संस, लुधियाना : सिविल लाइंस जैन स्थानक में शनिवार को उप-प्रवर्तक पीयूष मुनि के सान्निध्य में जारी चातुर्मास सभा में श्रद्धालुओं ने गुरुदेवों का गुणगान किया। मुनि पीयूष ने कहा कि अच्छे और बुरे कर्मो के आधार पर ही भविष्य की गति का निर्धारण होता है। मनुष्य चाहे कितना भी धनवान, रूपवान और कुलवान क्यों न हो पर अगर उसमें उत्तम गुण नहीं है व उत्तम कर्म नहीं करता तो उसका धन, रूप और कुल उसके श्रेयस के साधन नहीं बन सकते। जो दानशील नहीं वे नपुंसक हैं तथा जो कर्मशील नहीं है वे शोचनीय है। शुभ कर्म करने के लिए उच्च जाति अथवा कुल का होना आवश्यक नहीं है। जाति से कोई पतित नहीं होता। पतित वह होता है जो जीवदया, भृ्रण हत्या, मदिरापान, चोरी, ठगी, बेईमानी आदि कर्म करता है और उनको गुप्त रखने के लिए बार-बार झूठ बोलता है। वास्तव में अच्छे कर्म करने वाला गुणी व्यक्ति निम्न जाति का होने पर महान, पूजनीय और सुगति का अधिकारी होता है। उसे ही भगवान का सच्चा भक्त माना जा सकता है। मुनि श्री ने कहा कि हीन जाति व कुल में जन्म लेने वाला मनुष्य भी आखिर मनुष्य ही है, उसके प्रति दुर्भावना रखने वालों को शुभ फल प्राप्त होना असंभव है। जो महापुरुष जाति व कुल से हीन होकर भी सुकर्म करते हैं, जिनका ह्मदय पवित्रता की ज्योति से जगमगाता रहता है वे देवता ही नहीं भगवान बनने के अधिकारी हो जाते हैं। मनुष्य की प्रतिष्ठा उसके उत्तम कर्मो से होती है। मनुष्य अपने कर्मो से ऊंचा बनता है, जाति अथवा कुल से नहीं। इस प्रकार कुछ लोग जाति कुल तथा ऐश्वर्य वैभव की अपेक्षा से तुच्छ होकर भी अपने गुणों से उन्नत बन जाते है।

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