लुधियाना तेजी से तरक्की कर रहा है, लेकिन तरक्की के साथ साथ स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ी हैं, जिसकी कई वजह है। इनमें प्रमुख कारण शहर के लोगों का गलत खानपान, प्रदूषण और तनाव है। हृदय रोगी काफी अधिक बढ़ रहे हैं। शहर की स्थानीय लोगों में लगातार बढ़ती समस्याओं से समाधान के लिए डॉ. हरिंदर सिंह बेदी ने समय-समय पर नए प्रयोग करके नई तकनीकें इजाद की है जो कि शहर के बीमार लोगों के लिए वरदान साबित हो रही हैं।

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उनकी पहचान एक ऐसे हृदय रोग विशेषज्ञ की है जिन्हें रिकार्ड बनाने और नए नए एक्सपेरिमेंटस के लिए जाना जाता है। फिर चाहे वह वर्ष 1999 में पहली बार दिल की धड़कन को रोके बिना मल्टीवेसल बीटिंग हार्ट सर्जरी करके वर्ष 2000 में लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में अपना नाम दर्ज करवाना हो या फिर वर्ष 2006 में चंडीगढ़ की स्टूडेंट की हार्ट सर्जरी के दौरान पहली बार कैथ लैब को ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर मिनिमल इनवेसिव तकनीक का इस्तेमाल से दोबारा लिम्मा बुक ऑफ रिकॉर्ड बनाना हो। मेडिकल दुनिया की जटिलताओं को सुलझाना 54 वर्षीय डॉ. हरिंदर सिंह बेदी की पहचान बन गया है।

डॉ. बेदी ने ही फेफड़ों की सर्जरी के बाद होने वाली जानलेवा जटिलताओं से मरीज को बचाने के लिए लीमा बेटे्रस तकनीक भी इस्तेमाल की। मेडिकल प्रोफेशन में उनके अलग अंदाज और हेल्थकेयर में नई खोज की कैटेगिरी में ब्रिटिश मेडिकल जनरल अवॉर्ड के लिए उन्हें नॉमिनेट किया जा चुका है। डॉ. बेदी नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर 55 रिसर्च पेपर लिख चुके हैं।

 

उन्होंने कहा कि बीस साल की उम्र में लोगों को हार्ट अटैक सहित अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिस हिसाब से शहर में रोगी बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से स्वास्थ्य सुविधाओं को सस्ते में उपलब्ध करवाना वर्तमान में एक बड़ी चुनौती है। इस चुनौती से निपटने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।

बेदी कहते हैं कि उनके पास हार्ट के ऐसे केस आते हैं, जिनमें मरीज की उम्र बीस से तीस साल भी होती है। इसका प्रमुख कारण शहर के लोगों का गलत खानपान, प्रदूषण, हुक्का जैसे नशे और तनाव है। इसकी वजह से हृदय रोगी काफी अधिक बढ़ रहे हैं।

उनका कहना है कि छोटी उम्र में लोगों को हार्ट अटैक सहित अन्य तरह की परेशानियां बढ़ रही हैं, जिस हिसाब से शहर में रोगी बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाना बड़ी चुनौती है। सरकार चाह कर भी इसमें पूरा योगदान नहीं कर पाती। इससे निपटने के लिए शहर के नागरिकों को भी आगे आकर प्रयास करने होंगे।

इसके अलावा सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी को दूर करना, जांच सुविधाओं को बढ़ाना और पर्याप्त दवाओं का इंतजाम हो तो इलाज सभी की पहुंच में होगा। दूसरा निजी अस्पतालों को भी सरकार अपने स्तर पर कुछ रियायतें दे, तो वहां भी महंगे इलाज से मुक्ति मिलेगी।

स्टैंडर्ड ऊंचा हुआ, लेकिन अभी भी गुंजाइश
डॉ. बेदी कहते हैं कि भले ही शहर में बड़े निजी अस्पतालों की चेन आई है। स्वास्थ सुविधाओं का स्टैंडर्ड ऊंचा हुआ है। कुछ अस्पतालों में अच्छे और आधुनिक उपकरण लाए गए हैं, लेकिन अभी भी हम उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं में काफी पीछे हैं। यदि आप शहर के सभी अस्पतालों का आंकलन कर उपलब्ध चिकित्सा सुविधा की रेटिंग करने के लिए कहेंगे तो दस में चार अंक ही दिए जा सकते हैं, क्योंकि विदेशों की तुलना में अभी हम काफी पीछे हैं।

मूलभूत सुविधाओं से अभी दूर हैं शहर के कई अस्पताल
बेदी के अनुसार जब हम विदेशों या अपने देश के ही बड़े अस्पतालों में उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं और मेडिसन की तुलना शहर के अस्पतालों से करें तो वर्तमान में हम काफी पीछे हैं। कई अस्पतालों में अभी भी सभी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाती। इनमें सुधार कर मरीज को बेहतर सुविधाएं प्रदान की जा सकती भी है।

उन्होंने कहा कि कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो कई अस्पतालों में मेडिकल नॉर्म्स के अनुसार सौ फीसदी सफाई नहीं होती। इस क्षेत्र में हमें ज्यादा ध्यान देना होगा। सफाई में भी ओवर ऑल दस में से चार अंक ही दिए जा सकते हैं।

अस्पतालों में आबादी के अनुपात में डॉक्टर और स्टाफ बढ़ाने होंगे
भले ही शहर में बड़ी संख्या में अस्पताल बन गए हैं, लेकिन डॉ. बेदी का कहना है कि आज भी आबादी की तुलना में डॉक्टर्स और स्टाफ नहीं हैं। इस क्षेत्र में हमें विशेष ध्यान देना होगा। डॉक्टरों और स्टाफ पर अतिरिक्त बोझ देखने को मिलता है। डॉक्टर्स और स्टाफ के मामले में भी दस में से चार अंक ही दिए जा सकते हैं।

डॉ. बेदी कहते हैं कि अस्पतालों में डॉक्टर्स और स्टाफ का व्यवहार अच्छा है, लेकिन इसे और उच्च स्तर पर लिया जा सकता है। व्यवहार के मामले में दस में से छह अंक दिए जा सकते हैं।

आपात स्थिति में रिस्पांस के लिए सुधार की जरूरत

डॉ. बेदी कहते हैं कि लुधियाना जैसे औद्योगिक शहर में आपातकालीन परिस्थितियों में इमरजेंसी केसों में रिस्पांस के टाइम में सुधार की जरूरत है। क्योंकि कहीं स्टाफ की कमी तो कहीं आधारभूत सुविधाओं की कमी के बीच तत्काल सौ फीसद रिस्पांस की उम्मीद करना बेमानी होगी। इस मामले में दस में से पांच अंक दिए जा सकते हैं। हेल्थ केयर सुविधाओं की अफोर्डेबिलिटी उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। इसमें भी दस में से पांच अंक दिए जा सकते हैं।

By Krishan Kumar