जागरण संवाददाता, लुधियाना। कूड़ा बीनते बच्चों को देखकर ऐसा दिल पसीजा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी में अच्छी खासी नौकरी छोड़ एक डॉक्टर समाजसेवक बन गया। यह कहानी है 72 वर्षीय डॉक्टर सुरजीत सिंह की। उम्र का इनकी दिनचर्या में रत्तीभर भी असर नहीं। सुबह 6 से देर रात तक समाजसेवा को समर्पित इस शख्सियत ने विदेश की चाह को नकारते हुए देश के भावी कर्णधारों का भविष्य संवारने को प्राथमिक्ता दी। कचरा बीनने वाले पांच सौ से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाए हुए सुरजीत सिंह कहते हैं कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वह पांच सौ बच्चों के संरक्षक हैं। भाई बहनों सहित पूरा परिवार विदेश में सेटल है। ऑस्ट्रेलिया में रह रहे दोनों बेटों ने भी आखिरकार समझ लिया कि उनके पिता मातृभूमि को छोडऩे को कतई राजी नहीं।

1978 से तीन बच्चों के साथ शुरू हुआ था कारवां
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा संचालित अस्पताल में नौकरी कर रहे डॉक्टर सुरजीत सिंह बताते है कि घर जाते वक्त अक्सर तीन बच्चों को कचरा बीनते देखता। एक दिन रुककर उनसे पुछ ही लिया कि पढ़ना चाहते हो। जवाब हां में मिला तो शाम को उनके घर पहुंचकर माता पिता को मनाया। बमुश्किल माने पर मुझे लगा कि जीवन का मकसद अब मिला। फिर तो कारवां बढ़ता गया। वक्त बीता तो नौकरी छोड़ जीवन बच्चों को समर्पित कर दिया।

चार सौ गज का प्लॉट तो दिया ही घर की वसीयत भी स्कूल के नाम कर दी
नेश्नल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के तहत अब पांच सौ से ज्यादा बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है। बेटे खूब आर्थिक मदद कर रहे हैं। पचास के करीब स्टॉफ वाले इस स्कूल में बच्चों के लिए कंप्यूटर शिक्षा भी उपलब्ध करवाई गई है। निशुल्क पढ़ाई, किताबें तो दी ही जाती हैं। बच्चों को फिल्म दिखाने के अलावा एतिहासिक जगह की विजिट भी करवाई जाती है। मॉडल टाउन में चार सौ गज का प्लॉट था जिसमें स्कूल बनवा दिया। खुद के घर की वसीयत भी स्कूल के नाम कर दी। स्कूल पांचवी तक ही है। दूसरे स्कूलों में दाखिल करवाकर प्लस टू तक की पढ़ाई का खर्च भी उठाया जा रहा है। इन दिनों डेढ़ सौ के करीब छात्र पांचवी से आगे की पढ़ाई के लिए डॉक्टर सुरजीत की सेवाएं ले रहे हैं।

By Krishan Kumar