चंडीगढ़ [इन्द्रप्रीत सिंह]। वर्ष 1995 में देशभर में पंचायतों में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण लागू हुआ। उसके ठीक 25 साल बाद एक बार फिर महिलाओं को स्थानीय निकाय इकाइयों में आगे लाने के 50 फीसद का आरक्षण लागू किया गया। 25 साल में एक पीढ़ी बदल गई। आरक्षण से क्या महिलाएं अपने आपको सशक्त कर पाईं या फिर वे आज भी अपने पिता, पति या भाई की रबड़ स्टैंप हैं, इसको समझने के लिए इन दो अलग-अलग केसों को समझना होगा..

केस-1

सरपंच बन जाती हैं रबड़ स्टैंप

यह बात 1997 की है। 1995 में अनुसूचित जाति को पंचायत चुनाव में आरक्षण का लाभ मिलने के बाद पंजाब में भी पंचायत चुनाव हुए थे। चुनाव हुए अभी चार महीने ही हुए थे। बठिंडा के एक गांव की अनुसूचित जाति की महिला सरपंच एडीसी (डी) के आफिस में प्रोजेक्ट अफसर साधू राम कुशला के पास आती है और अपने सरपंच चुने जाने का सर्टिफकेट उन्हें देते हुए कहती हैं कि उन्हें सरपंची नहीं करनी। यह हैरान करने वाला मामला था।

साधू राम कुशला अधेड़ उम्र की महिला को बिठाते हैं और कहते हैं कि आप क्यों सरपंची छोड़ना चाहती हो? वह बताती हैं कि चुनाव से पहले वह सरपंच साहिब के यहां कूड़ा कर्कट बीनने का काम करती थीं। बदले में आठ सौ रुपये महीना मिलते थे। सरपंच बनते ही उन्होंने कूड़ा कर्कट बीनने का काम यह कहते हुए वापस ले लिया कि अब आप सरपंच हो।

वह बताती हैं कि सरपंच साहिब ने (पहले के) उनसे कहा कि सरपंच को अफसरों के साथ उठना-बैठना पड़ता है, इसलिए ढंग के कपड़े सिलवा लो। इसके लिए दो हजार रुपये दिए और यह कर्ज मेरे ऊपर चढ़ गया। हर रोज मुझे कभी थाने, कभी डीसी दफ्तर, कभी तहसीलदार, कभी बीडीओ के पास कार में बिठाकर ले जाते हैं। अंगूठा लगवाकर कह देते थे, हमें तो शहर में काम है आप बस में चली जाओ। बस का किराया तक नहीं देते। इस तरह चार महीनों में ही पांच हजार का कर्ज चढ़ गया। पहले महीने में आठ सौ रुपये मिल जाते थे। अब मैं उससे भी गई... कहते हुए सरपंच की आंखें भर आईं।

केस-2

और इन्होंने साबित कर दिया हम पुरुषों से कम नहीं

25 साल बाद उसी बठिंडा जिले के माणकखाना गांव की युवा सरपंच सेशनदीप कौर सिद्धू की अगुआई में गांव को दो नेशनल अवार्ड मिले हैं। पहला अवार्ड दीन दयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तीकरण और दूसरा नानाजी देशमुख गौरव ग्राम सभा अवार्ड। बीएससी एग्रीकल्चर करके पहली बार सरपंच बनी सेशनदीप कौर सिद्धू ने मात्र दो तीन साल में ही अपने गांव को राष्ट्रीय पटल पर लाकर लंबे समय से स्थानीय निकायों की सत्ता पर काबिज रहने वाले पुरुषों को चुनौती दी है।

उन्होंने दिखा दिया कि महिलाओं को मौका मिले तो पुरुषों से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से अपने गांव की तस्वीर को संवार सकती हैं। सेशनदीप ने महिलाओं को इकट्ठा करके ग्राम सभा के संकल्प को चरितार्थ किया है और बताया कि असली ताकत उनके हाथों में है।

सेशनदीप बताती हैं कि ग्राम सभा में लोगों को बुलाना आसान काम नहीं है, इसलिए उन्होंने कभी पराली न जलाने वाले किसानों, कभी सबसे बड़े बुजुर्गो और कभी परीक्षाओं में अच्छे नंबर लेकर पास होने वाले बच्चों को सम्मानित करने के बहाने इकट्ठा किया। अब लोग इसका महत्व समझने लगे हैं। शहरों की तरह की कूड़ा कलेक्शन का सिस्टम बनाना, सभी को सूखा और गीला कूड़ा अलग-अलग इकट्ठा करने के बारे में जागरूक करना आदि सब समझ गए हैं।

दोनों केस स्टडी को देखकर यह बात अच्छी समझी जा सकती है कि महिलाओं को सिर्फ आरक्षण नहीं चाहिए, सशक्तीकरण चाहिए। वह पुरुषों से कहीं बेहतर साबित हो सकती हैं। सेशनदीप एकमात्र उदाहरण नहीं हैं। बठिंडा जिले का ही एक गांव है अकलिया कलां, जिनकी सरपंच ने अपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी केस थाना, कचहरियों में नहीं जाने दिया। बल्कि खुद ही अपनी न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करके सभी केसों का निपटारा गांव स्तर पर ही किया। यह कोई छोटी बात नहीं है।

हालांकि पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्ट साधू राम कुशला कहते हैं कि ज्यादातर जगह पर महिलाएं रबड़ स्टैंप की तरह ही होती हैं। उन्हें सशक्त करने के लिए आरक्षण एक औजार है लेकिन इसके साथ - साथ पढ़ा लिखा होना भी बहुत जरूरी है। सेशनदीप, साधू राम कुशला के इस विचार से सहमत हैं। वह कहती हैं कि अगर महिला पढ़ी- लिखी नहीं होगी तो पंचायत सेक्रेटरी से लेकर ऊपर तक की ब्यूरोक्रेसी उसे अपने तरीके से चलाएगी, जबकि संविधान ने उन्हें कई तरह की ताकतें दे रखी हैं। उन्हें योजनाओं के बारे में पता नहीं चलता। मेरा मानना है कि जिस तरह सिविल अधिकारियों को 15 से 30 दिन की ट्रेनिंग दी जाती है, इसी तरह की ट्रेनिंग दी जाए।