सत्येन ओझा, मोगा :

किसी जिले के आइएएस अधिकारी की बात आती है तो आखों के सामने एक दृश्य उभरता है। सबसे ज्यादा पावरफुल व्यक्ति, जिसके एक आदेश पर बड़े से बड़ा काम हो सकता है। सरकारी गाड़ी, बंगला व हर सुख सुविधा, ये बातें सिर्फ वही कह सकता है जो उस पद पर नहीं है।

डिप्टी कमिश्नर संदीप हंस इससे हटकर हैं। उन पर कुर्सी की खुमारी हावी नहीं होती। वह सादा जीवन जीवन में विश्वास रखते हैं। अपनी मा से उतना ही प्यार करते हैं जितना कोई आम इंसान करता है। मां की सेवा करने को वह भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।

मोगा के डिप्टी कमिश्नर के साथ बिताए गए कुछ पलों में हमनें यही जाना। डीसी संदीप हंस कितनी भी प्रशासनिक व्यस्तता हो, लेकिन हर रोज सुबह वह मा का बीपी व शुगर खुद चेक करते हैं। मा चाय देर से लेती हैं, लेकिन डीसी हंस चाय नहीं लेते। वह नियमित योग करने के बाद नींबू पानी के साथ सुबह की शुरूआत करते हैं। इसी के साथ सरसरे ढंग से समाचार पत्रों पर नजर डालते हैं। सुबह पाच बजे ही डीसी के कुछ खास मित्र उनके आवास पर पहुंच जाते हैं। बस उन्हीं के साथ वह योग करते हैं। समय के पाबंद बहुत हैं, शायद ये योग का कमाल हो। सíदयों में कई बार साथी योग साधक उनके घर पहुंचने में देरी कर देते थे। 15 मिनट ऊपर हो जाते तो डीसी का फोन आ जाता था, बिलकुल उसी अंदाज में जैसे कोई सामान्य व्यक्ति अपने दोस्त को करता है कि वह इंतजार कर रहे हैं, आप पहुंचे नहीं अभी तक। उनका परिवार कामकाज के कारण और बेटे की पढ़ाई की वजह से मोगा में उनके साथ नहीं रहता है।

ऐसे में सुबह जो तीन चार योग साधकों की महफिल सजती है वही दोस्ती की महफिल होती है और जिंदगी का उत्सव भी। क्योंकि भले ही अधिकारों की बात करें तो डीसी जिले का मालिक होता है और सबसे ताकतवर अधिकारी, लेकिन दिन भर प्रशासनिक व्यस्तता के बाद संदीप हंस की कोशिश होती है परिवार के साथ फोन पर बात करें। लेकिन ये पावर तब निरर्थक लगती है जब बच्चे कहीं साथ जाने या किसी अन्य काम के लिए बोलते हैं और वो हो नहीं पाता। बच्चों के साथ किए वादे अकसर टूट जाते हैं। तब डीसी संदीप हंस के अंदर के भी एक सामान्य पिता जैसा दर्द फूट पड़ता है लेकिन चंद पलों के लिए ही। फिर जिम्मेदारी को देखकर अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं । समाचार पत्रों के पन्ने पलटने के बाद वह कार्यालय जाने के लिए तैयार होते हैं। इस बीच मा की चाय का समय हो जाता होता है। चाय देने से पहले वह उनकी नियमित रूप से शुगर व बीपी चेक करना नहीं भूलते। बकाल डीसी संदीप हंस, 'ये कोरोना काल का समय है। ऐसे में काम भी सामान्य दिनों की तुलना में काफी ज्यादा करना पड़ता है। पिछले एक साल से रुटीन ऐसा बनी है कि 12-14 घटे काम कर रहा हूं। जरूरी काम निपटाने के बाद फुर्सत के कुछ पल मिलते हैं तो पुराने दिलकश हिदी गीत को सुनकर खुद को तरोताजा कर लेता हूं। समय मिल जाए तो नेटफ्लक्सि पर कोई फिल्म देख लेता हूं। अगर आवास पर हूं तो अपने पैट (डॉग डेनिस) के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। डेनिस भी उनके इशारों को पूरी तरह समझता है।'

यही डीसी संदीप हंस की दिनचर्या है। कुछ लोग उन्हें बहुत पावरफुल या सबकुछ करने में सक्षम व्यक्ति के रूप में देखते हैं, लेकिन अधिकांश ये नहीं देख पाते कि अधिकारों की असीमित पावर के बीच एक पिता, एक पति और एक बेटा अपनों के बीच अपनों का ही फर्ज नहीं निभा पाता है। वहा उसकी पावर किसी काम नहीं आती, लेकिन यह सब किसी को दिखता नहीं है।

प्रस्तुति : सत्येन ओझा

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