शहर की सड़कों पर अक्सर जरूरतमंदों को जूते चप्पल बांटता युवाओं का समूह नजर आ जाता है। इनका यह काम यहीं तक सीमित नहीं है। हर रोज तीन सौ जरूरतमंदों को खाना खिलाने के अलावा स्कूल कॉलेजों में छात्रों के पुराने कपड़े इकट्ठा करके जरूरतमंदों तक पहुंचाना इनकी दिनचर्या में शामिल है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के इलाज का खर्च उठाना इनकी प्राथमिकता में शामिल है। युवाओं के इस समूह का परिचय समाजसेवी संस्था पॉवर ऑफ हयूमेनिटी के तौर पर दिया जाता है। युवाओं के इस समूह का कोई सदस्य स्ट़ॉक ब्रोकर है, कोई इंडस्ट्रियलस्ट तो कोई बिल्डर और कोई टीचर।

संस्था के गठन का किस्सा भी रोचक है। शहर के नामी जिम में एक्सरसाइज के दौरान इन युवाओं की जान पहचान हुई। कभी कभार कैफे व रेस्त्रां में भी महफिल जमने लगी। एक दिन सभी ने निर्णय लिया कि समाजसेवा के लिए भी कुछ करना चाहिए। सूत्रधार बने 27 वर्षीय स्टॉक ब्रोकर दिलजीत गर्ग। शुरुआत में राजेश गोयल, सुखदीप खंगूडा, चाहत खन्ना, तनवी ढंड ने फैसला किया कि जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाया जाए। अपने-अपने हिस्से की रकम इकट्ठा करके जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाया जाने लगा। दिलजीत गर्ग बताते हैं कि वे केवल अपने पर ही रुपये खर्च करते थे। चाहे वह जिम हो, शॉपिंग हो या फिर पार्टी। लेकिन पहले दिन जब जरूरतमंदों को खाना पहुंचाया तो हमें एहसास हुआ कि समाज का एक बड़ा हिस्सा खाने का भी मोहताज है। उन तक खाना पहुंचाया, जिस मन से उन्होंने इसे ग्रहण किया और आशीर्वाद मिला तो अजीब सा सुकून मिला।

एक साथी ने सलाह दी कि शहर में कई लोग ऐसे भी हैं जिनके पांव में या तो चप्पल-जूते नहीं हैं और अगर हैं भी तो पहनने के लायक नहीं हैं। इसके बाद उन्होंने जूते-चप्पल खरीदकर अलग-अलग इलाकों की सड़कों पर खड़े होना शुरू कर दिया। जो भी व्यक्ति टूटी हुई या फिर घिसी हुई चप्पल या जूते पहने दिखता उन्हें वहीं पर नए चप्पल या जूते दे दिए जाते हैं।

संस्था के एक साथी को इस बात की जानकारी मिली कि एक जरूरतमंद परिवार के सदस्य का इलाज अस्पताल ने पुराना बिल न चुकाने की वजह से बंद कर दिया। अस्पताल प्रबंधन ने परिवार को यह कह दिया कि मरीज को घर ले जाइए। जिसके बाद संस्था के सदस्य अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों को कह दिया कि आप इलाज जारी रखिए बिल का भुगतान वे करेंगे। तब से जरूरतमंदों के इलाज की सेवा भी शुरू कर दी गई।

स्कूल कॉलेज व अन्य संस्थाओं के सहयोग से क्लॉथ बैंक की शुरुआत भी संस्था ने की। छात्रों को पुराने अच्छी हालत के कपड़े दान देने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने की व्यवस्था संस्था करती है। इसके लिए शहर के नामी स्कूलों में बैग रख दिए गए हैं जिसमें छात्र कपड़े रख जाते है। हर सप्ताह संस्था के सदस्य इन बैग को एक जगह इकट्ठा कर लेते हैं। इसके बाद इन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाता है।

By Krishan Kumar