संस, लुधियाना : एसएस जैन स्थानक जनता नगर में विराजित श्री जितेंद्र मुनि जी म. के सानिध्य में मधुर वक्ता श्री रचित मुनि ने कहा कि दान हमेशा अच्छी वस्तु का होता है, जबकि त्याग अच्छी और बुरी दोनों ही चीजों का होता है। क्योंकि दान, परोपकार के लिए किया जाता है और त्याग आत्म कल्याण के लिए। देखिए देने वाला दात्री सोचता है कि कितना दिया, जबकि त्यागी सोचता है कि मैंने इतना क्यों बचा लिया और दान हमेशा दो के बीच हुआ करता है। इसलिए त्याग को दान से बड़ा कहा गया है।

उन्होंने कहा कि कुछ वस्तुएं ऐसी है जिनका केवल दान ही किया जा सकता है। त्याग नहीं -जैसे ज्ञानदान अभय दान करुणा, दया दान इन का दान ही किया जा सकता है। त्याग नहीं किया जा सकता । लेकिन कुछ पदार्थ ऐसे हैं जिनका दान और त्याग दोनों ही किया जा सकता है - जैसे धन है, रुपया है, पैसा है, जमीन जायदाद है, मकान है, दुकान है आदि का दान भी किया जा सकता है। इसी तरह क्रोध, मान, माया, राग, द्वेष का त्याग किया जा सकता है। इसलिए कहते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ा नहीं जा सकता, लेकिन छोड़ा तो जा सकता है। इसलिए त्याग को सर्वोपरि बतलाया है, त्याग से सब कुछ मिलेगा क्योंकि त्याग जीवन का परम सौंदर्य है, और त्याग भी अहोभाव से करना चाहिए अहम भाव से नहीं।

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