जागरण संवाददाता, लुधियाना 

बात 2009 की है, दो दोस्त सड़क पर अपनी कार में बैठकर जा रहे थे, पीएयू के पास एक व्यक्ति को तड़पते देखा, मगर उसे कोई उठा नहीं रहा था। वे वहां से गुजर गए मगर घटना उनके मन में घर कर गई थी। इनमें से एक शहर के समाज सेवी रविंदर अरोड़ा थे। कुछ ही दिनों बाद वह अपने दो दोस्तों जिनमें डॉ. विकास जिंदल शामिल थे, उनके साथ श्रीनगर घूमने गए मगर मन अशांत था। श्रीनगर में डल झील के किनारे तीनों ने विचार करना शुरू किया कि आखिर उन्‍होंने उस दिन उस शख्‍स को को क्यों नहीं उठाया। कई सवाल उनके मन में कौंध रहे थे, एक सवाल यह भी था कि ये डर तो नहीं हैं कि अगर कोई उसे उठाकर अस्पताल ले जाता तो पुलिस उससे पूछताछ शुरू कर देती।

इसके बाद तीनों ने ठान लिया कि अब वे सड़क पर घायलों की मदद करेंगे और किसी को ऐसे मरने नहीं देंगे। साल 2009 में पहली एम्‍बुलेंस खरीदी और घायलों को उठाने का काम शुरू हुआ। संस्था का नाम भी संवेदना रखा गया, क्योंकि घायल को देखकर उनके मन में संवेदना उठी थी। देखते ही देखते इससे कई उद्यमी जुड़े कि अब यह संस्था शहर की बड़ी समाज सेवी संस्थाओं में शामिल है। संस्था का कार्यालय सिविल अस्पताल में है और इनके पास 7 एम्‍बुलेंस , 3 शव वाहन, तीन डी-फ्रिजर हैं। 2009 से अब तक 22,166 मरीजों को घटनास्थल से अस्पताल और घर छोड़ा जा चुका हैं। 9,401 शवों को शव वाहन से श्‍मशानघाट या अस्पताल से घर तक पहुंचाया गया है।

सफाई के लिए दी हैं मशीनें भी
संवेदना के मैनेजर जजप्रीत सिंह बताते हैं कि संस्था की ओर से होशियारपुर के 16 सरकारी स्कूलों में बच्चों के शौचालय बनाने के अलावा श्री चिंतापूर्णी दरबार में सफाई के लिए मशीने दी गई हैं। यही नहीं संस्था की ओर से जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में सहयोग के अलावा लोगों के इलाज में सहायता भी की जाती है। उन्‍होंनें बताया कि सिविल अस्पताल में संसाधनों की कमी के कारण यहां पर मरीजों की देखरेख, कंबल देने, बेडशीट देने, मृत शख्‍स को कपड़ा भी देते हैं।

अस्पताल में जरूरत की कई चीजें जैसे ऑपरेशन थिएटर में साजो सामान, एसी वगैरह भी संस्था लेकर देती है। पूरा खर्च बड़ी कंपनियों की ओर से सीएसआर फंड में से किया जाता है। हाल ही में एवन साइकिल के मालिक ओंकार सिंह पाहवा के सहयोग से करीबन 86 लाख रुपए खर्च कर एसी मोर्चरी बनाई गई है। यहां पर करीब 30 डेड बॉडी रखी जा सकती हैं। शहर के बड़े व्‍यापारी संस्था के साथ जुड़े हैं। वह उनके हर काम में सहयोग दे रहे हैं।

 

By Krishan Kumar