जेएनएन, लुधियाना। पंजाब में बहुत से किसान पराली प्रबंधन का विकल्प न होने का तर्क देते हुए उसे आग के हवाले कर देते हैं, जबकि इसी पंजाब में ऐसे किसान भी हैं, जिन्होंने पराली को अपनी खुशहाली का राज बना लिया है और कृषि क्षेत्र में अपने हुनर के दम पर ख्याति का आसमान छू रहे हैं। ये मिट्टी के लाल न सिर्फ मिट्टी की उम्र बढ़ा रहे हैं, बल्कि कमाई भी कर रहे हैं। अबोहर में तो पराली से बिजली उत्पादन किया जा रहा है। वहां प्रति वर्ष 6 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है। आज हम ऐसे ही कुछ प्रगतिशील किसानों से आपको रूबरू करवा रहे हैं।

26 सालों से नहीं जलाई पराली, खाद बनाकर लाई खुशहाली

लुधियाना के किसान जसबीर सिंह घुलाल उन किसानों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो पराली का प्रबंधन करने के बारे में सोचते हैं। साठ वर्षीय किसान जसबीर सिंह वर्ष 1992 चंडीगढ़ जीटी रोड के नजदीक स्थित गांव घुलाल में सात एकड़ जगह लेकर गेहूं, धान, बासमती, दलहन, तिलहन, हल्दी, फल व सब्जियों की खेती कर रहे हैं, लेकिन कभी भी पराली को आग के हवाले नहीं किया। धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को वह इस्तेमाल खाद के रूप में कर रहे हैं।

जसबीर कहते हैं कि प्रकृति ने पराली के रूप में किसानों को बहुत बड़ी नियामत दी है, लेकिन किसान जानकारी के अभाव में इसे जलाकर न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं, बल्कि जो धरती उन्हें दो वक्त की रोटी दे रही हैं, उसी की कोख को बंजर करने पर तुले हुए हैं। वह कहते हैं कि कटाई के बाद वह पराली को संभाल कर रखते हैं, जिसका इस्तेमाल हल्दी, प्याज, लहसुन, मिर्च, चुकंदर, शलगम, बैंगन, भिंडी आदि में करते हैं।

वे बताते हैं कि सब्जियां बीतने के बाद क्यारियों को पराली के कुतरे से ढक देते हैं। इससे पौधों को दो लाभ मिलते हैं। एक तो पराली गल कर इन पौधों को प्राकृतिक खाद उपलब्ध करवाती है, दूसरा जितने हिस्से को पराली से ढका जाता है, वहां खरपतवार (नदीन) नहीं उगते। इसके अलावा पराली निकालने के बाद कुछ इंच का जो हिस्सा जमीन पर बच जाता है, उसे चॉपर की मदद से खेत में ही मिला देते हैं। इससे जमीन को कई पोषक तत्व मिलते हैं।

जसबीर की ख्याति का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है ब्रिटेन के प्रिंस चाल्र्स ने न सिर्फ उनकी प्रशंसा की, बल्कि वर्ष 2010 में अपने भारत दौरे के दौरान जसबीर से मिले भी और उनके कृषि करने के ढंग को करीब से जाना। जसबीर सिंह को वर्ष 2011 में पीएयू में लगे किसान मेले के दौरान तत्कालीन कृषि मंत्री सुच्चा सिंह लंगाह ने उजागर सिंह धालीवाल पुरस्कार दिया।

18 साल से दूसरों को कर रहे प्रेरित

गांव पवात के किसान परमजीत सिंह ने पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए 18 साल पहले धान की पराली को आग के हवाले न करने का प्रण लिया और इस प्रण पर आज तक कायम हैं। परमजीत सिंह पराली को मशीनों की मदद से खेत में मिला देते हैं। खेतों में पराली के अवशेष मिलाने से उन्हें काफी फायदा मिला। उन्हें नाइट्रोजन खाद, फास्फोरस, जिंक व सल्फर सहित अन्य पोषक तत्वों के लिए खर्च नहीं करना पड़ता।

