ग ने ली अंतिम सांस, पोतों ने ढोल-नगाड़ों के साथ दी अंतिम विदाई
मोगा में 103 वर्षीय बुजुर्ग को पोतों ने ढोल-नगाड़ों के साथ भावुक विदाई दी, जिन्होंने माता-पिता के निधन के बाद उन्हें पाला था।
HighLights
103 वर्षीय बुजुर्ग को मोगा में भावुक विदाई
पोतों ने ढोल-नगाड़ों के साथ निकाली अंतिम यात्रा
दादा ने माता-पिता बनकर पोतों का पालन-पोषण किया
राज कुमार राजू, मोगा। स्थानीय लाल सिंह रोड इलाके में उस समय माहौल भावुक हो गया, जब 103 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद एक बुजुर्ग का निधन हो गया। परिवार ने अपने बुजुर्ग की अंतिम विदाई को यादगार बनाने के लिए ढोल-नगाड़ों के साथ अंतिम यात्रा निकाली। अंतिम यात्रा में परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों की आंखें नम थीं। दादा के प्रति पोतों का सम्मान और प्यार देखकर वहां मौजूद लोग भी भावुक हो गए।
बुजुर्ग के पोते प्रेम सिंह ने बताया कि जब वह और उनके भाई-बहन छोटे थे, उसी दौरान उनके माता-पिता का निधन हो गया था। माता-पिता के जाने के बाद परिवार के बच्चों की जिम्मेदारी उनके दादा ने अपने कंधों पर उठा ली।
उन्होंने पोतों के लिए दादा की भूमिका तक सीमित नहीं रखी, बल्कि मां और पिता दोनों का फर्ज निभाया। उन्होंने बच्चों का पालन-पोषण किया, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और जीवन के हर मुश्किल दौर में उनका साथ दिया।
प्रेम सिंह ने भावुक होते हुए कहा कि दादा ने कभी उन्हें माता-पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। उन्होंने हमेशा प्यार, अनुशासन और संस्कारों के साथ उनका मार्गदर्शन किया। जीवनभर उनके सिर पर दादा का साया रहा, लेकिन अब वह साया हमेशा के लिए उठ गया है। उन्होंने कहा कि दादा का निधन परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी यादें, प्यार और उनके दिए संस्कार आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।
दस पैसे में सिलाई कर चलाया परिवार
परिवार के सदस्य तरसेम सिंह ने बताया कि बुजुर्ग ने अपना पूरा जीवन सादगी, ईमानदारी और मेहनत के साथ बिताया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में परिवार का पालन-पोषण किया। मेहनत-मजदूरी के साथ उन्होंने सिलाई का काम भी किया।
उस समय वह महज दस पैसे में कपड़े सिलकर परिवार का गुजारा चलाते थे। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और परिवार को आगे बढ़ाने के लिए लगातार मेहनत करते रहे।
तरसेम सिंह के अनुसार, बुजुर्ग का स्वभाव बेहद शांत, नम्र और मिलनसार था। उन्होंने अपने लंबे जीवन में कभी किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की और न ही किसी का दिल दुखाने की कोशिश की। 103 वर्ष की उम्र तक जीवन जीना अपने आप में एक लंबा सफर है। उन्होंने कहा कि बुजुर्ग अपने पीछे केवल यादें ही नहीं, बल्कि ईमानदारी, मेहनत और अच्छे संस्कारों की मजबूत विरासत छोड़ गए हैं।
जिस दादा ने मां-बाप बनकर संभाला, उन्हीं पोतों ने दी अंतिम विदाई
परिवार के लिए यह अंतिम विदाई सिर्फ एक बुजुर्ग की विदाई नहीं थी, बल्कि उस शख्स को श्रद्धांजलि थी, जिसने माता-पिता के निधन के बाद बच्चों के जीवन में मां और पिता दोनों की कमी पूरी की। जिन पोतों को दादा ने बचपन में संभाला और जीवन की राह दिखाई, उन्हीं पोतों ने ढोल-नगाड़ों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी।
अंतिम यात्रा के दौरान परिवार और क्षेत्र के लोगों ने बुजुर्ग के प्रति सम्मान व्यक्त किया। ढोल-नगाड़ों के साथ निकली यह अंतिम यात्रा इलाके में चर्चा का विषय बनी रही और लोगों ने परिवार की ओर से दी गई इस भावपूर्ण विदाई की सराहना की।
