जागरण संवाददाता, लुधियाना : पंजाब में धान की कटाई अक्तूबर नवंबर से शुरू हो जाएगी। ऐसे में किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए अलग अलग विभागों ने अभी से ही कसरत शुरू कर दी है। जिससे ज्यादा से ज्यादा किसानों को जागरूक किया जा सके। मंगलवार को इसी कड़ी के तहत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में पंजाब की अलग अलग यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधियों व वैज्ञानिकों के साथ पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के चेयरमैन प्रो.एसएस मरवाहा ने मीटिग की। इस मीटिग में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डॉ. बलदेव सिंह ढिल्लों, गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी से डा. सीएस भटटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से प्रो. परमवीर सिंह, गुरू अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल यूनिवर्सिटी से निधि शर्मा, गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी से निधि शर्मा शामिल हुई। इस मीटिग में पराली प्रबंधन को लेकर चर्चा की गई। मीटिग में पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के चेयरमैन डॉ. एसएस मरवाहा ने कहा कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए पिछले साल 1500 विद्यार्थियों का ग्रुप बनाया गया था। इन विद्याथियों ने घर घर जाकर किसानों को पराली न जलाने के लिए प्रेरित किया। इसका असर यह रहा कि पिछले साल पराली जलाने की घटनाओं में दस प्रतिशत की कमी आई। इस बार भी बोर्ड ने जागरूकता को अपना हथियार बनाया है। जिसके तहत इस साल बोर्ड सभी यूनिवर्सिटी और उससे संबंधित कॉलेजों के एनएसएस यूनिटों के तीस हजार से अधिक वलंटियरों का ग्रुप बनाने जा रहा है। यह वलंटियर पंजाब के किसानों को पराली प्रबंधन के बारे में बताएंगे। इस योजना को लेकर बोर्ड की ओर से काम शुरू कर दिया गया है। उन्हें उम्मीद है कि उनकी योजना कामयाब होगी और पराली जलाने की घटनाओं में और कमी आएगी।

उधर, दूसरी तरफ पीएयू के वाइस चांसलर डॉ. बलदेव सिंह ढिल्लों ने कहा कि पीएयू पराली के प्रबंधन को लेकर अलग-अलग तरह के प्रयास कर रहा है। वह पराली को खेतों में खपाने को लेकर आधुनिक मशीनरी बनाने पर जोर दे रही है, वहीं धान की ऐसी किस्में भी ईजाद कर रही है, जो अधिक उत्पादन के साथ पराली कम पैदा करें। यहीं नहीं, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से गेहूं की तूड़ी के साथ पराली को मिलाकर मशरूम उत्पादन की तकनीक भी विकसित की गई है। यूनिवर्सिटी की ओर से पराली की मदद से सर्दियों में बटन मशरूम व ढींगरी मशरूम के उत्पादन और गर्मियों में पराली मशरूम के उत्पादन की सिफारिश की गई है। सरकार भी इसे सहायक धंधे के तौर पर अपनाने के लिए जोर दे रही है क्योंकि इसका मंडीकरण काफी आसान है। मशरूम उत्पादन के बाद बची हुई पराली को खाद के तौर पर खेतों में इस्तेमाल में भी लाया जा सकता है। इसके अलावा पराली प्रबंधन के विकल्प के तौर पर बायोगैस प्लांट, पराली का आचार व कंपोस्ट का भी विकल्प है।

Posted By: Jagran

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