लुधियाना, जेएनएन।

तकनीकी पहलुओं को जांचे और परखे बिना शहर की विकास की योजनाओं को बना दिया जाता है। इतना ही नहीं, उसे प्लान के अनुसार लागू तक नहीं किया जाता। आनन फानन में योजना पूरी कर इतिश्री कर दी जाती है। इसी कारण शहर का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। शहर को विकसित किया जाना है तो मास्टर प्लान सही तरीके से बनाना और उसे ईमानदारी से पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए, तभी शहर स्मार्ट बन सकेगा।

उक्त बातें दैनिक जागरण के ‘माय सिटी, माय प्राइड’ की राउंड टेबल कांफ्रेंस (आरटीसी) में पहुंचे विशेषज्ञों ने कहीं। आरटीसी में लुधियाना स्मार्ट सिटी के डायरेक्टर संजय गोयल, संभव फाउंडेशन के संचालक शोभन सोई, अपैरल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव अतुल सग्गड़, डॉ. कोटनिस अस्पताल के प्रबंधक डॉ. इंद्रजीत सिंह धींगड़ा, शिक्षाविद राजिंदर सिंह, काउंसिल ऑफ इंजीनियर्स के प्रेसिडेंट कपिल अरोड़ा, एडवोकेट हरिओम जिंदल और इंजीनियर मोहित जैन उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि सरकार जहां योजनाओं को लागू करने के समय उस पर पैनी नजर रखे, वहीं इन परियोजनाओं में जनता को भी शामिल किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों के मुताबिक कोई भी योजना अगले 50 वर्षों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, ताकि उसका पूरा लाभ मिल सके। इसके अलावा किसी योजना के संबंध में जब प्रशासन कोई नियम कानून बनाता है तो उसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। तभी शहर विकास की ओर अग्रसर होगा। सरकार के पास फोरम के जरिए जब मुद्दे पहुंचे तो उसे लागू करवाने में विशेष बातों का ध्यान जरूर रखे।

 शहर का मास्टर प्लान पचास साल का बने

लुधियाना स्मार्ट सिटी लिमिटेड के डायरेक्टर और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कीटेक्चर्स पंजाब चैप्टर के चेयरमैन संजय गोयल ने कहा कि शहर का विकास गैर योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। नतीजतन समस्याएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। हालत यह है कि मौजूदा बस स्टैंड 1990 में एक्सपायर हो गया था और आज तक उसकी जगह पर चार नए बस स्टैंड नहीं बन पाए हैं। रोजाना पांच हजार बसें शहर के बस स्टैंड पर आती एवं जाती हैं। इनकी वजह से शहर में अक्सर जाम रहता है और प्रदूषण का कारण भी बन रहा है। अब जरूरी है कि शहर की सभी दिशाओं में बस स्टैंड बनाए जाएं। इसके लिए तेजी से काम होना चाहिए। साथ ही शहर में बुड्ढे नाले में बड़ा सीवरेज डाल कर उसके उपर सड़क बना कर शहर में ट्रैफिक की समस्या को भी खत्म किया जा सकता है। साथ ही बुड्ढ़े नाले के प्रभाव से परेशान लाखों लोगों को भी निजात मिलेगी। आज के दौर में बुड्ढे नाले का कोई औचित्य नहीं है।

शहर में सुधार के लिए बेहतर दृष्टिकोण की जरुरत

संभव फाउंडेशन के संचालक शोभन सोई ने कहा कि शहर में सुधार के लिए बेहतर दृष्टिकोण बहुत जरूरी है। फिलहाल न विजन है और न ही काम करने की इच्छा। यदि काम करने की ठान ली जाए तो चुनाव लडऩे की जरूरत नहीं। शहर की कई एनजीओ भी विकास और समाज कल्याण में लगी हैं। शहर में विकास के लिए ठोस प्रोजेक्ट नहीं हैं। आज भी कई समस्याएं दशकों से शहर को परेशान कर रही हैं। शहर को सुंदर बनाने के लिए ग्रेफिटी बनी, लेकिन निगम के ढुलमुल रवैये के कारण लोग पीछे हट गए।