परमजीत को देखकर आसपास के करीब पचास किसान प्रेरित हुए और गांव की करीब 100 एकड़ खेतों में फसल के अवशेषों को आग के हवाले नहीं किया। परमजीत कहते हैं कि पराली प्रकृति का अनमोल उपहार है। वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में यदि धान की पराली का इस्तेमाल करें, तो कृषि पर आने वाले खर्च में कटौती होती है।

गांव को पराली जलाने से मुक्त बनाया

अमृतसर के अजनाला ब्लॉक में पड़ते गांव राजियां के किसान सतनाम सिंह वर्ष 2013 से बीस एकड़ में धान की खेती कर रहे हैं, लेकिन इन वर्षों में कभी भी उन्होंने धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को आग नहीं लगाई। वह पराली प्रबंधन की राह पर चलते हुए हैप्पी सीडर से गेहूं की बिजाई करते हैं। यहीं नहीं, दूसरे किसान भी उनकी तरह पराली न जलाकर खेती में इस्तेमाल करें, उसके लिए उन्होंने वर्ष 2017 में कृषि विज्ञान केंद्र व फार्म सलाहकार केंद्र अमृतसर की मदद से सतनाम कस्टम हायरिंग किसान सेंटर खोला। जहां उन्होंने हैप्पी सीडर, जीरो ड्रिल, उलटावे हल, रोटावेयर, मल्चर जैसी मशीनें रखी हुई हैं।

यह मशीनें वह दूसरे किसानों को पराली प्रबंधन के लिए किराए पर देते हैं। इसका परिणाम यह रहा कि 15 अगस्त वर्ष 2018 में गांव राजियां को आग रहित गांव घोषित करते हुए सम्मानित किया। सतनाम सिंह ने कहा कि पीएयू की सिफारिशों के अनुसार ही खेती करते हैं। इसे कि पर्यावरण का सरंक्षण कर सके। खेतों में कीटनाशकों व खाद का प्रयोग जरूरत के हिसाब से ही करते हैं। दूसरे किसानों को भी पराली को खेतों में न जलाकर कृषि में इस्तेमाल करना चाहिए।

पराली को बनाया पशुओं का आहार

अमृतसर के गांव भोईवाली के किसान गुरदेव सिंह की पहचान एक अग्रणी किसान के रूप में होती है। वर्ष 2007 में जब इन्होंने पिता से खेतीबाड़ी की कमान संभाली उस वक्त गेहूं व धान के फसली चक्र की वजह से पराली को आग लगाने का चलन बहुत था, लेकिन गुरदेव सिंह इस अंधी दौड़ की भीड़ में शामिल नहीं हुए। वह पर्यावरण संरक्षण के तहत धान की कटाई के बाद बची पराली को दुधारू पशुओं के आहार के लिए इस्तेमाल करते हैं। बाकी जो पराली वाला खेत रह जाता, उसमें वह हैप्पी सीडर से गेहूं की बिजाई करते हैं।

यहीं नहीं, गुरदेव ने दूसरे किसानों को भी पराली प्रबंधन के तहत धान की कटाई के बाद उन्हें हैप्पी सीडर व जीरो ड्रिल के साथ गेहूं की बिजाई करने के लिए प्रेरित किया। गुरदेव को इन प्रयासों के लिए कृषि विज्ञान केंद्र अमृतसर व जिला खेतीबाड़ी विभाग की ओर से सम्मानित भी किया गया। 15 अगस्त वर्ष 2018 में जिला प्रशासन ने इस गांव को आग रहित गांव घोषित करके सम्मानित किया।

मिट्टी में मिलाई पराली, तो खेत ने उगला सोना

माछीवाड़ा के गांव बरमा के किसान गुरदीप सिंह वर्ष 2003 से ही पंद्रह एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं। वह धान, गेहूं व गन्ना लगाते हैं। पंद्रह एकड़ में से दस एकड़ में धान की खेती करते हैं। पहले पहल तो वह धान की कटाई के बाद खेतों को आग लगा देते थे, लेकिन वर्ष 2010 में जब पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के किसान मेले में आकर पराली जलाने से पर्यावरण व भूमि को हो रहे नुकसान के बारे में जाना, तब से उन्होंने पराली न जलाने की ठानी।

