बिदु उप्पल, जगराओं

दुनिया में कोरोना वायरस महामारी फैलने के कारण सबसे अधिक जिम्मेवारी डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की बढ़ी है। फरवरी से कोरोना वायरस महामारी दुनिया में तेजी से फैलने के बाद देश में मार्च में लॉकडाउन लगने के बावजूद कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की गिनती तेजी से बढ़ती जा रही है। ऐसे में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टरों व पैरामेडिकल, नर्सिग व सेहत विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मिायें को दोगुना काम करना पड़ रहा है। यह कहना है जगराओं सिविल अस्पताल के सीनियर मेडिकल ऑफसर (एसएमओ) डॉ. सुखजीवन कक्कड़ का।

बता दें कि कोरोना वायरस के कारण अन्य रोगों के इलाज के लिए लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में डिस्पेंसरियों में डॉक्टरों की कमी झेलनी पड़ी है, क्योंकि अधिकतर डॉक्टरों की ड्यूटी कोरोना वायरस से निपटने के लिए लगाई गई थी। मगर, संबंधित डिस्पेंसरियों व ग्रामीण अस्पतालों के डॉक्टर कम स्टाफ के होते हुए भी मरीजों को सेवाएं देने में जुटे हैं। डॉक्टरों की कमी के कारण कई बार मरीजों को अस्पताल के सप्ताह में दो-तीन चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। मगर, उनका इलाज कर दिया जाता है। इस संदर्भ में डॉ. कक्कड़ ने बताया कि सब-तहसील जगराओं सिविल अस्पताल में आंखों, त्वचा, गायनी, मेडिसिन, आर्थो, चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉक्टर व पैथोलॉजिस्ट सभी हैं, लेकिन ईएनटी व रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टरों के पद खाली हैं। इसके अलावा 70 से अधिक पैरामेडिकल व नर्सिग स्टाफ तो है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण हरेक डॉक्टर व पैरामेडिकल स्टाफ सहित अन्य कर्मियों का काम बढ़ गया है।

उन्होंने बताया कि रोजाना अस्पताल में करीब हर विभाग को मिलाकर 300 से अधिक ओपीडी व इमरजैंसी होती है। ऐसे में अस्पताल में मौजूद डॉक्टर ओपीडी व इमरजैंसी की 24 घंटे रोटेशन में अपनी ड्यूटियां देते हैं। इसके अलावा कोरोना वायरस के कारण बने आइसोलेशन वार्ड व फ्लू कार्नर बनाए गए हैं। इसके लिए अलग से स्टाफ की जरूरत पड़ती थी। इसलिए ग्रामीण इलाकों में चल रहे रूरल मेडिकल ऑफिसर की आइसोलेशन वार्ड व आयुर्वेदिक डॉक्टरों की फ्लू कार्नर में ड्यूटी लगाई गई है। जिससे ग्रामीण इलाकों में चल रही डिस्पेंसरियों में रोजाना आने वाले मरीजों को डॉक्टरों से दवा लेने के लिए आने पर केवल तीन-चार दिन ही डॉक्टर मिलते हैं। इतना ही नहीं जब इमरजेंसी में गांवों में डॉक्टर नहीं मिलते हैं, तो उन्हें जगराओं सिविल अस्पताल में आना पड़ता है। इसके अलावा आजकल ऑनलाइन काम होने की वजह से कंप्यूटर ऑपरेटरों की कमी बहुत खलती है। ऐसे में कई बार अन्य स्टाफ से कंप्यूटर व क्लर्क का काम लेना पड़ता है। अस्पताल में ईएमओ व एमओ की कमी है, जिससे हरेक डॉक्टर, पैरामेडिकल व नर्सिग स्टाफ को डबल-डबल काम रोटेशन में बांटा गया है।

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आजकल छह में से तीन डॉक्टर ही सीएचसी हठूर में : डॉ. रिपजीत कौर

इस बारे में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) हठूर की एसएमओ डॉ. रिपजीत कौर ने बताया कि अस्पताल चाहे छोटा हो या बड़ा। डॉक्टरों व स्टाफ की कमी हो जाती है। ऐसे में अगर अधिक इमरजैसी जैसे कोरोना महामारी संकट है, तो कम्युनिटी सेंटर में तैनात छह डाक्टरों में से तीन डॉक्टर अन्य अस्पतालों में ड्यूटियां दे रहे हैं। ऐसे में केवल तीन डॉक्टरों व अन्य स्टाफ से काम चलाया जा रहा है। जब मुश्किल अधिक होती है, तो सिविल सर्जन व विभाग को सूचित कर हर मुश्किल का समाधान निकाल लेते हैं, ताकि सीएचसी में आने वाले मरीजों को स्वास्थ्य संबंधी सभी सुविधाएं प्राप्त हों।

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सीएचसी सिधवां बेट में स्टाफ की कमी, पर काम प्रभावित नहीं : डॉ. मनदीप सिद्धू

कम्युनिटी हेल्थ सेंटर सिधवां बेट की एसएमओ डॉ. मनदीप सिद्धू ने बताया कि सरकारी अस्पतालों में मैन पावर की कमी है। अब यहां के डॉक्टरों की ड्यूटी अन्य बड़े अस्पतालों में लग जाती है। यहां पर जितना शेष स्टाफ रहता है, वह दोगुनी ड्यूटी करता है। सीएचसी सेंटर में डॉक्टर, एक्स-रे मैन पावर व चतुर्थ श्रेणी स्टाफ की कमी है। फिलहाल, मेडिकल सेवाएं प्रभावित नहीं होने देते हैं। विभाग को अस्पताल में क्या कमियां व जरूरतें हैं, इस बारे में लिखकर दिया हुआ है।

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