ग्रेफिटी पर पोस्टर लगाने पर दस हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान था, आज तक केवल दो ही चालान काटे गए। शहर को सुंदर बनाने के लिए लोग तैयार हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी को भी भ्रष्टाचार के तंत्र से बाहर निकल कर पूरी ईमानदारी के साथ हाथ बढ़ाने होंगे। शहर में ट्रैफिक की समस्या भी कम होने का नाम नहीं ले रही है। फिरोजपुर रोड पर बन रहे एलिवेटेड रोड की फिलहाल जरूरत नहीं थी, लेकिन इस प्रोजेक्ट ने ट्रैफिक सिस्टम को हिला कर रख दिया है और आम आदमी परेशान हो रहा है।

नए स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलना समय की जरुरत

अपैरल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव अतुल सग्गड़ ने कहा कि उद्योगों में कुशल मैन पावर की भारी कमी है। इसका असर औद्योगिक उत्पादन, क्वालिटी इत्यादि पर पड़ रहा है। बदलते परिवेश में उद्यमी घरेलू के साथ साथ विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर रहे हैं। इसके लिए स्किल मैनपावर का होना अनिवार्य है। साफ है कि उद्योगों की जरूरतों को ध्यान में रख कर ही नए स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलने जरुरी हैं, ताकि वहां युवाओं को ट्रेनिंग देकर उद्योगों की इस कमी को पूरा किया जा सके।

इसके साथ ही शहर के मौजूदा फोकल प्वाइंटों की दशा को सुधारना अनिवार्य है। यहां से सबसे अधिक राजस्व सरकार को आता है, बावजूद इसके सबसे ज्यादा बुरी हालत इसी क्षेत्र की है। योजनाबद्ध तरीके से फोकल प्वाइंट एवं औद्योगिक क्षेत्रों की दशा और दिशा को सुधारना होगा। साथ ही औद्योगिकरण को गति देने के लिए नए फोकल प्वाइंट खोलने की जरूरत है। आर्थिक राजधानी में वर्ष 1991-92 के बाद से कोई नया फोकल प्वाइंट नहीं आया है। ऐसा करके नए उद्योगों को स्थापित होने में आसानी होगी।

सरकारी अस्पताल में निजी भागीदारी जरूरी

कोटनिस अस्पताल के प्रबंधक डॉ. इंद्रजीत सिंह धींगड़ा के अनुसार सरकारी अस्पतालों में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बेहद जरूरी है। इससे सरकारी अस्पतालों के सिस्टम में अनुशासन बढ़ेगा और सेहत सुविधाएं भी अच्छी होंगी। भले यह काम सिर्फ सुपरविजन के लिए ही क्यों न हो। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों, नर्सिंग स्टाफ की भर्ती भी जरूरी है, इसके लिए इनके बेसिक वेतन में बढ़ोतरी करनी जरूरी होगी। जो वेतन सरकार डाक्टर को दे रही है वह कम है और प्राइवेट सेक्टर में पैसा ज्यादा दिया जाता है। इसके अलावा प्राइवेट सेक्टर की तर्ज पर ओपीडी दो तरह की होनी चाहिए, एक मुफ्त और दूसरी श्रेणी में कुछ शुल्क वसूले जाने चाहिए । इससे यहां आय होगी वहीं अस्पतालों में सुविधाएं भी बढ़ेंगीं। आम लोगों का सरकारी अस्पतालों पर से विश्वास भी उठने लगा है, यही कारण है कि अब हर व्यक्ति भले से कर्ज लेकर इलाज करवाना पड़े लेकिन वह प्राइवेट सेक्टर की ओर भाग रहा है।

स्किल डेवलपमेंट का हो अलग सबजेक्ट

शिक्षाविद राजिंदर सिंह ने कहा कि पूरा सिस्टम सुधारने के लिए स्कूलों में स्किल डवेलेपमेंट का सब्जेक्ट होना बेहद जरूरी है ताकि युवा प्रशिक्षण के मामले में महारत हासिल कर सके। इसका फायदा यह होगा कि हमें अलग अलग फील्ड में माहिर लोग मिल जाएंगे। इसके अलावा सबसे जरूरी पूरा सिस्टम बनाने की जरूरत है। यह सुधार सेहत, पुलिस और दूसरे सभी विभागों में होने जरूरी हैं। शिक्षा का स्तर सही करने के लिए पीएसईबी और सीबीएसई की पॉलिसी को सही ढंग से लागू करना भी बेहद जरूरी है।

