लुधियाना, [राजेश शर्मा]। केंद्र की मोदी सरकार ने डिजिटल इंडिया का खूब नारा दिया, लेकिन भारतीय जनता पार्टी खुद इस मामले में कमजोर है। 16 दिसंबर को भाजपा के घंटाघर स्थित जिला मुख्यालय में कुछ ऐसा ही देखने को मिला। दरअसल केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर को वर्चुअल कांफ्रेस करनी थी।

कुछ चुनिंदा पत्रकारों को बुलाया गया। समय 11.30 बजे तय था लेकिन कार्यालय में लगाई गई न एलसीडी काम कर रही थी और न ही आडियो सिस्टम ठीक था। आधे घंटे की मशक्कत के बाद एलसीडी शुरू हो पाई। जिला मुख्यालय में बड़े नेताओं की मौजूदगी में स्पीकर से आवाज सही ढंग से नहीं आ रही थी।

पांच मिनट बाद लाइट चली गई। मुश्किल से जनरेटर चला इसके बाद फिर नेट बंद हो गया। कभी आवाज, कभी नेट तो कभी माइक बंद हो जाता। तभी एक खबरनवीस ने चुटकी लेते हुए कहा कि कम से कम पार्टी मुख्यालय का डिजिटल सिस्टम तो दुरुस्त होना चाहिए।

चाय के भी लाले पड़ गए 

लुधियाना रेलवे स्टेशन पर करीब सात महीने से गतिविधियां बंद हैं। कोविड का प्रभाव हलका हुआ तो किसान आंदोलन ने रेल का पहिया जाम कर दिया। रेलवे अधिकारी और कर्मचारी खुश हैं कि ट्रेनों का आवागमन नहीं होने से माथापच्ची कम और नौकरी मजेदार हो गई। हालांकि मसला चाय और खाने-पीने का भी है। स्टेशन पर वैध और अवैध दर्जनों खाने-पीने के स्टाल के साथ-साथ भोजनालय भी दिन-रात खुला रहता था।

अधिकारी के एक आदेश पर उन्हें खुश करने के चक्कर में स्टाल वाले चाय, दूध, लस्सी और खाना लेकर भागे आते थे। अब किसानों के आंदोलन ने रेल का ऐसा पहिया जाम किया कि स्टेशन पर न तो कोई ट्रेन आ रही है और न ही यात्री। स्टाल बंद हैं और आखिर में भोजनालय भी बंद हो गया। जिन अधिकारियों को लजीज व्यंजन खाने की लत लग चुकी थी, उन्हेंं अब चाय के लाले भी पड़ गए हैं।

पुलिस की वगार में फंस गया

पुलिस वगार डालने का मौका कभी नहीं चूकती। ताजा किस्सा जयपुर से पकड़ी चार करोड़ की नशीली दवाइयों से जुड़ा है। दवाइयां जयपुर से डेहलों थाने में लाई गईं। अब पुलिस को इस बड़ी रिकवरी के लिए अपनी पीठ भी थपथपानी थी। दवाइयों को लेकर पुलिस लाइन पहुंचना था। इसके लिए कोई वाहन चाहिए था। पुलिस ने थाने के बाहर नाका लगाकर चेकिंग शुरू कर दी। इतने में एक टेंपो चालक काबू में आ गया। उसे दवाइयों को पुलिस लाइन पहुंचाने को कहा गया। उसे क्या पता था कि इसके पैसे नहीं मिलेंगे।

बकौल टेंपो चालक पुलिस ने दवाइयां लोड करवाईं और पुलिस लाइन पहुंचाईं। वहां प्रेस कांफ्रेंस हुई। इसे फिर डेहलों पहुंचाने का आदेश मिल गया। उसके कुल चार घंटे लग गए। अब बेचारे टेंपो चालक का दर्द छलक ही पड़ा। वह बोला कि एक तो भाड़ा नहीं मिला और दूसरा डीजल खर्च का बोझ भी उस पर पड़ा।

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अब मालिक और घोड़ा खुश हैं

इन दिनों सड़क के किनारे रेहड़े खड़े कर सब्जी बेचने वाले काफी दिख रहे हैं। ये रेहड़े वाले जीटी रोड से लिंक रोड तक हर जगह दिख जाएंगे। इतनी बड़ी संख्या में रेहड़ों को देखकर लोग भी चर्चा कर रहे हैं कि पहले उन्होंने शहर में इतने रेहड़े कभी नहीं देखे। यह जानने के लिए खबरनवीस की जिज्ञासा जगी। खास बात यह है कि इन रेहड़े वालों को सब्जी की बिक्री के बारे में ज्यादा समझ भी नहीं।

एक रेहड़े वाले से पूछा कि कब से सब्जी बेच रहे हो तो मजेदार जवाब मिला। बोला कि कोरोना से पहले लोहे की ढुलाई करते थे। लाकडाउन में काम बंद हुआ तो पेट के लिए सब्जी बेचनी शुरू कर दी। महसूस हुआ कि यह काम अधिक आसान है। एक तो भार कम हो गया और दूसरा एक ही जगह खड़े रहना होता है। इससे अब वह और घोड़ा दोनों खुश हैं।

 

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