संस, लुधियाना : इकबाल गंज रोड तेरापंथ भवन में पर्यूषण महापर्व में सोमवार को वाणी संयम दिवस आचार्य महाश्रमण की विदुषी सुशिष्या समणी डॉ. निर्वाण प्रज्ञा के सान्निध्य में मनाया गया। समणी मध्यस्थ प्रज्ञा ने वाणी संयम दिवस पर अपने विचार रखते कहा कि यह दुनिया संबंधों की है जिसमें भाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने आंतरिक विचारों को व्यक्त करता है, किंतु अनावश्यक नहीं बोलना, बिना पूछे नही बोलना चाहिए। जहा वाणी का सम्यक प्रयोग, वाणी संयम है वही मौन ही जो संयम से अनुप्राणित हो।

शिष्ट समाज की पहचान है वाणी संयम। यद्यपि संपर्क का शक्ति शाली माध्यम है भाषा। बोलने की अपेक्षा व्यवहार जगत में अनिवार्य है किंतु उसके साथ विवेक प्रशस्त होना चाहिए। उन्होंने बोलते वक्त विवेक व संयम की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विचारों के आदान-प्रदान में भाषा सशक्त माध्यम है, लेकिन वाणी में संयम न होना कभी-कभी अहितकर साबित होता है।

समणी डॉ. निर्वाण प्रज्ञा ने पराक्रम की परिक्रमा के विषय पर बताया कि दुनिया मे चार चीजें दुर्लभ मानी गई हैं, उसमें से एक है -वीर्य। पराक्रम के अभाव में हमारी बहुत सारी प्रवर्तिया ठप हो जाती हैं। सपने सपने ही रह जाते हैं। उनकी क्रियान्वित नहीं हो सकती। जो सारा दृश्य जगत है वह पराक्रम की ही निष्पति है। यदि पराक्रम नहीं होता तो कुछ भी नहीं होता। जो भी होता है उसका कारण है- पराक्रम। समणी जी ने पराक्रमी महावीर की गाथा को सहज सरल रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि विचारों के आदान-प्रदान में भाषा सशक्त माध्यम है, लेकिन वाणी में संयम न होना कभी-कभी अहितकर साबित होता है।

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