बठिंडा, [गुरप्रेम लहरी]। बठिंडा में हिंदू वोट बैंक की राजनीति में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है आजादी के बाद से कांग्रेस के साथ रहने वाला हिंदू वोट बैंक लोकसभा चुनाव में अकाली दल के पक्ष में भुगत गया लेकिन हैरानी की बात है कि उसके कुछ माह बाद ही वही वोट बैंक निकाय चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में भुगत किया। पिछले विधानसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी को भी दूसरे स्थान पर ला दिया था। अब इस बार क्योंकि भाजपा शिअद से अलग होकर पहली बार अपने दम पर चुनाव लड़ने जा रही है तो जाहिर सी बात है कि हिंदू वोट बैंक का झुकाव भाजपा की ओर भी होगा।

इससे समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। कुछ भी हो सभी राजनीतिक दलों की नज़र शहर के 62 फीसद हिंदू वोट बैंक के ऊपर है। इसको लेकर राजनीतिक पार्टियों में काफी खींचतान चल रही है। लोकसभा चुनाव में बठिंडा शहरी हल्के से हमेशा ही शिरोमणि अकाली दल के वोट कम निकलते रहे हैं लेकिन 2019 के चुनाव में बठिंडा शहरी हल्के से पहली बार शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार हरसिमरत कौर बादल को बठिंडा शहरी हल्के से ज्यादा वोट मिले। लोकसभा चुनाव में हिंदू वोट बैंक में हुई सेंधमारी के चलते कांग्रेस की चिंता बढ़ी हुई है।

अब भाजपा की पैनी नजर

हिंदू वोट बैंक पर वैसे तो कांग्रेस दोबारा से बठिंडा में सत्ता हासिल करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रही। चुनाव के अंतिम साल के अंतिम दो-चार महीनों में जहां पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए। लेकिन इस बार भाजपा भी मैदान में उतर रही है तो उनकी पैनी नजर हिंदू वोट बैंक पर ही है। प्रदेश कांग्रेस सरकार द्वारा हिंदू वोट बैंक के मद्देनजर काफी फैसले ऐसे किए गए जिन से हिंदू वोट बैंक पर अधिकार जमा सकें। लेकिन बठिंडा शहरी हलके के हालात कुछ अलग हैं क्योंकि जो समस्याएं अकाली दल के दौरान थी वह कांग्रेस के 5 साल के शासन में भी जस की तस रही।

वार्डों पर हिंदू वोट बैंक का प्रभाव

वैसे तो जनाब के समय हर एक वोट का बहुत महत्व होता है। लेकिन शहर के 28 वार्डों में हिंदू वोट बैंक होने के कारण सबकी नजरें इन वार्डों पर लगी हुई हैं। इन वार्डों में ज्यादा संख्या अग्रवाल समाज की है,इसी के चलते अकाली दल द्वारा भी दोबारा से अग्रवाल समाज से ही उम्मीदवार सरूप चंद सिंगला को चुनाव मैदान में उतारा गया है।

अब तक जीते सिर्फ तीन सिख उम्मीदवार

हिंदू सीट के तौर पर जानी जाती बठिंडा शहरी सीट से अब तक सिर्फ तीन ही सिख चेहरे जीत दर्ज करा पाए हैं। इसके कारण 1972 से लेकर 2007 तक 35 साल तक हिंदू ही विधायक बनते रहे। 2007 में कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली और सिख चेहरे के रूप में हरमंदर सिंह जस्सी को टिकट दे दी और उसने जीत भी दर्ज कराई। इसके बाद 2012 में फिर बठिंडा शहरी हल्का शिअद के हिंदू चेहरे सरूप चंद सिंगला के रूप में विजयी हुए। लेकिन 2017 में कांग्रेस ने फिर उसी रणनीति पर चलते हुए सिख चेहरे मनप्रीत बादल को टिकट दी और वह जीत दर्ज कराने में सफल रहे।

बठिंडा शहरी हल्के में हिंदू वोट बैंक होने के चलते अकाली दल ने हिंदू चेहरा सरूप चंद सिंगला को ही मैदान में उतार दिया है। शिअद को सिखों की पार्टी माना जाता है तो हिंदू वोट बैंक पर नज़र रखते हुए एक बार फिर शिअद ने हिंदू चेहरे पर ही दांव खेला है। जबकि आम आदमी पार्टी ने अपने रणनीति बदल दी है। उनका मानना है कि आम आदमी पार्टी को लोग हिंदुओं की पार्टी मानते हैं इसलिए उनके द्वारा बठिंडा से सिख चेहरा जगरूप सिंह गिल के रूप में चुनाव मैदान में उतारा गया हालांकि अभी तक कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं, लेकिन उनके द्वारा भी पुराना चेहरा वित्त मंत्री मनप्रीत बादल को ही चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी चल रही है, वहीं इस बार अपने दम पर चुनाव लड़ने जा रही भाजपा की ओर से भी इस चेहरे को ही चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है भाजपा अपने हिंदू पक्षीय छवि को बदल कर सिख चेहरे को मैदान में उतार सकती है।

मनप्रीत बादल ने सिख चेहराें काे हाशिए पर रखा

बठिंडा शहरी हल्के में हिंदू वोट बैंक के ज्यादा होने के कारण मनप्रीत बादल द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान सिख चेहरों को हाशिए पर ही रखा गया। जबकि हिंदू चेहरों को पद देकर नवाजा गया, उसमें बठिंडा नगर निगम की मेयर हिंदू चेहरे के रूप में रमन गोयल, नगर सुधार ट्रस्ट के चेयरमैन केके अग्रवाल, मार्केट कमेटी के चेयरमैन मोहनलाल झुंम्बा और जिला योजना बोर्ड के चेयरमैन एडवोकेट राजन गर्ग। उनके द्वारा हिंदुओं में भी सिर्फ अग्रवाल कम्युनिटी को ही महत्त्व दिया गया। सभी पदों पर उनको ही बिठाया गया।

Edited By: Vipin Kumar