जेएनएन, लुधियाना : मॉडल टाउन एक्सटेंशन स्थित भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम मंदिर में साप्ताहिक सत्संग के दौरान महामंडलेश्वर ब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी द्वारा भेजे संदेश को पढ़कर सुनाया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि गुरु के समक्ष शिष्य को कभी भी यह शब्द नहीं बोलना चाहिए कि मैंने यह काम किया है। गुरु के समक्ष अपना प्रभुत्व दिखाना और व्याख्यान देना पूरी तरह वर्जित है। गुरु के सान्निध्य में केवल दास बनकर रहना चाहिए। गुरु की बात नहीं काटनी चाहिए तभी गुरु की कृपा होती है।

भगवान शिव ने मां पार्वती को बताया है कि जो शिष्य गुरु के समक्ष तू कहकर बोलता है अथवा गुरु के समक्ष सिर उठाकर बोलता है वह व्यक्ति निर्जन मरुभूमि में ब्रह्मराक्षस होकर भटकता है। जो साधारण होगा, गुरु उसे ही असाधारण बनाएगा। जो असाधारणता का प्रदर्शन करता है उसे न तो कभी गुरु की कृपा प्राप्त होती है और न ही सुख-समृद्धि, यश-कीर्ति, आरोग्यता, राज और मुक्ति प्राप्त होती है। यह पावन और अतिदुर्लभ पाठ शास्त्रोक्त है और सरल है। इसके बारे में स्वयं भगवान ब्रह्मा ने कहा है कि यह अक्षय पाठ है। इसे इंद्रादि देवताओं ने भगवान नारायण के मुख से सुना था और देवराज इंद्र को समस्त सुख-वैभव और इंद्रासन प्राप्त हुआ था। यह साक्षात अलौकिक व अदभुत विज्ञान है इसका पाठ करने से जानने, समझने, पढ़ने व धारण करने से त्रिलोक पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है और समस्त कष्टों का निवारण होता है। यह सर्वपावन पाठ पुण्यों का दाता है और पापों का नाश करने वाला है तथा समस्त प्रकार के दुखों व रोगों का निवारण करने वाला है। इसके जपमात्र से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान शिव ने मां भगवती की जिज्ञासा का निवारण करते हुए कहा है कि सतनाम या सहस्रनाम यदि सौगुणा लाभ देता है तो स्तोत्र दस हजार गुणा, ध्यान एक लाख गुणा, मंत्र एक करोड़ गुणा तथा इसका पाठ एक अरब गुणा लाभ प्रदान करता है।

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