संवाद सहयोगी, मोगा

देवी दास केवल कृष्ण चैरिटेबल ट्रस्ट में ऑनलाइन मांगलिक महासत्संग आचार्य सुनील शास्त्री की अगुआई में किया गया। इस अवसर पर सुनील शास्त्री ने कहा कि दूसरों को दुख देने वाला व्यक्ति स्वयं भी दुखी हो जाता है। यदि आप स्वयं सुखी हैं, तभी दूसरों को सुख दे पाएंगे अन्यथा नहीं। उन्होंने कहा कि जैसा बीज बोएंगे, वैसा फल मिलेगा। यह पुरानी कहावत है। लोग इन पुरानी बातों को पढ़ते-सुनते तो रहते हैं, परंतु उतना लाभ नहीं उठाते जितना उठाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संसार का वातावरण चारों ओर ऐसा ही है। लोग अपने-अपने स्वार्थ पूरे करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ तो आत्मा का स्वभाव है,जो कभी छूटता नहीं। इसलिए हम यह नहीं कहते कि स्वार्थ छोड़ दो। मगर, इतना अवश्य कहेंगे कि अपने स्वार्थ पूर्ति करते हुए कम से कम दूसरों को दुख मत दो। सभी लोग सीमा में रहकर अपना अपना स्वार्थ पूरा करें। सीमा का अतिक्रमण न करें। दूसरों को कष्ट न दें। जिस खेत में बीज बोया जाता है, यदि उस खेत की भूमि उपजाऊ है तो वहां उसका अंकुर पौधा और वृक्ष भी बहुत उत्तम प्रकार का होता है। यदि खेत की भूमि उपजाऊ न हो, तो वहां अंकुर पौधा व वृक्ष भी अच्छा नहीं उपजता। जिस खेत में बीज बोया जाता है, उसी खेत में उसका फल लगता है दूसरे खेत में नहीं। इसी प्रकार से जो व्यक्ति अपने मन में दूसरों के प्रति ईष्र्या, द्वेष , जलन आदि रखता है उसी के मन में इस बीज का अंकुर फूटता है। वहीं ईष्र्या, द्वेष, जलन का वृक्ष पनपता है और उसी व्यक्ति को सबसे अधिक दुख देता है। यदि वह अपने मन में सेवा परोपकार प्रसन्नता आदि का बीज बोए, तो वैसा ही वृक्ष और फल उसके मन में उत्पन्न होगा। उससे वह स्वयं सुखी हो जाएगा। यदि वह सुखी होगा तभी दूसरों को सुख दे पाएगा ।

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