जिससे बेहद तजुर्बेकार अध्यापक ही स्कूलों में पढ़ाएंगे और इससे हमें आने वाले समय में होनहार कर्मी मिल सकेंगे। अब हो क्या रहा है कि बेहद कम वेतन पर रखे अध्यापक सुरक्षा प्रणाली को तहस नहस कर रहे हैं। शिक्षा विभाग को इस तरफ विशेष ध्यान देना होगा। इसके अलावा भले जितनी मर्जी कालेज और स्कूलों की बिल्डिंग खड़ी हों जाएं, वह सुधार की तरफ काम नहीं हो पाएगा।

आवारा पशुओं के लिए बने ठोस योजना

काउंसिल ऑफ इंजीनियर्स के प्रधान कपिल कुमार अरोड़ा का कहना है कि आवारा पशुओं की वजह से रोजना एक्सीडेंट हो रहे हैं और लोगों की जान जा रही है। नगर निगम इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। आवारा पशुओं की संभाल के लिए बकायदा पॉलिसी बनाने की जरूरत है। शहर की सड़कें हों या मेन हाईवे सब जगह आवारा पशुओं की भरमार है। पंजाब सरकार अब तो लोगों से काऊ सेस भी ले रही है। ऐसे में सरकार को अपने स्तर पर नई गौशालाएं बनानी चाहिए ताकि आवारा पशुओं की प्रॉपर मॉनिटरिंग हो। नगर निगम भी जिन गौशालाओं को पशुओं की संभाल के लिए पैसे दे रही है, उनकी नियमित चेकिंग हो। इसके अलावा शहर का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए ठोस प्लानिंग हो। ताकि प्रोजेक्ट के हर पहलू पर पहले से चर्चा हो सके।

सरकारी संस्थाओं को लोगों में बढ़ाना होगा विश्वास

एडवोकेट हरिओम जिंदल का कहना है कि सरकारी सिस्टम से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। लोग न तो सरकारी स्कूल में पढऩा चाहते हैं और न ही सरकारी अस्पताल में इलाज करवाना चाहते हैं। जबकि पीजीआई जाकर लोगों में इलाज करवाने की होड़ रहती है। क्योंकि पीजीआई चंडीगढ़ लोगों में अपना विश्वास बना चुका है। उन्होंने कहा कि अगर सिविल अस्पताल में भी अच्छा स्टाफ और सुविधाएं दी जाएं तो लोग वहां भी इलाज ले सकते हैं। लेकिन सुविधाएं न होने की वजह से लोग वहां जाने से कतराते हैं। सरकारी सिस्टम में इंफ्रास्ट्रक्चर तो बेहतर हो रहा है लेकिन उसे चलाने वाले अफसर उसे ठीक तरह से चला नहीं रहे हैं।

अफसरों की जिम्मेदारी तय हो: इंजीनियर मोहित जैन

इंजीनियर मोहित जैन का कहना है कि शहर के विकास के लिए जो योजना आज बनती है उसे अगले 30 सालों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए। उसके आधार पर ही नीतियां और नियम बनाए जाने चाहिए। उनका कहना है कि फिर उस प्लानिंग को उन्हीं नियमों के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। जो भी शहरी और अफसर नियमों को तोड़ता है उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। मोहित जैन का कहना है कि अफसरों की जिम्मेदारी तय हो कि अगर प्रोजेक्ट में किसी तरह की गड़बड़ी होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उन्हीं अफसरों की होगी। उन्होंने कहा कि हर प्रोजेक्ट में धांधलियां हो रही हैं उन्हें रोकने के लिए नगर निगम के पास एक्सपर्ट की टीम नहीं है। निगम के टेक्निकल एक्सपर्ट हर प्रोजेक्ट में शामिल होते हैं ऐसे में वह सभी उसकी खामियों को छुपाते हैं। जैसा गिल पुल की स्लैब गिरने के मामले में हुआ।

 

 

By Krishan Kumar