गुरदीप कहते हैं कि शुरू में तो पराली को खेत में खपाने में बड़ी दिक्कत आई, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा, क्योंकि पराली को खेत में मिलाने के लिए बहुत मशीनों से बहुत ऑपरेशन करने पड़ते हैं। इस पर खर्च भी आता है। मेरे लिए खर्च से ज्यादा अहम मेरी मिट्टी की सुरक्षा थी। गुरदीप कहते हैं कि पराली को खेत में मिलाने से उन्हें यह फायदा हुआ है कि उनकी खादों की खपत पहले से कम हो गई है। फसल का झाड़ भी बढ़ा है। उन्हें देखते हुए गांव के दूसरे लोगों ने भी पराली को खेतों में मिलाना शुरू कर दिया।

एक टन पराली जलाने से नष्ट होने वाल तत्व

  • 5.5 किग्रा नाइट्रोजन
  • 2.3 किग्रा फास्फोरस
  • 25 किग्रा पोटेशियम
  • 1.2 किग्रा सल्फर

प्रति एकड़ नुकसान

  • 36 से 42 किलो यूरिया
  • 15 से 17 किलो डीएपी
  • 125 से 146 किलो पोटाश
  • 4 किलो सल्फर

ये भी हैं उपाय

तीन हजार ईंट के भट्ठों का ईंधन बन सकती है पराली

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार पराली को भट्ठों व गत्ता फैक्टरी में भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है। पंजाब में तीन हजार के करीब ईंट पकाने वाले भट्ठे हैं। इसमें बीस लाख टन कोयले का प्रयोग होता है। भट्ठों में पराली के अलावा तरह के और भी ईंधन इस्तेमाल में किए जाते हैं। पराली के छोटे-छोटे गोले बनाकर भट्ठों में कोयले के साथ प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके अलावा पराली का प्रयोग गत्ता बनाने के लिए भी होता है, जिससे मिठाई के डिब्बों से लेकर किताबों की जिल्दें तक बनाई जाती हैं।

ये बने मिसाल...

तीस गांवों के पांच हजार किसानों की पराली से बनाई जा रही बिजली

अबोहर से करीब 25 किलोमीटर दूर गांव गद्दाडोब में एक फैक्टरी करीब 30 गांवों के पांच हजार किसानों की पराली खरीदकर बिजली बनाने का काम कर रही है। इससे इस फैक्टरी के अंतर्गत आते 20 किलोमीटर के दायरे में कोई भी भी किसान पराली को आग नहीं लगाता। दि डेवलपमेंट इंजीनियर्स के सीईओ बीएस जांगड़ा बताते हैं कि 5 साल से उनकी फैक्टरी आसपास के किसानों की पराली खरीदकर बिजली बनाने का काम कर रही है।

वे हर साल 70 से 80 हजार टन पराली प्रतिवर्ष बिजली उत्पादन के लिए खरीदते हैं। इसकी एवज में किसानों को 127 रुपया प्रति क्विंटल के हिसाब से पैसा दिया जाता है। बैंक से 50 करोड़ का कर्ज लेकर 22 एकड़ में ये फैक्टरी लगाई गई थी, जबकि पराली को रखने के लिए 30 एकड़ जमीन अलग से लीज पर ली हुई है।

