संगरूर [मनदीप कुमार]। धूरी क्षेत्र के गन्ना उत्पादक इस बात से परेशान हैं कि शुगर मिलों ने उनका पिछले साल का भुगतान अब तक नहीं किया। यह करीब 20 करोड़ रुपये बनता है, लेकिन इसी इलाके के गांव अकोई साहिब के किसान गुरमीत सिंह पिछले पांच साल से अपना गन्ना शुगर मिलों को नहीं बेच रहे। उन्होंने बाकी किसानों से हट कर अलग राह पकड़ी और गन्ने से मेडिसिनल यानी औषधीय गुणों वाला सिरका बनाना शुरू किया। अब वे अन्य किसानों के मुकाबले दस गुणा कमाई कर रहे हैं। गुरमीत कहते हैं कि वह कई सालों से गन्ना उगा रहे हैं। पहले शुगर मिलों को बेचते थे, लेकिन रेट सही नहीं मिलता था। रेट मिल भी जाए तो पेमेंट देरी से मिलती थी। वह गन्ने की काश्त से ऊब गए थे।

उनके पिता सोहन सिंह घर पर मिट्टी के घड़े में गन्ने का रस डालकर कई माह तक दबा देते थे, जिसमें कुछ अन्य सामग्री डालकर घर के लिए सिरका तैयार करते थे। इसी दिशा पर कदम बढ़ाते हुए उन्होंने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) से 2015 में ट्रेनिंग ली और यह काम शुरू किया। यह प्रयास इतना सफल हुआ कि अब वह 11 प्रकार का सिरका तैयार करते हैं और पंजाब, दिल्ली व हरियाणा सहित अन्य राज्यों में इसे बेचते हैं।

अपने बनाए सिरकों के साथ संगरूर के गांव अकोई साहिब के किसान गुरमीत सिंह। जागरण

एक क्विंटल गन्ना शुगर मिल को बेचने पर 310 रुपये मिलते हैं। इसमें लेबर व ढुलाई का खर्च निकाल लें तो मुश्किल से 200-250 रुपये ही बचते हैं। वहीं, एक क्विंटल गन्ने से 30 से 40 बोतल सिरका तैयार हो जाता है। एक बोतल 100 रुपये में बिकती है। लेबर, ढुलाई, मशीनरी व पैकिंग आदि का खर्च निकालकर 2000 से 2500 रुपये बच जाते हैं। गुरमीत सिंह न केवल औषधीय सिरका बनाकर लोगों को निरोग बना रहे हैं, बल्कि गन्ने की खेती को मुनाफे का सौदा बनाने में भी कामयाब हुए हैं।

11 प्रकार का औषधीय सिरका

गुरमीत सिंह ने कहा कि आम तौर पर लोग सिरके का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों व अचार आदि में करते हैं, लेकिन उनका बनाया 11 प्रकार का सिरका खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल के साथ-साथ जोड़ों के दर्द, शुगर, सांस व पेट की बीमारियों, यूरिक एसिड, मोटापा, उच्च रक्तचाप को ठीक करने में भी कारगर है। गुरमीत जामुन, किकर के तुक्के, एलोविरा, पुदीना व मेथी, गन्ना, सेब, चुकंदर, गिलोय, हल्दी, लहसुन, कोड़तुंबा का सिरका तैयार करते हैं।

सेब को छोड़कर ज्यादातर चीजें वह खुद उगाते हैं। इसे जैविक पद्धति से बनाया जाता है। एसिड या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता। उपवैद्य का कोर्स कर चुके गुरमीत सिंह का कहना है कि अपने पुश्तैनी अनुभव व पढ़ाई के आधार पर वे लोगों को अगल-अलग बीमारियों के लिए सिरके का सेवन करने की सलाह देते हैं। इससे कई लोगों की बीमारियां ठीक हुई हैं। इसके लिए उन्हें पीएयू की ओर से वर्ष 2019 में विशेष अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

एक वर्ष में तैयार होता है

सिरका बनाने की विधि काफी लंबी है। गुरमीत के प्लांट में सैकड़ों टंकियां हैं। गन्ने के रस को अलग-अलग टंकी में एक वर्ष के लिए बंद कर दिया जाता है। निश्चित समय के बाद इन टंकियों से सिरका निकाला जाता है। गुरमीत सिंह का पूरा परिवार इस काम में जुटा है। इसके अलावा उन्होंने तीन अन्य लोगों को भी रोजगार दिया है। 

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