सत्येन ओझा.मोगा

उस दौर में जब टेक्नोलाजी विकसित नहीं थी, पदमश्री राय बहादुर डा.मथुरादास ने नेत्र सर्जरी के क्षेत्र में मानवता की जो मिसाल कायम की, तकनीक के दौर में आज भी उसे छू तक नहीं पाया है। पदमश्री राय बहादुर डा.मथुरादास पाहवा ने अपने जीवन काल में आंखों की पांच लाख से ज्यादा सर्जरी कीं, एक ही दिन में साढ़े तीन सौ लोगों की सर्जरी करने का रिकार्ड उनके नाम है, जिसे तकनीक के इस दौर में भी कोई चिकित्सक नहीं तोड़ सका है। डा.मथुरादास पाहवा की खास बात ये थी कि वे गरीबों से नेतृत्व सर्जरी का कोई शुल्क नहीं लेते थे। राजा-महाराजाओं या बड़े लोगों की सर्जरी के बदले वह फीस के रूप में किसी स्कूल, कालेज का कमरा या हाल बनवाने का संकल्प दान में लेते हैं। इसी तरह उन्होंने मोगा में सिविल अस्पताल, डीएम कालेज जैसे प्रतिष्ठित स्कूल, कालेज, अस्पताल बनवाए।

साहित्यकार सत्यप्रकाश उप्पल की मानें तो डा.मथुरादास पाहवा के मानवता के प्रति सेवा के इसी संकल्प को देखते हुए गुलाम भारत में तब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें उस समय के सर्वोत्तम सम्मान राय बहादुर की उपाधि से अलंकृत किया था। आजाद भारत में भारत सरकार ने उन्हे साल 1954 में पदमश्री पुरस्कार देकर सम्मानित किया था। अपने जीवन काल में पांच लाख से ज्यादा सर्जरी की, 92 वर्ष की आयु तक आपरेशन करना जारी रखा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे प्रभावित

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी डा.मथुरादास पाहवा की इस विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर हरिजन सेवक नामक पत्र के 17 फरवरी 1942 के अंक में लिखा था। डा. मथुरा दास जमना लालजी के निमंत्रण पर वर्धा आए थे। अपने सहायकों के साथ मोतियाबिद से अंधे हुए लगभग तीन सौ लोगों का एक ही दिन में आपरेशन कर उनकी रोशनी लौटाई थी। इस सामूहिक कार्य को उन्होंने यज्ञ (बलिदान) के रूप में वर्णित किया था। महात्मा गांधी ने लिखा था, 'मैंने डा. मथुरादास को उनके निष्कपट और त्वरित शल्य चिकित्सा के लिए प्रशंसा में नमन किया। उन्होंने एक मिनट में एक की दर से आपरेशन किए। शायद ही कोई दुर्घटना हुई हो। वह गरीबों से कोई शुल्क नहीं लेते।' लाहौर में की पढ़ाई, मोगा में करियर बनाया

डा.मथुरादास पाहवा ने पाकिस्तान में मेडिकल स्कूल, लाहौर से मेडिकल की पढ़ाई थी (तब वह हिदुस्तान का हिस्सा था) 1901 में डिप्लोमा पूरा होने पर उन्हें प्लेग ड्यूटी पर जंडियाला जिले, सियालकोट में सब-असिस्टेंट सर्जन नियुक्त किया गया था। मात्र 21 साल की उम्र में डा.मथुरादास पाहवा ने मोगा में अपना करियर शुरू किया था। 1927 में उन्होंने मोगा में दयानंद मथुरादास अस्पताल की शुरुआत की। बाद में सरकार ने इस अस्पताल का नाम द सिविल हास्पिटल, मोगा रख दिया था। अस्पताल की शुरूआत डा. मथुरा दास ने अपनी संपत्ति में की थी जहां वे रहते थे। वर्तमान में ये जिला सिविल अस्पताल बन चुका है, डा. मथुरा दास के पुराने घर का जो ढांचा था वह भी बदल चुका है। साल 2004 में अस्पताल का नाम मथुरादास सिविल अस्पताल कर दिया गया था। संस्थापक के रूप में उनकी स्मृति को प्रतिमा के रूप में प्रवेशद्वार पर लगाया गया है।

16 साल रहे नगर कौंसिल के अध्यक्ष

डा.मथुरादास मोगा नगर कौंसिल के साल 1924 से लेकर साल 1940 तक अध्यक्ष रहे। इसी दौरान उन्होंने न्यू टाउन की स्थापना की, जो योजनाबद्ध ढंग से बसाया गया टाउन था। शहर की सीवर व्यवस्था की भी योजना बनाई। कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। डा.मथुरादास को आधुनिक मोगा का जन्मदाता माना जाता है।

Edited By: Jagran