प्रति वर्ष 6 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन

इस फैक्टरी में पराली के माध्यम से सालाना 6 करोड़ यूनिट बिजली का उत्पादन किया जाता है। जिसे  बिजली बोर्ड को 6.30 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बेच दिया जाता है। इससे इलाके में बिजली की किल्लत काफी हद तक कम हो जाती है। ये बात अलग है कि गर्मियों के दिनों में अबोहर बिजली समस्या से जूझता रहा है। फैक्टरी से जुड़े अधिकारी सुबेग ङ्क्षसह कहते हैं कि अभी तो बिजली बेचकर जितना मुनाफा होता है उससे बैंक की किश्तें ही भरी जा रही हैं लेकिन इस बात का संतोष है कि हम किसानों की पराली खरीदकर व्यापार के साथ साथ पंजाब को पराली जलने की बड़ी समस्या से भी निजात दिलाने में लगे हैं।

तीन हजार लोगों को रोजगार

फैक्टरी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब तीन हजार लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है। कुल 130 कर्मचारी स्थायी तौर पर कार्यरत हैं। इसके अलावा 500 ट्रॉली मालिकों को रोजगार मिला हुआ है, जबकि बाकी खेतों से  पराली लाने का काम करते हैं। ये सब इस कार्य से अच्छी कमाई कर लेते हैं।

ऐसे बनती हैं पराली से बिजली

फैक्टरी ने पराली से बिजली बनाने को 45 मशीनें कॉन्ट्रेक्ट पर ली हुई हैं। करीब 30 हजार एकड़ से लाई गई पराली से बिजली उत्पादन करने के लिए वैज्ञानिक विधि ही अपनाई जाती है।सबसे पहले पराली की गांठे बनाई जाती हैं। फिर उन्हें भट्ठी में डाला जाता है। भट्ठी के साथ पानी की टंकी होने के कारण वो वाष्प में बदलती है जिससे बिजली उत्पादित होती है।

सरकार का बड़ा फायदा

इस फैक्टरी में पराली से बिजली उत्पादन राज्य सरकार के लिए भी बड़े फायदे की बात है। बिजली बोर्ड यहां से 6.50 रुपये प्रति यूनिट बिजली खरीदता है, जबकि वो खुद इसे 7.50 रुपये प्रति यूनिट बेचता है। कमर्शियल सेक्टर में तो ये रेट 8.50 तक होता है। फैक्टरी प्रबंधन को शिकवा है कि बावजूद इसके सरकार कोई मदद नहीं देती। बिजली पर उसे 6.50  की बजाय 7 रुपये प्रति यूनिट देना चाहिए।

फैक्टरी को मुफ्त में पराली दे रहे सहारण

मार्केट कमेटी के पूर्व चेयरमैन अजित सहारण सम्पन्न किसान हैं। इसलिए वे कई साल से इस फैक्टरी को मुफ्त में पराली देते हैं। कहते हैं कि अगर किसी कार्य से कुछ लोगों को रोजगार मिल हुआ है तो उनकी मदद करनी चाहिए, लेकिन हर किसान संपन्न नहीं होता इसलिए सरकार को इस तरफ ध्यान देना होगा।

ये हैं सुझाव

कलेक्शन टीमें बनाकर युवाओं को दें रोजगार

नाभा के राजीव शर्मा का कहना है कि पंजाब में बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार हैं। सरकार को पराली कलेक्शन के लिए हर गांव में एक टीम बनानी चाहिए, जो पराली को इकट्ठा कर कलेक्शन सेंटरों तक पहुंचाए। इससे युवाओं को रोजगार भी मिलेगा और किसानों को पराली से मुक्ति मिलेगी। ईंधन के रूप में इसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ट्रीट करके बनाया जाए चारा

लुधियाना के दाखां निवासी प्रताप सिंह का कहना है कि आमतौर पर किसान पराली का चारा दुधारू पशुओं को देने से कतराते हैं। इसके लिए पराली को कुछ रासायनिक तत्वों से ट्रीट करके लिए दुधारू पशुओं के योग्य बनाना चाहिए। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने इसका प्रयास किया है, लेकिन इसे प्रचारित किए जाने की जरूरत है।

(इनपुटः लुधियाना से आशा मेहता, अबोहर से प्रवीण कथूरिया व दीपक पोहिया)

Posted By: Kamlesh Bhatt