संस, लुधियाना : एसएस जैन स्थानक सिविल लाइंस में ओजस्वी वक्ता अचल मुनि के शिष्य अतिशय मुनि ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कभी-कभी आप अपनों से लड़ना भी सीखो। आप सोचोगे कि आज अचल मुनि आपको लड़ाई सिखा रहे हैं पर हर चीज के दो पहलू होते है, एक सकारात्मक, दूसरा नकारात्मक। लड़ना जरूरी है पर अपने आप से। घरवालों से, घरवाली से, रिश्तेदारों से, पड़ोसियों से, ग्राहकों, भाईचारे, बेटों, संतों से काफी लड़े पर क्या मिला? अशांति के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा। परंतु कई लोगों के लड़ाई किए बिना रोटी हजम नहीं होती, परंतु हमें अपने से भी लड़ना सीखना है। अपने पूर्व संस्कारों से बुरी आदतों से लड़ना है। गुरुदेव ने कहा कि आप अपने बच्चों को बुरी नजर से बचाते है, अब मेरा भी एक कहना मानो कि उसे बुरी नजर के साथ बुरी संगत से भी बचाएं। अगर आज तुम उसे बुरी संगत से नहीं बचाते तो कल तुम्हें बडे़ बुरे दिन देखने पड़ेंगे, क्योंकि आज की उसकी बुरी संगत कल बुराइयों की पूरी संगत बनने वाली है और फिर तुम्हारी जिदगी की सारी रंगत खत्म होने वाली है।

बुरी नजर वाले का तो मुंह भी काला होता है, बुरी संगत वाले का तो पूरा जीवन ही काला हो जाता है। अरे बुरी संगत से ही हजारों लोगों का जीवन बर्बाद हो जाता है। इस अवसर पर साध्वी महक ने कहा कि जीवन में कभी भी मेहनत करना मत छोड़ना। क्योंकि फूलों की खुशबू केवल हवा के रुख से फैलती है, लेकिन एक अच्छी सोच और कड़ी मेहनत करने वाले व्यक्ति का गुणगान हर तरफ होता है। साध्वी विजेता ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि शब्द हमको बहुत प्रिय है। हम जिदगी भर प के पीछे भागते रहते हैं। जो मिलता है। वह भी प और जो नहीं मिलता वह भी प। पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, परिवार, पैसा, प्रतिष्ठा, पद, प्रशंसा। ये सब प के पीछे पड़ते-2 हम पाप करते हैं। वह भी प हैं। फिर हमारा प से पतन होता है और अंत में बचता है। सिर्फ प से पछतावा। पाप के प के पीछे पड़ने से अच्छा है। परमात्मा के प के पीछे पडे़ं।

Posted By: Jagran

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